पाठक राजहंस की तरह मोती चुन लेता है : नीलोत्पल मृणाल

By Prabhat Khabar Digital Desk
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‘नीलोत्पल मृणाल’ यह नाम वर्ष 2016 में तब ‘लाइमलाइट’ में आया, जब इन्हें वर्ष 2015 का साहित्‍य अकादमी युवा पुरस्‍कार दिया गया. नीलोत्पल मृणाल बिलकुल अपने नाम की तरह ही साहित्य जगत में खिले और छा गये. जैसे नील कमल फूलों की दुनिया का बादशाह और खास होता है, साहित्य जगत के लिए नीलोत्पल वैसे ही खास हैं. झारखंड के दुमका जिले के नौनिहाट गांव के रहने वाले नीलोत्पल एक शानदार लेखक, वक्ता और गायक हैं. इनका जन्म बिहार के मुंगेर जिला के संग्रामपुर गांव में हुआ है. इनकी किताब ‘डॉर्क हार्स’ का नया संस्करण आ गया है, लेकिन इस बारहिन्द युग्म- वेस्टलैंड प्रकाशन से किताब आयी है और एक बार फिर चर्चा में है. इन्होंने अपनी उपलब्धियों और साहित्य पर रजनीश आनंद से खास बातचीत की. पढ़ें उस बातचीत का प्रमुख भाग:-


आप दिल्ली में आईएएस की तैयारी कर रहे थे, ऐसे में वह कौन सी ऐसी बात हो गयी, जिसकी वजह से आप किताब लिखने को मजबूर हो गये?
देखिए, कोई भी व्यक्ति जो लेखक बनता है, वह किसी घटना आधारित लेखक नहीं होता है, नैसर्गिक प्रतिभा होती है. वहीं कुछ लोग अभ्यास से भी लेखक बनते हैं और खुद को डेवलप कर लेते हैं. उस वक्त मैं आईएएस की तैयारी कर रहा था. लिखना-पढ़ना अनवरत जारी था, उसी दौरान मेरे मन में यह बात आयी कि मैं इससे इतर भी कुछ लिख सकता हूं, मैं फेसबुक पर काफी सक्रिय भी था, तो बस यही कारण थे, जिसने मुझे किताब लिखने के लिए प्रेरित किया और ‘डार्क हार्स’ का जन्म हुआ.



पाठक राजहंस की तरह मोती चुन लेता है : नीलोत्पल मृणाल
जब साहित्‍य अकादमी युवा पुरस्‍कार की घोषणा हुई उस वक्त आप जाने-पहचाने लेखक नहीं थे, आपको कैसा महसूस हुआ था?
निश्चित तौर एक प्रमाणिक संस्था द्वारा पुरस्कार की घोषणा से खुशी मिलती ही है और मुझे भी मिली थी. लेकिन खुशी से ज्यादा मुझे संतोष इस बात का था कि एक मानक संस्था ने मेरे लेखन को स्वीकारा है. यह मेरे लिए बड़ी बात थी, क्योंकि हिंदी साहित्य में आज भी मुख्यधारा का साहित्य नये लेखकों को जल्दी स्वीकार नहीं करता है.
क्या छोटे शहर का होना किसी लेखक के लिए चुनौती बन जाता है और उसके लिए अवसरों की कमी हो जाती है?
हिंदी में नये लेखकों के लिए चुनौती है, इसमें कोई दो राय नहीं है. खासकर तब जब वह छोटे शहर से आता है. साहित्य जगत आज भी नये लेखकों को स्वीकारने में उदार नहीं है. ऐसे में साहित्‍य अकादमी युवा पुरस्‍कार मिलने से मुझे एक स्वीकार्यता मिल गयी, जिससे मुझे संतोष मिला. नये दौर के लेखकों के लिए चुनौती है माहौल का नहीं मिलना. वे हिंदी साहित्य के समाज से अछूते रह जाते हैं. लेकिन उन्हें सोशल मीडिया से काफी फायदा मिला है. वे अपने लेखन को इसके जरिये मेन स्ट्रीम में ला सकते हैं और जब पाठक आपको पसंद करेंगे तो कोई आपको हाशिये पर रख ही नहीं सकता. इसलिए अब यह कोई इश्यू नहीं रहा कि आप छोटे शहर से आते हैं या किसी महानगर से. इसलिए नये लेखकों के लिए मूल चिंता यह होनी चाहिए कि वे पाठकों से कैसे जुड़ें और उनके बीच स्वीकार्य कैसे हों.
आप सोशल मीडिया को अच्छा माध्यम बता रहे हैं, लेकिन मुख्यधारा के साहित्यकारों का ऐसा कहना है कि यहां कूड़ा लिखा जा रहा है? आप क्या कहेंगे इसपर?
देखिए फेसबुक आज के दौर का माध्यम है, आविष्कार है. अगर आज के समय में तुलसीदास होते, तो वे भी फेसबुक पर लिखते. वैसे भी फेसबुक क्वालिटी का मानक नहीं है. यह सिर्फ लोगों को एक प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा रहा है कि आप लिखें. यह नये लेखकों के लिए बहुत अच्छा है. फेसबुक पर जो लिखा जा रहा है उसमें सब कूड़ा है, ऐसा नहीं है. बहुत कुछ क्वालिटी का भी होता है. पाठक क्वालिटी की चीजों को तलाश लेता है. पुराने साहित्यकारों को यह इसलिए भी पसंद नहीं आता, क्योंकि इसपर प्रतिक्रियाएं तुरंत आती हैं. पाठक यह नहीं देखता कि आपने कितने वर्ष साहित्य की सेवा की है. वह तो स्थापित साहित्यकार और नये लेखक दोनों को एक ही कसौटी पर कसता है और वह है आपके लेखन की गुणवत्ता. अगर लेखन अच्छा है तो आप प्रशंसा पायेंगे और बुरा है, तो आपको वैसी ही बातें सुनने को मिलेंगी. दरअसल समस्या यह है कि पुराने लेखक अबतक सिर्फ परीक्षा लेते रहे थे, लेकिन फेसबुक उनकी भी परीक्षा ले रहा, ऐसे में उन्हें यह पसंद आयेगा इसकी संभावना कम ही है. लेकिन नये लोगों के लिए यह वरदान के समान है. पाठक राजहंस की तरह मोती चुन लेता है.
आपकी किताब ‘डॉर्क हॉर्स’ में यथार्थ का चित्रण है. सभी पात्र ऐसे हैं जो हमारे आसपास के लगते हैं. कई बार ऐसा भी कहा जाता है कि इतना यथार्थ चित्रण नहीं होना चाहिए. आप क्या कहना चाहेंगे?
मेरी किताब में यथार्थ का चित्रण है, इसमें कोई दो मत नहीं. लेकिन किसी भी उपन्यास को लिखने की एक कला होती है. एक डिमांड होता है. उपन्यास में कल्पनाएं होती हैं. मेरे उपन्यास में भी ऐसा है, लेकिन आप इसे कोरी कल्पना नहीं कह सकते. आज के दौर में साहित्य केवल उपदेश देने के लिए नहीं है. आज का समाज जटिल हो गया है. व्यक्ति के पास अपने से बाहर झांकने का वक्त नहीं है. वह आदर्श से यथार्थ की ओर गया है. ऐसे में आदर्श से जरूरी है यथार्थ का चित्रण. एक साहित्यकार से यह उम्मीद करना कि वह समाधान देगा गलत है. समाधान तो वह दे सकता है जिसके पास सत्ता है. मैं साहित्यकार हूं, तो मैं यह बता सकता हूं कि इस कमरे में अंधेरा है, लेकिन उस कमरे में उजाला कैसे हो, यह व्यवस्था तो सरकार कर सकती है. इसलिए मेरा ऐसा मामना है कि साहित्यकार के दायित्व को बेवजह विस्तार देना बेकार है.

