ट्रंप–पुतिन वार्ता के निष्फल रहने का भारत पर क्या होगा असर, ‘अनप्रिडेक्टेबल ट्रंप’ की नीतियां कितना कर सकती हैं परेशान?
ट्रंप–पुतिन वार्ता
Vladimir Putin : टेस्ला और एक्स जैसी कंपनियों के मालिक एलन मस्क ने अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में ट्रंप की भरपूर मदद की और शायद अबतक का सबसे बड़ा दान $290–$300 मिलियन भी दिया. मस्क ने ट्रंप के लिए काफी प्रचार किया, लेकिन चुनाव में जीत के बाद मस्क और ट्रंप के रिश्ते खराब हो गए. मस्क और ट्रंप ने एक दूसरे पर आरोप लगाए और अंतत: यह गठबंधन टूट गया. यहां यह बताने की जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि ट्रंप भले ही पीएम मोदी को अपना मित्र बताते हों, लेकिन उन्होंने भारत पर बड़ा टैरिफ लगा दिया है. 15 अगस्त को ट्रंप और पुतिन के बीच अलास्का में वार्ता हुई, लेकिन मुद्दों पर सहमति नहीं बनी.
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Vladimir Putin : रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब अमेरिका के अलास्का में आमने-सामने बैठे तो पूरे विश्व की नजर इस बैठक पर थी. रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिकी टैरिफ के झगड़े का कुछ निदान निकलेगा इसकी उम्मीद की जा रही थी, लेकिन यह वार्ता एक तरह से निष्फल ही रही, क्योंकि जिस मुद्दे पर सहमति की उम्मीद थी, वो नहीं हो पाई. हालांकि इस बैठक को सफल दिखाने की कोशिश की गई है और यह भी कहा गया है कि इससे आगे का रास्ता बनेगा और संभवत: रूस-यूक्रेन युद्ध की समाप्ति पर सहमति बन जाए. उम्मीद है कि अगली बैठक मास्को में हो, ट्रंप ने बैठक को प्रोडक्टिव बताते हुए कहा है कि वे यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से बात करने के बाद ही आगे की बैठक के लिए कुछ कह पाएंगे. वहीं पुतिन ने यूक्रेन को भाई देश बताया और यात्रा को उपयोगी करार दिया है. यहां सवाल यह है कि इस असफल या अधूरी बातचीत का असर भारत पर क्या पड़ेगा, वह भी तब जब अमेरिका ने भारत पर टैरिफ अटैक किया है.
भारत-रूस संबंध और अमेरिका की परेशानी
आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है. भारत में तेल की खपत इतनी ज्यादा है कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल बाहर से खरीदता है. वर्तमान आंकड़े बताते हैं कि भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 35–40% तक है. इसी वजह से अमेरिका को परेशानी है और यह कहता है कि भारत, रूस से जितना तेल खरीदता है, उससे प्राप्त पैसों का उपयोग रूस यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में करता है. भारत के सामने दुविधा यह है कि अगर वह रूस से तेल लेना बंद कर दे तो ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी. वहीं अगर पश्चिमी दबाव को नजरअंदाज कर रूस से खरीद जारी रखे तो टैरिफ और प्रतिबंधों का खतरा बढ़ जाएगा.
ट्रंप-पुतिन वार्ता में भारत की चर्चा
ट्रंप और पुतिन की अलास्का वार्ता का फोकस पूरी तरह यूक्रेन पर था. अमेरिका चाहता था कि रूस कुछ रियायतें दे और युद्धविराम की दिशा में आगे बढ़े, लेकिन रूस अड़ा रहा और कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के मूल कारण का अंत किया जाए. इस बातचीत में भारत का नाम सीधे तौर पर नहीं आया, लेकिन भारत से जुड़ा मुद्दा अप्रत्यक्ष रूप से मौजूद रहा. अमेरिका यह जानता है कि रूस को सबसे बड़ी आर्थिक मदद भारत जैसे देशों से ही मिल रहा है. इस स्थिति में अगर शांति वार्ता से अमेरिका और रूस के रिश्ते सुधरते हैं, तो भारत पर लगे 25% टैरिफ में ढील की गुंजाइश बनती. लेकिन रूस और अमेरिका की वार्ता अधूरी रह गई, ऐसे हालात में भारत पर दबाव और बढ़ने की संभावना बन गई.
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भारत पर अमेरिका का टैरिफ दबाव
अमेरिका पहले ही इस बात के संकेत दे चुका है कि अगर रूस पर युद्ध रोकने का दबाव कामयाब नहीं होता, तो वह उन देशों को भी निशाने पर लेगा जो रूस को आर्थिक सहारा दे रहे हैं. इसमें भारत सबसे ऊपर है. अमेरिका भारत को घेरने की तैयारी में है, इसलिए उसने टैरिफ का खेल खेला है. अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर सेकेंडरी टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है. भारत के लिए यह बड़ी चिंता है क्योंकि सस्ते रूसी तेल से भारत को बहुत फायदा होता है.सेकेंडरी टैरिफ वैसे टैरिफ को कहते हैं, जो किसी प्रतिबंधित देश से व्यापार करने पर लगाया जाता है.इसके साथ ही अमेरिका यह भी चाहता है भारत अपनी विदेश नीति को प्रो अमेरिका कर ले और रूस का साथ छोड़ दे, जिसके लिए भारत तैयार नहीं है, क्योंकि रूस के साथ भारत की दोस्ती बहुत पुरानी है. भारत की विदेश नीति शुरुआत से गुटनिरपेक्ष की रही है, अभी अगर भारत रूस या अमेरिका में से किसी एक को चुनता है, तो उसके लिए परेशानी बढ़ सकती है. गुटनिरपेक्ष नीति के लिए अभी बड़ा कठिन समय है, लेकिन यही मोदी सरकार के लिए परीक्षा की घड़ी है. भारत की कूटनीति अगर अभी सफल हो जाती है, तो यह मोदी सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि होगी क्योंकि ट्रप बहुत ही अनप्रिडेक्टेबल पर्सनालिटी हैं.
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लेखक के बारे में
By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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