अपराध की पृष्ठभूमि में एक प्रेम कहानी ‘हत्यारा’

By Prabhat Khabar Digital Desk
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-ध्रुव गुप्त-

हत्यारा मेरे सामने बैठा था. शक़ की कोई गुंजाइश नहीं थी. लोगों ने गोली चलने के बाद उसे नाजायज पिस्तौल के साथ रंगे हाथों पकड़ा था. थानेदार ने मुझे बताया था कि वह अपना अपराध कबूल भी कर रहा है. उत्सुकतावश ही मैं हत्यारे को देखने थाने पर आ गया था. इस युवक ने जिन रामदेव सिंह की हत्या की थी, वे जिले के प्रतिष्ठित लोगों में एक थे. उनकी हत्या से इलाके में सनसनी फैल गई थी.
मैंने सामने बैठे युवक को गौर से देखा. पच्चीस साल से ज्यादा उम्र नहीं थी उसकी. लंबा कद. गोरा रंग. छोटे बाल और घनी मूंछें. उसके कपड़े मुझसे बेहतर थे. बताया गया कि वह इसी शहर का रहने वाला था. दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए था और नौकरी की तलाश कर रहा था. सबसे अजीब बात यह थी कि हत्या के आरोप में पकड़े जाने के बावजूद वह डरा हुआ एकदम नहीं था. विश्वास के साथ मेरी आंखों में आंखें डाले ताक रहा था. उसकी चीरती नजर ऐसी थी कि सामने वाला आदमी, चाहे वह मुझ सा पुलिस का आला अधिकारी ही क्यों न हो, अपना कांफिडेंस खो बैठे.

मैंने पूछा, 'रामदेव बाबू से व्यक्तिगत दुश्मनी थी तुम्हारी ?'
'नहीं.'
'किसी ने तुम्हारा इस्तेमाल किया है ?'
'नहीं.'
'तुमने उनकी बेटी के साथ बलात्कार की कोशिश की थी ?'
'नहीं.'
'तो फिर यह हत्या तुमने क्यों की ?'
'मैंने उनकी हत्या नहीं की.'
मैंने थानेदार की तरफ देखते हुए उससे सवाल किया, 'मुझे बताया गया कि तुमने हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया है. तुम वारदात की जगह रंगे हाथों पकड़े गए थे. तुम्हारे हाथ में वह पिस्तौल थी जिससे उनकी हत्या हुई थी.'
'मैं इस बात से कब इनकार करता हूं ? मेरा कहना बस इतना ही है कि वह घटना महज इत्तेफ़ाक़ थी. मैंने उनकी पिस्तौल पकड़ ली थी. छीना-झपटी में गोली किसी को भी लग सकती थी.'
'क्या उन्होंने तुम्हें जान से मारने की कोशिश की थी ?'
'हां.'
'क्यों ?'
'मैं उनकी बेटी कीर्ति के साथ उनके घर के पीछे बगीचे में मौजूद था. हम दोनों के बीच कुछ अंतरंग बातें हो रही थी.'
'वज़ह ?'
हम दोनों एक दूसरे को प्यार करते हैं.'
'कब से ?'
'हम दोनों ग्रेजुएशन तक साथ पढ़े थे. पत्रों के जरिए हमारा संपर्क अब तक बना हुआ था.'
'उसके गांव में क्यों गए थे ?'

'मुझे पता चला था कि उसकी शादी होने वाली थी. मैंने उससे मिलने का समय मांगा था. उसने आज दो बजे दिन में अपने बगीचे में मुझे बुलाया था.'
'फिर ?'
'मैंने उससे पूछा कि वह मुझसे शादी क्यों नहीं कर सकती.'
'क्या कहा उसने ?'
'उसने कहा कि अपने परिवार के खिलाफ जाने की उसकी हिम्मत नहीं है. मैंने उसके आगे भाग चलने का प्रस्ताव रखा. उसने इनकार कर दिया. मैंने कहा कि मैं आखिरी बार उसे गले लगाना चाहता हूं. वह मुझसे लिपट गई.'
'फिर ?'
'वह मेरी बांहों में थी. हम दोनों रो रहे थे. अचानक उसके पिता अपने दोनों बेटों के साथ वहां आ गए. बेटे से पिस्तौल लेकर उन्होंने मेरे पेट से सटा दी. मैंने पिस्तौल पकड़ ली. उन्होंने पिस्तौल छीनने की कोशिश की. छीना-झपटी में गोली चली और उन्हें लग गई. यह महज संयोग था. गोली मुझे भी लग सकती थी.'

