मदर्स डे पर अनुज लुगुन की कविता - ''मेरी माँ, मैं और भेड़िये''

उसके दरवाजे हमेशा जंगल की ओर खुलते रहे और वह बीहड़ों में चलती रही भेड़ियों की पदचाप सबसे पहले वही सुनती है आज भी इसी तरह कई दशकों से वह हमें सहेज रही है नक्सलबाड़ी के ठीक समय उसका जन्म हुआ होगा उसकी माँ एक दिन दूसरी शादी करके चली गई वह एक पके फल […]
उसके दरवाजे हमेशा जंगल की ओर खुलते रहे
और वह बीहड़ों में चलती रही
भेड़ियों की पदचाप
सबसे पहले वही सुनती है आज भी
इसी तरह कई दशकों से वह हमें सहेज रही है
नक्सलबाड़ी के ठीक समय उसका जन्म हुआ होगा
उसकी माँ एक दिन दूसरी शादी करके चली गई
वह एक पके फल की तरह धरती पर नहीं गिरी
लेकिन वह गिरते हुए लोगों को देख रही थी
कुछ लालच में गिर रहे थे और कुछ गोली खाकर
उसने यह फर्क जान लिया था
और वह जंगलों में रायफल चलाना सीख आयी
कविता में यह बेतुकी बात हो सकती है कि
एक माँ रायफल चलाती है
लेकिन आलोचकों को यह बात स्वीकार करनी चाहिए
और उसके प्रतिमानों पर बहस करनी चाहिए
कि जब जंगल में भेड़ियों से घिरे हों उनके बच्चे
तो उनकी माँ को क्या करना चाहिए
और माँ ने वही किया जो एक माँ को करना चाहिए
वह भूमिगत हुई, वारंट निकले
लेकिन उसने समर्पण नहीं किया
बच्चों के लिए इससे ज्यादा और वह क्या कर सकती थी
वह हँड़िया बेचती थी और पीट आयी वसूली करनेवाले दरोगा को
वह मुर्गी बेचती थी और आँख तरेर आयी दबंगों को
उसके पास कुछ भी नहीं बचता था हाट से घर लौटते हुए
रोज रोज वह ऐसे ही किस्से सुनाती थी हम सबको
वह कुछ और दे भी नहीं सकती थी हमें इन किस्सों के सिवाय
पिज्जा, बर्गर, वीडियो गेम, टीवी – फीवी कौन जाने
वह तो गुरिल्ला थी और क्या दे सकता है एक गुरिल्ला अपनी जान के सिवाय
उसके दरवाजे आज भी जंगलों की तरफ खुलते हैं
और वह बीहड़ों में चलती है
माँ ऐसी ही होती हैं
वह न खुद बिकती है
न अपने बच्चों को बिकने देती है
न ही खेत, खलिहान और जंगलों को बिकने देती है।
(अनुज लुगुन 13/05/18)
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