साहित्य जगत में भाषा की शुद्धता पर भी बहुत बातें होती हैं. आपके उपन्यास के किरदार वैसी ही भाषा बोलते हैं, जैसी भाषा का इस्तेमाल में वे असल जीवन में करते हैं, यही कारण है कि लोग आपके उपन्यास के किरदारों से सहजता से कनेक्ट हो जाते हैं. साहित्य में भाषा की शुद्धता पर आपकी क्या राय है?
मेरा ऐसा मानना है कि किसी भी भाषा के मूल स्वरूप को बरकरार रखा जाना चाहिए. उसका लालित्य बना रहे, उसकी आत्मा से छेड़छाड़ ना हो. लेकिन भाषाई शुद्धता के नाम पर दूसरी भाषा के शब्द को हिंदी में नहीं आने देना सही नहीं है. रक्त शुद्धता आंदोलन भाषा में नहीं होना चाहिए. अब देखिए हिंदी हम किसे कहते हैं, जो बिहार में बोली जाती है, तब भी समझी जाती है और पंजाब में बोली जाती है तब भी. इस हिंदी में अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मगही, पंजाबी सभी भाषाओं का मिश्रण है और इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है.
आपने अपनी किताब में जिस मुखर्जी नगर का चित्रण किया है, आपकी किताब आने के बाद वहां कितना परिवर्तन हुआ?
मुखर्जीनगर में काफी परिवर्तन हुआ है. हालांकि मुखर्जीनगर ऐतिहासिक हो गया है, इस किताब के बाद. लोगों में सुकून है. अब लोग अन्य परीक्षाओं की तैयारी भी कर रहे है. माहौल काफी बदला है.

पाठक राजहंस की तरह मोती चुन लेता है : नीलोत्पल मृणाल
आपका उपन्यास ‘डॉर्क हार्स’ अपने तरह का पहला उपन्यास है. इसमें छात्रों के जीवन, उनकी बेरोजगारी और उनका कुंठा का सजीव चित्रण है. हिंदी साहित्य में ऐसे प्रयासों का अभाव क्यों है?
मेरा ऐसा मानना है कि लेखक जिस पृष्ठभूमि से आता है, वह उसके लेखन में दिखता है. मैं ग्रामीण परिवेश से आता हूं, तो मेरा गांव मुझसे छूटता नहीं. मैं और मेरे जैसे अन्य लोग संघर्ष करते हैं, तो यह संघर्ष मेरे लेखन में दिखता है. जो लोग इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहे हैं, वह अच्छे दिनों पर लिखते हैं, उनके लेखन में संघर्ष नहीं है. वह प्रेम की कुंठा पर लिखते हैं, हम संघर्ष कर रहे हैं बेरोजगारी से लड़ रहे हैं, आजीविका के लिए संघर्ष हमारे लेखन में दिखता है.
नये लेखकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?
मैं नये लेखकों से यह कहना चाहूंगा कि आप लेखन जारी रखेंगे, प्लेटफॉर्म की चिंता ना करें, आपको फेसबुक जैसा माध्यम मिला है. जीवन में सुरक्षा जरूरी है, लेकिन लेखन में विलासिता नहीं होना चाहिए. प्रेमचंद जैसा जीवन जीयेंगे तभी आप लेखन की भूख को बनाकर रख पायेंगे. मुक्तिबोध होने के लिए उनके जैसा जीवन जीना भी जरूरी है.
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