'रामदेव बाबू के बेटे ने अपनी एफआईआर में कहा है कि तुमने बगीचे में अकेली पाकर उसकी बहन के साथ नाजायज हरकत की. रामदेव बाबू ने तुम्हें रोकना चाहा तो तुमने उनकी हत्या कर दी.'
'उन्होंने ऐसा कहा है तो मैं क्या कर सकता हूं ? आप मेरी भी एफआईआर लिख लें. रामदेव बाबू ने मेरी हत्या की कोशिश की. मैंने आत्मरक्षा में उनकी पिस्तौल छीननी चाही तो दुर्घटनावश गोली चली और उन्हें लग गई.'
मुझे उसकी बातों में मजा आने लगा था. मुझे लगा कि वह सच बोल रहा है, मगर परिस्थितियां उसके विपरीत थीं. रामदेव बाबू के पक्ष में ऐसे ढेरों गवाह थे जो उसे फांसी पर चढ़ा सकते थे. मैंने पूछा, 'रामदेव बाबू के पक्ष में पूरा गांव बयान देगा. तुम वहां घुसपैठिए थे. तुम्हारी तरफ से गवाही कौन देगा ?'
'कीर्ति.'

मैं उसके उत्तर से हैरान हुआ. पूछा, 'कीर्ति अपने बाप के हत्यारे के पक्ष में गवाही देगी ? तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है ?'
'अगर नहीं देगी तो मैं हत्या का आरोप कबूल कर लूंगा.'
'मुझे लगता है कि तुम यह बात भावनाओं में बहकर ही कह रहे हो. मुमकिन है कि कीर्ति तुमसे बहुत प्यार करती हो. तुम्हारे लिए जान भी दे सकती हो. मगर वह सिर्फ तुम्हारी प्रेमिका नहीं है. किसी की बेटी और बहन भी है. अपने पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण तुम्हारे निर्दोष होने पर भी वह तुम्हारे पक्ष में गवाही नहीं देगी.'
'मैं आपसे सहमत नहीं हूं, सर ! मैं उससे किसी का पक्ष लेने की उम्मीद नहीं कर रहा हूं. वह घटना की चश्मदीद गवाह है. मुझे उम्मीद है कि वह सिर्फ सच बोलेगी. मुझे उस पर भरोसा है.'
मामला दिलचस्प मोड़ पर था. अब सारा दारोमदार उस लड़की पर था जिसे यह लड़का बेपनाह प्यार करता है. अगर वह सच बोलती है तो यह बेदाग बच जाएगा. अपने पारिवारिक दबाव में अगर उसे झूठ बोलना पड़ा तो यह फांसी पर चढ़ सकता है. कम से कम उम्रकैद तो तय है. बहरहाल इस केस का सुपरविजन मैंने खुद करने का फैसला किया.

अगली सुबह जब मैं रामदेव सिंह के घर पहुंचा तो वहां सैकड़ों लोगों की भीड़ लग गई. लोग बेहद गुस्से में थे. पुलिस के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे. लोग इस बात पर खफा थे कि जब हत्यारे को पकड़ा गया तो दस मिनट के भीतर पुलिस उसे गांव वालों से छुड़ा कर ले गई. उसे मारने-पीटने से रोका गया. लोग उसे गांव के चौराहे पर खड़ा कर गोली मार देने की मांग कर रहे थे. मुझे उन लोगों से कुछ कहने के बजाय कुछ देर चुप रह जाना बेहतर लगा. उनका गुस्सा निकल जाएगा तो खुद-ब-खुद शांत हो जाएंगे. वैसा हुआ भी. आधे घंटे के बाद लोग थककर चुप हो गए.


