विवेक चतुर्वेदी की कविताएं

By Prabhat Khabar Digital Desk
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विवेक चतुर्वेदी, पिता का नाम स्व. मनोहर लाल चतुर्वेदी, जन्मतिथि - 03-11-1969, शिक्षा - स्नातकोत्तर (ललित कला), प्रकाशन/प्रसारण - बिजूका, जानकीपुल में रचनाएं प्रकाशित एवं अहा जिंदगी, मधुमति, कथादेश, नयीदुनिया में रचनाएं प्रकाशित. संप्रति: प्रशिक्षण समन्वयक, लर्निंग रिसोर्स डेवलपमेंट सेंटर, कलानिकेतन पॉलिटेक्निक महाविद्यालय, जबलपुर. संपर्क -1254, एच.बी. महाविद्यालय के पास, विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.) 482002, फोन - 0761-2623055, 7697460750

कहां हो तुम
बरस गया है
आषाढ़ का पहला बादल
हरी पत्तियां जो पेड़ में ही
गुम हो गई थीं
फिर निकल आई हैं
कमरों में कैद बच्चे
कीचड़ में लोट कर
खेलने लगे हैं
दरकने लगा है
आँगन का कांक्रीट
उसमें कैद माटी से
अँकुए फूटने लगे हैं
कहाँ हो तुम ...
बंदिनी
वो चाहती है उसके हाथों से बुना गया है जो सूत का सुआ
वो उड़कर चला जाए उसके देस भरकर चिट्ठी का भेष
जाकर बैठ जाए वो सुआ बाबू की सूखती परधनी पर
अम्मा के हाथ की परात पर
भैया की साइकिल के हैंडल पर
भाभी के कोठे की खूँटी पर
और अपनी चोंच और पैरों से छू ले वो सुआ सब
जो वो नहीं छू सकेगी अब बरसों बरस।।
मेरे बचपन की जेल
मेरा बचपन एक जेल में बीता
जिसके दरवाजे से मेरी बहनें मुझे
रोज ढकेल देती थीं भीतर
और निष्ठुर और कठोर ‘ना’ लिए
पिता खड़े रहते थे
हम सबको भीतर कर अलसुबह
बंद होते जेल के उस हाथी दरवाजे
की किर्रर ......... आज तक मेरे भीतर
गूंजती है
क्या कुछ नहीं बंद और खत्म हुआ
उस दरवाजे के साथ
जेल में एक सी वर्दी पहने
उनींदी आंखों और थके पैरों वाले
हम नए पुराने कैदी
एक सफे में खड़े किए जाते थे
जेलरों का चहेता एक पुराना कैदी
हमसे दुहरवाता है एक फरेबी प्रार्थना
जिसके लफ्जों के मानी का
वहां किसी को भी यकीन न था
फुदकती गौरैया, उगता सूरज
गाय का नवजात बछड़ा
पुराने टायर से बनी
शानदार गाड़ी
पतंग
गुलाबी नींद
घर के आंगन की रेशमी सुबह
ये सब बहते में कैद हो जाये
से उपजी छटपटाहट में
कैसा गूंजा दुख था
जिसे मैं जी भर कर रो भी
न सका
मेरे और भीतर उगे
वो जहां जहां बही वहां
खारे निशान वाली धारियां छिल गयीं
उनका नमक आज तक मेरी
चेतना को छरछराता है
हमें बैरकों में ठूंसा जाता था
रटाया जाता था कामुक
और वहशी राजाओं का इतिहास
डरावना और बेखुर्द विज्ञान
बेबूझ गणित
अपने काम और हालात से
चिड़चिड़े जेलर हमारी नर्म खूंटियों
पर अपना भारी अभिमान टांगते
थुलथुल हठी जेलर
काले धूसर तख्ते पर हमें
दिखाए जाते ज्यामितीय आकार
उन त्रिभुजों के कोने
हमारी चेतना में धंस जाते
वो चाहते थे हम बने
याद रखने की उम्दा मशीन
हमारे पांव में कुछ
कविताएं भी थीं कुछ कहानियां
जो उन जेलरों के हाथ
पड़ के नीरस हो जातीं
बैरक की अधखुली खिड़की से
मैं देखा करता
हवा में गोता लगाते
डोम कौए
बैरक के छप्पर में
आजाद फिरते चमगादड़
रोज शाम में पैरोल पर छूटता था
और मोहल्ले की धूल भरी सड़कों पर
खेलने में भूल जाता था कि मैं कैदी हूं
पर जब रात गहराती
सुबह 7 बजे की सूली छेदने लगती
घर की दीवाल में जो पुरानी
घड़ी की
सुबह 7 बजाने के लिए उसकी इतनी तेज
रफ्तार क्यों थी
नारंगी सपनों को रौंदता
समय का काला घोड़ा क्यों भागता
था सरपट
उन घड़ी के कांटों को सुबह सात बजे तक
जाने से रोकने अधूरी नींद के
ख्वाब में उन पर हाथ की उंगलियों
के बल मैं लटक जाता था
तब घड़ी के कांटे हो जाते चाकू जैसे संगलाख
कितनी कितनी रातें
कितनी कितनी बार
मैं उन कांटों को रोकने लटका
