ध्रुव गुप्त की मां के लिए पांच कविताएं

By Prabhat Khabar Digital Desk
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प्रसिद्ध साहित्यकार ध्रुव गुप्त की कविताएं कोमल भावनाओं को खुद में समेटे होती हैं, जो पाठकों के दिल तक जाती हैं और कई बार इंसान भावुक होकर रो भी पड़ता है. बात चाहे प्रेम कविता की करें या अन्य मानवीय संबंधों पर आधारित कविताओं की, कवि ध्रुव हर मोरचे पर प्रभाव छोड़ते हैं. आज पढ़ें उनकी पांच कविताएं जो मां को समर्पित हैं:-

-ध्रुव गुप्त -

एक/मां और चिड़िया
मैंने सुना है कि
दुनिया की तमाम मांएं
मरकर चिड़िया हो जाती हैं
बनाती हैं घोंसले
अपने ही घर के रोशनदान
या पास के किसी वृक्ष पर
सुबह-सुबह शोर मचाकर
हमेशा की तरह
जगाती है अपनी संतानों को
भरी दोपहरी खिड़कियों
या छत पर बैठकर
देती रहती हैं कुछ-कुछ हिदायतें
जिन्हें हमेशा की तरह
अनसुनी कर देते हैं हम
हमेशा की तरह
दाना-पानी न डालो इन्हें
तो शिकायत नहीं करतीं
मेरी कमरे की खिड़की पर
रहती है एक नन्ही चिड़िया
जो अक्सर बैठ जाती है
मेरे गिरे हुए कंधों पर
मैं जब भी होता हूं दर्द
या गहरे अवसाद में
दबी जुबान से कानों में
कहती रहती है कुछ न कुछ
मैं उसकी भाषा नहीं जानता
लेकिन पहचानता लेता हूं
उसकी आंखें
और उन आंखों से झांकती
उसकी असंख्य चिंताएं
मैं आहिस्ता से उसके कानों में
फुसफुसाता हूं - मां
वह पंख फड़फड़ाती है
और आहिस्ता से सहला देती हैं
मेरे गाल
सर उठाकर कानों में
आहिस्ता से ही कुछ कहती है
और आहिस्ता से ही
मैं गहरी नींद में डूब जाता हूं !
दो / सरसों के फूल
सरसों के खेतों के बीच से
गुज़र रहा था कल
एकदम थका-हारा
कि पौधों ने पकड़ लिये पांव
कहा - बैठ जाओ न दो पल
अभी हमारे साथ
क्या कोई जल्दी है ?
मैंने थोड़ी जगह बनाई
और लेट गया
दो खेतों के बीच की मेड़ पर
कुछ देर बातें की हरी पत्तियों
पीले-पीले फूलों
बदन पर सरसराती हवा से
और फिर आंखें मूंद ली
मैं थका था
पत्तियों ने दबाए मेरे पैर
फूलों ने सहलाया मेरा चेहरा
हवा ने चूम लिए मेरे होंठ
एक अरसे के बाद
एक बहुत गहरी नींद लेकर
मैं ताजादम घर लौटा तो
मेरी आंखों में नमी थी
और मेरे हाथ में सरसों के
ताज़ा, पीले फूलों का
एक मोटा-सा गुच्छा
मां की तस्वीर के आगे
फूल रखकर मैंने बहा लिये
दो बूंद आंसू
और आहिस्ता से कहा -
तू भी मां खूब है
बचपन के बाद आज सीधे
मेरे बुढ़ापे में ही याद आयी तुझे
बेटे के थके , कमजोर बदन पर
सरसों तेल की मालिश ?
ध्रुव गुप्त की मां के लिए पांच कविताएं
तीन / मोह
मां अब सपने में नहीं आती
सुना है मरने के कुछ बरस बाद
आत्माओं के लिए
ख़त्म हो जाता है बंधनों
और मोह का पिछला सिलसिला
वे भूल जाती हैं
पिछले जन्म का अपना घर
अपना परिवार
अपने बाल-बच्चे
वे फिर से जन्म लेती हैं
नए सिरे से रचने के लिए
मोह के नए-नए बंधन
मां देह या चेहरा नहीं होती
मोह का अटूट सिलसिला होती है
और इसीलिए मां के जाने के बाद
मैं उसे मोह में ही
अबतक तलाशता रहा हूं
मोह बंधन ही सही
लेकिन मुझे पता है
मुझे मोह में ही मुक्ति मिलेगी !
चार / नहीं मरती है मां
गांव के पुराने मंदिर से
घर के कुलदेवता तक
पिछवाड़े के बूढ़े पीपल से
आंगन की तुलसी तक
पूजा के लिए सुबह-सुबह
चुने जाने वाले अड़हुल
और कनैल के ताज़ा फूलों में
मंदिर की घंटियों और
घरों से उठने वाली प्रार्थनाओं में
तुम ही तो होती हो न, मां
खिड़की पर बैठी
गौरैया की मासूमियत में
गहन उदासी और दर्द में
माथे पर घूमती-फिरती
पत्नी की अंगुलियों
बहनों की चिंताओं
बेटी की बेशुमार झिड़कियों
नन्हीं पोती के दुलार
किसी भी संकट में आगे बढ़े
दोस्त के आत्मीय हाथों में
महसूस होती है
तुम्हारे ही आंचल की उष्मा
झुलसाती गरमी हो तो
शीतल हवा के स्पर्श में
सर्दियों में अलाव की आग में
मकई और मडुवे की रोटियों
कोहड़े और बथुआ के साग में
भूख के बाद की तृप्ति
संयोग से आयी गहरी नींद
आंखों की कम होती रोशनी में
तू ही तो दिखती है न हर बार
सिर्फ मर जाने भर से ही
तू कहां मर गयी है, मेरी मां !
पांच / जाड़े की धूप
कई दिनों की धुंध और
कोहरे के बाद
आज सुबह जब धूप निकली
रगों में आहिस्ता-आहिस्ता
भरने लगी वही पहचानी गर्मी
जिसे बचपन के बाद
आज पहली बार महसूस किया मैंने
बहुत शिद्दत से
नहीं, वह धूप तो नहीं थी
स्वर्ग से उतरती हुई
गर्म हथेलियां थीं मां की
जो देर तक सहलाती रही
बुढ़ापे की थकी हुई मेरी देह
और मैं बड़ी तेज रफ़्तार से
भागा जा रहा था
उस बचपन की ओर
जो मां के साथ ही चला गया था !
संपर्क :-dhruva.n.gupta@gmail.com
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