अपराध की पृष्ठभूमि में एक प्रेम कहानी ‘हत्यारा’

मैंने गवाहों के बयान लेना शुरू किया. रामदेव बाबू के दोनों बेटों ने एफआईआर में लिखी बातें दुहराईं. शब्दशः. जैसे स्कूली बच्चे रटा-रटाया पाठ दुहराते हैं. उनके अलावा लगभग दो दर्जन गवाह ऐसे थे जो गोली चलने की आवाज सुनकर बगीचे में पहुंचे थे. उन्होंने देखा कि रामदेव बाबू जमीन पर गिरकर छटपटा रहे थे और पकड़ा गया युवक वहां पिस्तौल लिए खड़ा था. उनके बयान नोट करने के बाद मैंने लड़की को बुलाने को कहा. उसके भाइयों ने कुछ देर सोचने के बाद कहा कि उनके परिवार में औरतों के पुलिस या कोर्ट में गवाही देने की परंपरा नहीं रही है. मैं चाहूं तो वह लिखकर अपना बयान दे सकती है. मैंने उन्हें समझाया कि लड़की अपराध की भुक्तभोगी और हत्या की सबसे अहम गवाह है. अगर उसकी गवाही नहीं हुई तो पूरा केस ही ध्वस्त हो जाएगा. ऐसी स्थिति में हत्यारा साफ़ बच निकलेगा. कुछ पलों तक उनका जवाब नहीं मिला तो मैं उठ खड़ा हुआ. मैंने कहा, 'मैं चलता हूं. अगर आपके पिता का हत्यारा बच निकला तो इसका दोष आप पुलिस को मत दीजिएगा. '

दोनों भाइयों ने आपस में कुछ बातें की और मुझे कुछ देर बैठने का अनुरोध किया.
वे अंदर जाकर लड़की को ले आए. मैंने उसे अपने सामने की कुर्सी पर बैठने को कहा. वह बैठी तो उसके अगल-बगल दोनों भाई खड़े हो गए. बाहर की भीड़ और निकट खिसक आई. मैंने थानेदार को बाहरी लोगों को दूर हटाने को कहा. उसने लोगों को ठेलते हुए सड़क तक पहुंचा दिया. मैंने दोनों भाइयों को भी बाहर जाने को कहा ताकि मैं लड़की से अकेले में पूछताछ कर सकूं. कुछ हिचकिचाहट के साथ वे दोनों जाकर सामने घर के बरामदे पर खड़े हो गए.

उनके जाने के बाद मैंने लड़की को देखा. मुझे वह बहुत खूबसूरत और मासूम लगी. उसकी आंखें भरी हुई थीं. नजर जमीन पर गड़ी थी. उसने एक बार सिर उठाकर मुझे देखा तो उसकी आंखों में खौफ की छाया दिखाई दी. उसने ओढ़नी से अपना सिर और गर्दन ढंक रखा था, लेकिन माथे और गालों पर बेरहम पिटाई और सूजन के चिन्ह साफ़ दिख रहे थे.
मैंने कहा, 'मेरी लड़के से कल रात लंबी बात हुई है. उसने मुझे सब कुछ बता दिया है. मुझे लगा कि वह तुमसे बहुत प्यार करता है.'.
लड़की ने सर उठाकर हैरानी से मुझे देखा. उसे मुझसे यह बात सुनने की उम्मीद नहीं रही होगी. उसकी आंखों से दो बूंद आंसू टपक पड़े.
'लड़के की बात मुझे ठीक लगी थी, लेकिन तुम घटना की भुक्तभोगी और प्रत्यक्षदर्शी गवाह हो. सच क्या है, यह तुम्ही बता सकती हो मुझे.'
लड़की ने कुछ नहीं कहा.