कितनी कितनी बार मेरी उंगलियां
कट कर घड़ी के डाल से चिपक गईं
अब जब कभी मैं चाहता हूं
बनाना एक छोटी चिड़िया का चित्र
लिखना एक मुलायम सा गीत
तब मालूम होता है मुझे
मेरी उंगलियाँ नहीं हैं
चील बन अवसर के मुद्दों से
उपलब्धियों का मांस नोचने
नाखून तो है
पर वो उंगलियां नहीं हैं
जो किसी सिर को सहलाती हैं
सितार बजाती हैं
उस सीलन भरी जेल में
कुछ पुराने कैदी के
जो ना मालूम कैसे
बहुत खुश रहने का हुनर
सीख चुके थे
और हमें भी खुश रहने के लिए
धमकाए जाने वार्डन की तरह मुस्तैद के
हम कैदियों को नीरस और उबाऊ पाठ
याद करने की सजाएं मुकर्रर कीं
हमें थी भिन्न
हमें कड़वा बीज गणित कर
अप्रिय तेज गंध वाले रसायन थे
कभी हाथ न आने वाली भौतिकी थी
कभी कभी सबसे बड़ा
उस जेल का अधिपति
जेलर हमसे मिलने आता
तब हमें बैरकों से
मैदान में खदेड़ा जाता
कंकड़ बिछे उस मैदान
की धूप में हम सफे में बैठाए जाते
बड़ा जेलर हमें सिखाता अच्छा कैदी
बनने के गुर
उसकी बात जेल का नाम रौशन
करने से शुरू होती और खत्म
ये अंधेरी सुरंग जैसे कभी
न खत्म होने वाले
जेल के दुख को काटते कई बार
मैंने जिंदगी को भी काटना चाहा
पर हम छोटे थे
हमें नहीं मालूम थे
खुद को खत्म करने के बहुत कामयाब रास्ते
थर्मामीटर तोड़ पारा गुटकने के
कभी उस जेल के पिछवाड़े बने
पुराने कुएं में छलांग के
कभी उस जेल की सबसे ऊंची
छत से गिर जाने के
सुने हुए रास्ते थे
पर हमको न तो घर में
न तो उस जेल में
मरना सिखाया नहीं गया था
जैसे कि जीना भी नहीं सिखाया गया था
सो हम मर भी न सके
हां हमको जो रोज रोज जेल तक छोड़ते थे वो गाड़ीवान
खालिस और सच्चे आदमी थे
बीड़ी पीने वाले
रिक्शों के खाली पाइप में गुल्लक बना
दस-बीस पैसे के सिक्के जोड़ने वाले
हमारे आस पास तब जो भी लोग थे
उनमें से यही थे जो
हमारा दुख समझते थे
और उस दुख को कम करने
कभी कभी
हमको कुल्फी खिलाते थे
वो खूब जिंदादिल लोग थे
जो बचपन में कभी जेल नहीं गए थे
गरीब और फटेहाल
गमछे बंडी वाले
हंसने खांसने वाले
चेचक के दाग वाले
सांवले चेहरे खूब याद हैं
बरस दर बरस बिता
जब मैं उस जेल से निकला
तो एक अदृश्य टाई मेरे गले
में कस गई
प्लास्टिक की एक नकली
मुस्कराहट जड़ गयी मेरे होंठों पर
जो कितना भी दुख दिखे
पिघलती नहीं थी
अब मैं एक छंटा हुआ शरीफ था
एक रोबोट
अब मैं आसानी से चूस सकता था
किसी का खून
चालाकियों की परखनली के रसायन को
पढ़ना मैं खूब जान चुका था
यहां तक कि वो खतरनाक
रसायन बनाना भी मैं सीख चुका था
जो जो मैं भगवान के घर से
सीखकर आया था वो सब
भुलाया गया मुझे उस जेल में
सभी नदियां वहां खुदवाई गईं
सभी जंगल जलाए गए
सभी पक्षी चुप कराए गए
सभी पहाड़ बौने किए गए
मेरे भीतर जो भी मुलायम बना
वो सब खुरदुरा किया गया
आज बरसों के बाद
मैं उस जेल के सामने
फिर आकर खड़ा हूं
देखता हूं
जेल की इमारत कुछ और
रंगीन हो गई है
जैसे कि कभी जहर रंगीन होता है
मेरी देह एक डायनामाइट हो गई है
वो बचपन की जेल जो मेरी
शिराओं तक में
दौड़ गई है उसको उड़ाना चाहता हूं
पर शीशे की तरह पिघलकर
ये जेल जो मेरे खून में बह रही है
मैं इसको निकाल नहीं सकता
ये मेरा सच है जिसे मैं
बचपन से अब तक ढोता हूं
जब भी मेरे भीतर कुछ उपजता है
सच्चा और क्वारा
मेरा खून ही उसको धो डालता है
मैं इस जेल को बार-बार
ना कहना चाहता हूं
मैं इस अंधी सुरंग को
ना कहना चाहता हूं
मैं बचपन के स्कूल को
मैं इस सुरंग को
इस जेल को
ना कहना चाहता हूं
तितलियां
तितलियां हैं तो ओस है,
चांदनी है, कच्ची धूप है,
रंग है, उजास है, आस है
तितलियां हैं तो
पीले चमकीले वलयों के बीच
एक मासूम धागे पर भी
गुजर जाता है
ठिठुरन भरा दिन
एक नया दिन आ जाता है.
