पढ़ें, कंचन अपराजिता की कविता ‘तेरे शहर से गुजरते हुये

By Prabhat Khabar Digital Desk
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पढ़ें, कंचन अपराजिता की कविता ‘तेरे शहर से गुजरते हुये
कंचन अपराजिता
(कवयित्री की कई रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं)
तेरे शहर से गुजरते हुये
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कई लम्हे
बेहद अजीज होते हैं.
कई लम्हे
दिल के करीब होते हैं
कई लम्हे
नसीब होते हैं
ऐसे ही कुछ रूमानियत पाया
तेरे शहर से गुजरते हुये..
मंद मंद सी पवन
तन में भरती संदली सुगंध
वो सुबह की लालिमा
बिखेरती रश्मियाँ
वो बच्चों की आवाज
खग के कोलाहल सा
वे टहलते हुये वृद्ध
बरगद के छाँव से लगे
तेरे शहर से गुजरते हुये...
वो सामने की दूकान पर
युवाओं की रहती थी टोली
जगह वही थी, शहर वही
जहाँ से देखा करते तुम्हें हम
साथ हँसते हुये हमजोली
आज फिर लगा तुम दिखी
कानों मे देर तक गूँजती रही
मित्रों के ठहाके और बोली
तेरे शहर से गुजरते हुये...
वो मन्नत वाला वृक्ष
जिसमे टंगे थे कई सपने
लाल सी चुनरी से बँधे
कोई अपनों की दुआ आगोश लिए
वो नदी का किनारा दिखा
आज भी बैठे है जहाँ प्रेमी युगल
मेरा मन भी आया टहल
कोई तीरथ धाम सा लगा
तेरे शहर से गुजरते हुये..
मन सकल हो रहा विकल
अतीत व वर्तमान का
घुला हुआ कोई पल
जेसे गुजर रहे हो
यादों के सघन जंगल
नयनो के कोरों पर
निकलने को आतुर जल
मन बन गया निर्मल
तेरे शहर से गुजरते हुये...
अभी अभी के एहसास जगे
अरसों बाद तुम जैसे मिले
गले लगा लिया हो तुमने
तेरे शहर से गुजरते हुये...
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