मैंने कहा, 'तुम्हारे भाइयों का कहना है कि लड़के ने बगीचे में अकेली पाकर तुम्हारे साथ बलात्कार की कोशिश की. तुम्हारे पिता ने विरोध किया तो उसने गोली मारकर तुम्हारे पिता की हत्या कर दी. इस बात का समर्थन तुम्हारे गांव के दर्जनों लोग कर रहे हैं. लड़के का कहना है कि वह तुमसे समय लेकर मिलने आया था. वह तुमसे शादी करना चाहता था, लेकिन तुममें अपने परिवार के खिलाफ जाने का साहस नहीं था. उसने तुम्हारे सामने भाग जाने का प्रस्ताव रखा. तुमने मना कर दिया. उसने जाने के पहले आखिरी बार तुम्हें बांहों में लिया. तुम्हारे पिता और भाइयों ने यह देख लिया. तुम्हारे पिता ने उसे गोली मारनी चाही. उसने पिस्तौल पकड़ ली. दुर्घटनावश गोली चली और तुम्हारे पिता को लग गई. यह संयोग था. गोली उसे भी लग सकती थी. यह मेरा नहीं, लड़के का बयान है. उसकी गवाह सिर्फ तुम हो. उसे सिर्फ तुमपर भरोसा है. मैं जानना चाहता हूं कि सच क्या है.'

लड़की अबतक बड़े गौर से मेरी बातें सुनने रही थी. मेरी बात ख़त्म हुई तो वह सिसकने लगी. दोनों हथेलियों में मुंह छिपाकर देर तक सिसकती रही. बोली कुछ नहीं.
मैंने कहा, 'कुछ भी कहने के पहले यह जान लो कि तुम्हारे बयान से उसे फांसी की सजा हो सकती है. तुम्हारे बयान से वह बेदाग़ छूट भी सकता है. उसने कहा है कि अगर तुम उसे दोषी मानती हो तो उसे अपनी सफाई में कुछ नहीं कहना है. तब वह तमाम आरोप स्वीकार कर लेगा और अपने लिए सजा-ए-मौत की मांग करेगा.'
वह सिर झुकाए बैठी रही. मुझे लगा कि वह मुझसे कुछ कहना चाहती है, मगर कह नहीं पा रही है. मैं उसकी उलझन समझ सकता सकता था. मैंने उसे याद दिलाया कि उसे हर हाल में अपना बयान देना है. आधा घंटा बीत गया. उसकी जुबान नहीं खुली. उसके दोनों भाई बेचैनी की हालत में बरामदे पर टहल रहे थे. सहसा वे दोनों मेरे पास आ गए. बड़े ने कहा, 'सर, बयान दे दिया इसने ?'
'नहीं. यह कुछ नहीं बोल रही है.'

'ऐसा है कि बाबू जी की हत्या के बाद कल से ही यह सदमे में है. आप खुद इसकी दिमागी हालत का अंदाजा लगा सकते हैं. स्वस्थ होने के बाद यह लिखकर अपना बयान भेज देगी.'
दोनों लड़की के हाथ पकड़ कर उसे लगभग घसीटते हुए ले जाने लगे. मैं उठ खड़ा हुआ. जाते-जाते लड़की ठहर गई. उसने कातर नजरों से मुझे देखा और जैसे एक ही सांस में बोल गई, 'सर, मेरे भैया लोगों ने जो बयान दिया है , वह सही है.'
यह कहने के बाद वह भाइयों से हाथ छुड़ाकर तेजी से घर के अंदर भाग गई. उसके दोनों भाइयों ने सवालिया निगाहों से मुझे देखा. उनके चेहरों पर राहत साफ नजर आ रही थी. मैंने उनसे कहा कि इस बयान से काम चल जाएगा.
मुझे लड़की का बयान सुनकर धक्का लगा था. हालांकि मुझे उससे इसी बयान की उम्मीद थी. वह तो लड़के के लिए उपजी मेरी सहानुभूति थी जिसकी वजह से मैं चाहता था कि वह सच बोले. लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है ? लड़की ने एक झूठ बोलकर न केवल अपने परिवार को भारी कलंक से बचा लिया है, बल्कि कुछ महीनों बाद होने वाले अपने ब्याह और उसके बाद के अपने दांपत्य जीवन को भी सुरक्षित कर लिया है. इस बयान के बाद वह एक सहज और सामान्य जिन्दगी जी सकेगी.