पसीने से भीगी कविता
एक पसीने की कविता है
जो दरकते खेत में उगती है
वहीं बड़ी होती है
जिसमें बहुत कम हो गया है पानी
उस पहाड़ी नाले में नहाती है
अगर लहलहाती है धान
तब कजरी गाती है
इस कविता में रूमान बस उतना ही है
जितनी खेत के बीच
फूस के छप्पर की छांव है
या खेत किनारे अपने आप बढ़ आए
गुलमोहर का नारंगी रंग है
इस कविता को रेलगाड़ी में चढ़ा
शहर लाने की मेरी कोशिशें नाकाम हैं
ये कविता खलिहान से मंडी
तक बैलगाड़ी में रतजगा करती है
ये समर्थन मूल्य के बेरूख हो जाने पर
कसमसाती है
खाद बीज के अभाव और
पानी के षड्यंत्रों पर चिल्लाती है
कभी जब ब्लाक का अफसर
बहुत बेईमान हो जाता है
तो सांप-सी फनफनाती है
ये सचमुच अपने समय के साथ खड़ी होती है
ये गांव से कलारी हटाने के जुलूस में
शामिल होती है
ये कविता आंगन में बैठ
चरखे सा कातती है
रात रात अम्मा की
आंखों में जागती है
जिज्जी के गौने पर
आंखें भिगोती है
बाबू के गमछे को धोती है
कभी ऊसर सी सूख जाती है
कभी सावन सी भीग जाती है
ये पसीने से भीगी काली देह पर
भूसे की चिनमिनाहट है
ये बूढ़े बाबा की लाठी की आहट है
कविता गांव के सूखते पोखरे
के किनारे बैठ रोती है
जहां भी पानी चिड़िया पेड़ पहाड़
और आदमी होता है वहां
होती है
तुम क्यों न आये...
नेह की सप्तरंगी
धूप-छांव में ठिठककर
जहां पहली बार तुम मिले थे,
फिर पहुंचा वहां तो
तुम्हारी याद में रोकर
सड़क मुलायम हो गयी
जिस पर तुम चले थे.
सांझ बोझिल हुई,
आंखें पनीली...
अधूरे ख्वाबों के मासूम छौने
जिद में छूटकर बेतरह भागे
तुमको ढूंढने...
उनके साथ पतझड़ बिना
टूट कर पत्ते दौड़े खड़खड़ाकर
तुमको बुलाने...
पर तुम कहान थे
खो चुके समय की धुंध में .
रात की निस्तब्ध नीरव झील में
तुम्हारी याद की
नाव सी तिरती रही
रात भर जागा रहा
चकोरों की,रात के पहरूओं की
दीठ लेकर, भटका किया
भोर आई भी तो कैसी
विधवा के मंदिर गमन सी
क्लांत मद्धम...
रात के अनजान
बसेरों को छोड़कर
पंछी आऐ...
तुम न आऐ
बंधु.. तुम क्यों न आये...
गोधूलि
तुम क्यों मुझे चाहते हो...
गोधूलि मेरी देह में घट रही है डॉक्टर
तुम और मैं...दोनों तो जानते हैं ।
ठंडी राख हो रही है मेरी देह
पर बहुत भीतर मेरी आँखो में
तुमको क्यों आग दिखती है डॉक्टर..
हां...डॉक्टर!
रिस रहा है मेरी सांस का पानी
धधक रहा है मेरे भीतर के
हरे जंगल में दावानल
सूख रहा है मीठे पानी का पोखर
मेरे प्राण की चिड़िया उड़ा चाहती है
मेरी देह छीजता हुआ अंगवस्त्र हो गई है ..
खुलता हुआ उत्तरीय...
पर डॉक्टर...
मुझे थमती गोधूलि से आता
बचपन दिख रहा है
वो तुम्हारी उंगली ढूंढता है
गोधूलि में सना
वो घुटनों तुम्हारे पीछे भाग रहा है
इसलिए रोना नहीं डॉक्टर
जब मेरी धड़कन स्टेथस्कोप से
तुम्हारे कान को न छुए
तुम ढूंढो..और न मिले कलाई में स्पंदन
ओढाना मुझे हरी चादर
खुद से ही कहना-शी इज़ नो मोर
तब रोना नही डॉक्टर
गोधूलि मेरी देह में घट रही है
डॉक्टर..
कभी-कभी
कभी-कभी
कितना लुभाता है,
कुछ भी ना होना
बैठना...
तो बस बैठे हो जाना
सरकना सरकंडों को छूकर हवाओं का
बस सुनना
कुछ भी न गुनना
कभी-कभी...
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