ज्योति शोभा की प्रेम में पगी कविताएं

By Prabhat Khabar Digital Desk
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दूर हो रही हूं तुमसे
हर स्मृति के साथ
मैं दूर हो रही हूं तुमसे
कोई एक देश, एक समंदर
या एक क्षितिज भर जितनी दूर
एड़ियों की रगड़ से निकली नदी में
बिछलती नौका जितनी दूर
तुम किसे बताओगे
कोई निद्रा थी जिसे स्मृति में तुमने अपनी गंध दी थी
और मृत्यु में पुनर्जन्म
मैं तुम्हें बार-बार कह रही हूं
चाहे न सिहरो पहले स्वप्न में
चाहे कान की लवें लाल होने तक देखो मेरे होंठ
चाहे इस भीषण बरखा के पार खड़े होकर देखो
मगर देखो स्मृति किस तरह भरती है
पहले हड्डी के कोटर फिर केशों के ताल
और फिर छीन लेती है तुम्हारी गंध
नौका के गीले रंध्रों से मेरे

ज्योति शोभा की प्रेम में पगी कविताएं
ऐसा तरुवर होता है प्रेमी
गीत गोविंद के अनचिन्हे कवि की याद में
भादो का आकाश है भरा
सूर्य का मुख निस्तेज
झुका आलते के चंद्र पर
नाग समान लहराते मंदार वृन्त
इतने उद्वेलित
जितने केश पाश थे
गत रात्रि उस अग्नि शिखा प्रेयसी के वक्ष पर
चार द्वार बंद होने पर
जो खिड़की फांद आये
और कविता कहे
आधी अमृत आधी विष बुझी
ऐसा तरुवर होता है प्रेमी
क्वार की पहली सुबह
कैलाश अधिपति की याद में
बांह मोड़े वो निर्मोही के घुटनों पर
और कहे
मेरे बैरी कवि को डुबो आओ
जब प्रेम का जल बढ़े
हो सकते हो तुम कवि
महज़ दो बरस में हो सकते हो तुम कवि
अगर ठीक तरह न सोवो रातों को
इसलिए नहीं कि सेज काठ की है
वरन आलिंगन इतना सख्त है कि
तुम्हारे पास कोई राह न हो
सिवाय रोशनाई हो जाने के
तुम लिख सकते हो कविता
अगर पंद्रह के बाद गिन कर सोच में पड़ जाओ
कि अभी तो याद की थी सितारों की फालसई रंगत
क्या वो बदल गयी होगी
सिर्फ होंठों का रुखड़ा हिस्सा, काट भर लेने से
तुम रस भर सकते हो नज़्मों में
इसलिए नहीं कि तुम्हारी कल्पना मांग रही है
रंगत प्रेमी की
बल्कि इसलिए की एक लकीर भर तुम्हारी सुर्खाब आरज़ू की
रंग रही है उसकी पेशानी
जबकि क़ायनात तुम्हारे सीने में मुंह छुपाये है
कितना नश्वर है प्रेम
लावण्य की परिभाषा लिए
नर्मदा तट पर
एक फूल देखता है मेरी कविता
इशारा करता है
उस टहनी की ओर जहां
उसके करीब थे तुम्हारे हाथ
ओह! कांप उठती है मेरी आत्मा
कितना नश्वर है प्रेम
सौंदर्य में अपने कितना क्षण भंगुर
इस बार
किंतु इस बार पहले जैसा नहीं हुआ
उसने बगैर आवाज़ पुकारा
बाहर सिर्फ एक आंसू गिरा
इस बार मैंने
कान को दरवाज़े से पुकार
अंदर बैठाया, सेज पर
और एक गीत था कोई
होंठ गुनगुनाते थे
किंतु कोई सुनता ना था
इस बार बहुत कहा उसने
चलो चलो चलो
किंतु इतनी सुनसान थी देह
सब चुपचाप रहा
यही लिखा
हम जहां होंठों तक जाकर लौट आते हैं
वहीं गिरने लगते हैं हमारे शब्द