मैं थाने जाकर लड़के से मिला. लड़की के बयान और बयान देने के तरीके के बारे में उसे बताया. उसकी तात्कालिक प्रतिक्रिया से जाहिर हुआ कि उसे यह सुन कर सदमा लगा है. उसका चेहरा लाल हो गया था. आंखें झुक आई थीं. आत्मविश्वास से भरा हुआ यह लड़का पहली बार मुझे बेहद दयनीय लग रहा था.
मैंने उससे कहा, 'कीर्ति से जो उम्मीद तुमने लगा रखी थी, उस पर मुझे ताज्जुब हुआ था. फिर भी तुम्हारा आत्मविश्वास देखकर मेरी दिलचस्पी जगी थी और लड़की से खुद पूछताछ करने का मैंने फैसला किया था. कीर्ति को मैंने तुम्हारी बातों और उसके प्रति तुम्हारे अटूट भरोसे के बारे में बताया था. यह भी कहा था कि उसका एक झूठ तुम्हारा जीवन ले सकता था. लेकिन मैं उसे भी दोष नहीं दूंगा. जिस सामाजिक परिवेश में वह रहती है, उसमें वह इसके अलावा और क्या कर सकती थी ?'

कुछ देर की खामोशी के बाद लड़के ने रूमाल निकाल कर अपनी आंखें और चेहरा पोंछा. संभल कर बैठा. उसके चेहरे पर फिर पुराना कांफिडेंस लौट रहा था.
उसने कहा, 'सर, मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूं. कीर्ति मुझे प्यार नहीं करती थी. मैंने उसके साथ जबर्दस्ती करने की कोशिश की. उसका हल्ला सुनकर उसके पिता और भाई आ गए. पकडे जाने के डर से मैंने उसके पिता की गोली मारकर हत्या कर दी.'
मैं स्तब्ध रह गया. अजीब लड़का था. अपने प्यार पर विश्वास सही है, लेकिन यह अंधविश्वास का शिकार था. मैंने उसे समझाया, 'जिंदगी भावुकता से नहीं चलती. अंतिम रूप से कुछ भी कहने के पहले ठीक से सोच लो ! तुम्हारी इस कुर्बानी से किसी के मन में तुम्हारे लिए सहानुभूति नहीं जगेगी. ऐसा सिर्फ फिल्मों और किताबों में होता है. लोग तुम्हें बलात्कारी और हत्यारे के रूप में याद करेंगे. रही उस लड़की की बात, तो कुछ महीनों बाद उसकी शादी होगी. बाल-बच्चे होंगे. वह धीरे-धीरे तुम्हें भूल जाएगी.

फिर तुम्हारे अपने पारिवारिक दायित्व हैं. क्या तुम्हे अपने मां-बाप के बारे में नहीं सोचना चाहिए ? यह बयान तुम्हारी जिंदगी बर्बाद कर देगा. तुम वह अपराध स्वीकार मत करो जो तुमने किया ही नहीं है. घटना का सच्चा ब्यौरा लिखकर दो. मैं तुम्हारी भी एफआईआर दर्ज कर लूंगा. गवाह तुम्हें नहीं मिलेंगे लेकिन मैं कोशिश करूंगा कि तुम्हारे लिए परिस्थितियों के आधार पर साक्ष्य तैयार करूं. यहां तो नहीं, शायद अदालत से तुम बच निकलो.'

उसने मुझे ध्यान से देखा. फिर हाथ जोड़ दिए. कहा, 'सर, आपने मेरे लिए इतना सोचा, मैं सचमुच आपका आभारी हूं. लेकिन मुझे अपनी तरफ से कोई एफआईआर दर्ज नहीं करानी है. यह मेरा आखिरी फैसला है.'
मैं उठ गया. वह भी उठ खड़ा हुआ. मैंने उसकी पीठ पर एक आत्मीय थपकी दी और बाहर निकल गया. मेरा मन भारी हो गया था. मैं मुश्किल से गाडी तक पहुंचा. मुझे लड़के के लिए अब कोई अफ़सोस नहीं था. अफसोस मुझे उस बेवक़ूफ़ लड़की के लिए हो रहा था. वह शायद कभी नहीं जान पाएगी कि जीवन में उसने क्या खो दिया है.

संपर्क - 8210037611 / ईमेल dhruva.n.gupta@gmail.com
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