झारखंड के गांवों में घूमने के लिए कई दिनों तक हड़िया और सत्तू खाकर जिंदा रहा : कहानीकार शैवाल

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date


प्रकाश झा निर्मित 'दामुल' और 'मृत्युदंड' जैसी फिल्मों के लेखक और 300 से अधिक कहानियां लिख चुके गया (बिहार) के वरिष्ठ साहित्यकार शैवाल ने कहा कि रचनाकार के लिए यह जरूरी है कि वह जिंदगी में कमी को महसूस करे, नहीं तो वह जानेगा कैसे कि लोग अभाव में जीते कैसे हैं. स्वर्णरेखा प्रोजेक्ट पर एक फिल्म के लिए रिसर्च करते हुए कई दिनों तक आर्थिक तंगी के कारण हड़िया और सत्तू का सेवन कर झारखंड के गांवों की खाक छानते हुए जिंदा रहने के लिए मजबूर इस लेखक की जिंदगी पर फिल्मी दुनिया का कोई चकाचौंध हावी नहीं हो सका. आज भी 'सादा जीवन, उच्च विचार' के फलसफा पर यकीन रखने वाले शैवाल एक पारिवारिक समारोह में शामिल होने जमशेदपुर आए तो उनसे विशेष बातचीत की अखिलेश्वर पांडेय ने.

विकास तो हुआ पर आदिवासियों का नहीं

अपने लेखन से बार-बार वंचितों और जमीनी हकीकत की बात करने वाले शैवाल ने बताया कि - मैं पहली बार 80 के दशक में जमशेदपुर आया था. एक फिल्म के लिए स्वर्णरेखा प्रोजेक्ट पर रिसर्च करने. फिल्मकार का आदमी मुझे टाटा कंपनी के एक क्वार्टर में यह कहकर छोड़ गया कि मैं बस 10 मिनट में आता हूं. मैं अकेला दस दिन तक उसका इंतजार करता रहा. मेरे पास पैसे नहीं थे. इस शहर में मुझे कोई पहचानता नहीं था, मैं भी किसी नहीं जानता था. मैंने उन 10 दिनों में हड़िया पीकर और सत्तू खाकर खुद को जिंदा रखा. उस अभाव में भी मैंने रिसर्च का काम जारी रखा. मैं चाईबासा और जगनाथपुर के सुदूर गांवों में भी गया. उन दिनों का जीया उस आदिवासी जीवन ने मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव डाला. मैंने आदिवासियों को करीब से देखा व समझा. उनकी जरूरतों व जज्बात को जाना. रचनाकार के लिए यह जरूरी है कि वह जिंदगी में कमी को महसूस करे, नहीं तो वह जानेगा कैसे कि लोग अभाव में जीते कैसे हैं. मैं भी उस दौरान अस्तित्व के संकट से गुजरा. खैर, किसी कारण से वह फिल्म तो नहीं बनी पर उस अनुभव ने मुझे कई कहानियां (आ-समुद्र, जोड़ा हरिन की रूपकथा, काकपद) दीं. आज मैं फिर 90 के दशक में जमशेदपुर आया. जनवादी लेखक संघ का प्रांतीय सम्मेलन में शामिल होने. वह यात्रा महज एक दिन की थी. इस बीच बिहार से अलग होकर झारखंड बना. इस बार जब मैं यहां आया हूं तो मैं देख रहा हूं कि इस क्षेत्र का विकास तो बहुत हुआ है पर यह विकास उस ढंग से नहीं, जैसे होना चाहिए था. क्योंकि गाड़ियों की संख्या तो बढ़ी है पर उसमें सवार आदिवासियों की संख्या नहीं बढ़ी. इमारतें तो बढ़ी हैं पर आदिवासियों के मकान आज भी कम हैं. आदिवासियों के लिए विकास की योजनाएं बनाने वालों को आदिवासी संस्कृति को समझना होगा.