मैं जहां चुप रहती हूं
वो जगह है ठीक धान के खेतों में
आधे घुटने तक
मुझे लगता है
तुम्हारा कविता लिखना व्यर्थ है
अगर तुम यहां आकर चूम नहीं सकते मेरी चुप्पी
मैनें भी जब जब लिखी कविता
यही लिखा
तुम्हें चूमना
इन उन्माद में आये बीजों के
महक उठने से ज्यादा अच्छा होता
छोटी प्रतीक्षाओं वाले घर में
लंबी लंबी प्रतीक्षाओं की कसमसाती छत से ऊब कर हम
आते हैं छोटी प्रतीक्षा की तरफ
यहां बहुत बड़े हैं घर
दूर दूर हैं दीवारें
दिन और रात के बीच इतना समय है कि
मेरे कान तपते हैं
संगीत सुनते हुए
छोटी प्रतीक्षाओं वाले घर में
तुम्हारे मुंह से निकली बात
लहकती है अलाव के जैसी
और मैं बंद हूं अंदर
बंद हूं एक तिड़कती छाया में
कितनी बंद हूं कि
खुल सकती हूं दो बाहों को निकाल कर वस्त्रों से
बह नहीं सकती
अपनी एक करवट से दूसरी तक
छोटी प्रतीक्षाएं छोटे-छोटे पोखर हैं
हर पहर आते हैं बाहर झांकों तो
कितने तो हैं
तुम्हारे और मेरे देस के मध्य
निमिष भर ले चलो अपने नगर
पहली नज़र में ये दिन बाकी दिनों की तरह था
उदास, उखड़ा हुआ स्वयं से
मेघ की गलबहियां लिये
किसी अनंत जलराशि पर ठहरा भूली डोंगी सा
पर अंदर कोई घनी, कोई औचक किरण कौंधती हुई सी
ज्यों अब फूटी, ज्यों अब आयी बाहर निष्प्राण काया से
और फिर जब तक आकार लेती स्निग्धता जब तक कह पाती
निमिष भर ले चलो अपने नगर तभी छा जाता नैराश्य
अंधेरा घेर लेता चुपचाप पीछे से
और पट बंद कर लेती इस आस पर
कल तुम्हारी नज़र पर झिलमिलाती हो फुहार, जब द्वार झकोरे से खुले
ज्योति शोभा की प्रेम में पगी कविताएं
बिल्कुल नहीं सुहाता
तुम चाहते हो
न लिखूं
अंश भर अपनी व्यथा
विवश करती है प्रीति
तुम्हें पहनाऊं कविताओं के वस्त्र
अंतर्मन तक उतरने एक द्वार न शेष रहे
काव्य पर लगे कीट, जो लगे
बिल्कुल नहीं सुहाता
तुम्हारा वर्ण कोई भी पुष्प
स्पर्श कर ले
इस विस्तार के लिए
हल्की मटमैले से रंगों की कामना से भरी
इस एक सांझ के बदले
कई फींकी अकेली सांझ में लिखा करुंगी
मैं कोई कविता के बदले तुम्हारी आवाज़
गाढ़ी , लयपूर्ण मेरे भरे स्वर से कहीं ज्यादा भरी
ये सांझ कभी गीली होकर घर आएगी
मैं सोचा करुंगी
मेरी दिशा से आती मुझ से कहीं ज्यादा भींगी
इस कविता की किस कामना पर
ऊंगली रखोगे तुम
अनंत से बरसती चन्द्रिका
इस विस्तार के लिए
तुम एकाकी जीना मेरे प्रिये
एकाकी देखूंगी मैं अपना शिखर
स्नात अपने ध्वल सौंदर्य से
परिचय :ज्योति शोभा, अंग्रेजी साहित्य में स्नातक. सजग पाठिका एवं साहित्य सृजन में उन्मुख. कई कविताएं राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय संकलनों में प्रकाशित. अधिकतर कविताएं प्रेम, प्रकृति व विरह भाव प्रधान.
संपर्क : jyotimodi1977@gmail.com
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