सआदत हसन मंटो की 10 लघुकथाएं
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 22 Dec 2017 7:15 PM
1. आराम की जरूरत -मरा नहीं…, देखो, अभी जान बाक़ी है!-रहने दे, यार… मैं थक गया हूं! 2. क़िस्मत कुछ नहीं दोस्त. इतनी मेहनत करने पर भी सिर्फ़ एक बक्स हाथ लगा था. पर उसमें भी, साला, सूअर का गोश्त निकला…! इसे भी पढ़ें : ‘माउंटेन मैन’ के बाद अब ‘मंटो’ बनने की तैयारी कर […]
1. आराम की जरूरत
-मरा नहीं…, देखो, अभी जान बाक़ी है!
-रहने दे, यार… मैं थक गया हूं!
2. क़िस्मत
कुछ नहीं दोस्त. इतनी मेहनत करने पर भी सिर्फ़ एक बक्स हाथ लगा था. पर उसमें भी, साला, सूअर का गोश्त निकला…!
इसे भी पढ़ें : ‘माउंटेन मैन’ के बाद अब ‘मंटो’ बनने की तैयारी कर रहे हैं नवाजुद्दीन सिद्दिकी
3. आंखों पर चर्बी
-हमारी कौम के लोग भी कैसे हैं…?
-हां, इतनी मुश्किलों के बाद तो ढूंढ़-ढूंढ़ कर पचास सूअर इस मस्जिद में काटे हैं….
-वहाँ मन्दिरों में धड़ाधड़ गाय का गोश्त बिक रहा है.
-और, हम यहां दुकान सजाए बैठे हैं, लेकिन सूअर का गोश्त ख़रीदने के लिए कोई आ ही नहीं रहा…!
4. सदक़े उसके
मुजरा ख़त्म हुआ.
तमाशाई रुख़सत हो गये.
उस्ताद जी ने कहा- सबकुछ लुटा-पिटाकर यहां आये थे, लेकिन अल्लाह मियां ने चंद दिनों में ही वारे-न्यारे कर दिये…
5. सफ़ाई पसंदी
गाड़ी रुकी हुई थी.
तीन बंदूकची रेल के एक डिब्बे के पास आये.
खिड़की में से भीतर झांककर उन्होंने डिब्बे में बैठे मुसाफिरों से पूछा -क्यों भइए, कोई मुर्गा है?
एक मुसाफ़िर कुछ कहते-कहते रुक गया.
बाक़ी लोगों ने कहा -जी नहीं.
थोड़ी देर के बाद भाले लिए हुए चार आदमी आए.
खिड़की में से भीतर झांककर उन्होंने डिब्बे में बैठे मुसाफिरों से पूछा -क्यों जनाब, कोई मुर्गा-वुर्गा है?
उस मुसाफिर ने, जो पहले कुछ कहते-कहते रुक गया था, जवाब दिया -जी, मालूम नहीं… आप अंदर आकर संडास में देख लीजिए. भाले वाले अंदर दाख़िल हुए. उन्होंने संडास का अंदर से बंद दरवाज़ा तोड़ दिया, तो उसमें से एक मुर्गा निकल आया. एक भाले वाला बोला -कर दो हलाल. दूसरे ने कहा -नहीं…नहीं… यहां नहीं. डिब्बा गंदा हो जायेगा… इसे बाहर ले चलो.
6. साम्यवाद
वह अपने घर का तमाम ज़रूरी सामान एक ट्रक में लदवाकर दूसरे शहर जा रहा था. रास्ते में कुछ लोगों ने उसे देखा और ट्रक रुकवा लिया. एक ने ट्रक में लदे माल-असबाब पर लालची नज़र डालते हुए कहा -देखो यार, किस मज़े से इतना माल अकेले उड़ाये चला जा रहा है.
सामान के मालिक ने मुस्कुराकर कहा -भाई साहब, यह मेरा अपना सामान है. उसकी यह बात सुनकर कुछ लोग हंसने लगे. एक बोला -हम सब जानते हैं.
तभी दूसरा चिल्लाया -लूट लो… बड़ा अमीर आदमी है यह… इसके चेहरे पर लिखा है, ट्रक लेकर चोरियां करता है
7. उलाहना
-देखो, यार. तुमने ब्लैक-मार्केट के दाम भी लिए… और ऐसा रद्दी पैट्रोल दिया… कि एक दुकान भी न जली.
8. सॉरी
छुरी पेट चाक करती हुई नाफ़ के नीचे तक चली गयी. इज़ारबंद कट गया. छुरी मारने वाले के मुंह से खेद में भरकर बस इतना ही निकला — च्च…च्च…च्च… मिश्टेक हो गया !
9. रियायत
– …मेरी आंखों के सामने मेरी जवान बेटी को न मारो.
-चलो, इसकी बात भी मान लो. छोकरी के कपड़े उतारकर… हांक दो एक तरफ़…!
10. इंतज़ाम
पहली वारदात नाके के होटल के पास हुई. फ़ौरन ही वहां एक सिपाही का पहरा लगा दिया गया. दूसरी वारदात दूसरे ही रोज़ शाम को स्टोर के सामने हुई. सिपाही को पहली जगह से हटाकर उस जगह तैनात कर दिया गया, जहां शाम दूसरी वारदात हुई थी. तीसरी घटना रात के बारह बजे लॉन्डरी के पास घटी. जब इंसपेक्टर ने सिपाही को इस नयी जगह पर पहरा देने का हुक़्म दिया, तो सिपाही कुछ देर तक सोचने के बाद बोला -मुझे वहां खड़ा कर दीजिए, जहां नयी वारदात होने वाली है…!
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