झारखंड का भी अपना एक दामुल हो

प्रकाश झा निर्मित राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म 'दामुल' की कहानी, पटकथा एवं संवाद लिख चुके शैवाल ने बताया कि दामुल संयुक्त बिहार के समय की फिल्म है. यह फिल्म 1985 में आयी थी. बिहार के पिछड़ेपन की बात करती इस फिल्म की चर्चा आज भी होती है. स्वर्णकमल प्राप्त करने वाली बिहार-झारखंड की आज भी यह इकलौती फिल्म है. मैं चाहता हूं कि झारखंड का भी अपना एक दामुल हो. जो अपने ढंग से यहां की समस्याओं को उस स्तर पर ले जाकर बात करे. मुझे यहां के फिल्मकारों मेघनाद और राजकुमार गुप्ता आदि से बहुत उम्मीद हैं.

राजकुमार राव व आलिया के फैन

दामुल, मृत्युदंड, पुरुष, दास-कैपिटल और माउंटेनमैन जैसी फिल्मों के लिए लेखन का काम कर चुके शैवाल ने बताया कि आज की नयी पीढ़ी फिल्मों में बेहतरीन काम कर रही है. स्त्री, बरेली की बरफी, न्यूटन, हिन्दी मीडियम और अंधाधुन फिल्मों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वे राजकुमार राव, इरफान खान और यशपाल शर्मा के अलावे आलिया भट्ट के प्रशंसक हैं. ये सितारे कमर्शियल के साथ-साथ सार्थक सिनेमा में भी काम कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि वे इन दिनों बेबीलोन और निर्वाण@बोधगया.कॉम जैसी अपनी कहानियों पर फिल्म बनाने के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं. उन्हें पुराने के बजाय नये फिल्मकारों का काम बहुत प्रभावित कर रहा है, इसलिए वे उनके साथ काम करने के आकांक्षी हैं.

फेसबुक से दूरी आवश्यक

वरिष्ठ कहानीकार व फिल्म लेखक शैवाल ने बताया कि उनका फेसबुक एकाउंट नहीं है. फेसबुक को वे 'टाइम किलर' मानते हैं. कहते हैं कि यह ऐसा रोग है जो आपको खुद में उलझाये रखता है. चिंतन के लिए समय नहीं देता. हर आदमी के व्यक्तित्व विकास के लिए पढ़ना-लिखना और सोचना (चिंतन) जरूरी है. इसलिए मैंने फेसबुक पर नहीं हूं. वे आगे जोड़ते हैं कि फेसबुक पर एक और बड़ी समस्या है कि हर आदमी यहां हड़बड़ी और गुस्से में है. यह मुझे पसंद नहीं. इसीलिए इससे दूर रहना ही बेहतर है.

हड़बड़ी में हैं नयी पीढ़ी

अब तक 300 से अधिक कहानियां लिख चुके शैवाल ने बताया कि नयी पीढ़ी के रचनाकार हड़बड़ी में हैं जबकि साहित्य लेखन सब्र की मांग करती है. जमीन से जुड़ाव जरूरी है. अनुभूति के बाद अभिव्यक्ति के धरातल पर आने के लिए कथा को पकने देने के संयम की जरूरत होती है. आज की पीढ़ी के लोग पिछली पीढ़ी को नहीं पढ़ रही या कम पढ़ रही है. हम कहते हैं कि 'वो हैं तो हम हैं', वे कहते हैं 'सिर्फ हम हैं'. युवाओं में समुदायबोध की कमी है. उपभोक्ता संस्कृति ने ऐसा असर डाला है कि वे उनका ध्यान इन बातों से विचलित हो गया है. उनमें अभिव्यक्ति की हड़बड़ी और यथार्थ फिसलता जा रहा है. झारखंड के कहानीकारों/लेखकों में जयनंदन, रणेंद्र, पंकज मित्र और विजय शर्मा का खासतौर पर जिक्र करते हुए शैवाल ने कहा कि युवा पीढ़ी को इनसे सीखना चाहिए.

Share Via :
Published Date
Comments (0)
metype

संबंधित खबरें

अन्य खबरें