क्या है टैरिफ जिसको लेकर देश में मचा है बवाल, किसे मिलता है इसका लाभ और किसे होता है नुकसान?
टैरिफ क्या है
What is Tariff : क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ से भारत के निर्यात को भारी नुकसान पहुंचाने वाला है? क्या इस टैरिफ की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान होगा? क्या यह टैरिफ भारत-अमेरिका संबंधों को उस दौर में लेकर जाएगा, जब निक्सन अमेरिका के राष्ट्रपति थे. निक्सन के काल को भारत-अमेरिका संबंधों के इतिहास में सबसे खराब दौर के रूप में देखा जाता है. आखिर टैरिफ है क्या, जिसने इतना बवाल मचा रखा है.
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What is Tariff : अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ की चर्चा भारत के साथ-साथ पूरे विश्व में हो रही है. ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीतियों के नाम पर ट्रंप ने कई देशों पर टैरिफ लगाया है. भारत पर भी 7 अगस्त से 25% और 27 अगस्त से 50% टैरिफ लागू हो गया है. भारत के निर्यात पर अमेरिकी टैरिफ का व्यापक असर होने वाला है और संभव है कि कई कंपनियों की कमर टूट जाए. ट्रंप अपनी टैरिफ की नीतियों में क्या बदलाव लाते हैं और कैसे लाते हैं, यह अलग मुद्दा है, जिसपर देश की सरकार और कूटनीतिक विचार कर रहे हैं, लेकिन आम आदमी यह समझना चाहता है कि आखिर टैरिफ होता क्या है और यह कैसे वसूला जाएगा कि भारतीय कंपनियों को नुकसान होगा?
क्या है टैरिफ?

टैरिफ दरअसल एक टैक्स है, जिसे अमेरिका अपने देश में आयात करने वाली कंपनियों से वसूलता है. भारत लगभग 90 अरब डालर का निर्यात अमेरिका को करता है, जो देश के कुल निर्यात का लगभग 18% है. अमेरिका के 50% टैरिफ की वजह से भारतीय सामान महंगे हो जाएंगे जिसकी वजह से उनकी कीमत गिरेगी. भारतीय सामानों की मांग अमेरिका में कैसे गिरेगी, अगर आप यह सोच रहे हैं, तो इस बात को समझिए कि 50% टैरिफ की वजह से भारतीय सामान महंगे हो गए हैं. एक उदाहरण से समझिए भारत से एक पैंट आयात करने में उसकी कीमत 500 रुपए होती है. अब 50% टैरिफ लगेगा यानी पैंट की कीमत हो गई 500+250 (500 का 50 प्रतिशत 250 रुपए होगा) = 750 रुपए. यानी पहले जो पैंट 500 की मिलती थी वह अब 750 की हो गई. 750 रुपए कीमत होगी अमेरिका के उस कंपनी के लिए, जो भारत से सामान आयात करेगा. अब आयात करने वाली कंपनी उस पैंट पर लॉजिस्टिक लगाएगी, यानी वह खर्चा जोड़ेगी जो उसे माल को स्टोर तक पहुंचाने में लगेगा. मान लीजिए यह खर्च 100 रुपए होगा, तो अब पैंट की कीमत 850 रुपए हो जाएगी, और ग्राहक जो पैंट पहले 500 रुपए में खरीदता था उसे अब उस पैंट के लिए 850 रुपए देने होंगे. यानी कीमत में बढ़ोतरी 350 रुपए की हो गई है.
टैरिफ का फ्लो चार्ट
भारत में निर्माता ($500 )
│
▼
अमेरिका सीमा (Port of Entry)
│
अमेरिकी कस्टम
(50% टैरिफ = $ 250 वसूला)
│
├── $1000 → भारत के निर्यातक को
└── $500 → अमेरिकी सरकार के पास
│
▼
अमेरिकी आयातक (कुल लागत $1500)
│
लॉजिस्टिक और मुनाफा ($100)
▼
अमेरिकी ग्राहक (अंतिम कीमत $1600 चुकाता है)
कैसे और किस से वसूला जाता है टैरिफ
भारत पर अमेरिकी सरकार ने जो 50% टैरिफ लगाया है, उसके लिए भुगतना पड़ेगा अमेरिकी ग्राहकों को, इसकी वजह यह है कि अब उनके पास वह सामान 50% टैरिफ के साथ पहुंचेगा और उनकी जेब ज्यादा ढीली होगी. इसको ऐसे समझिए कि भारत से कोई ज्वेलरी अमेरिका आयात की जाती है और उसकी कीमत 5000 रुपए है. भारतीय कंपनी उस सामान को अमेरिका भेज देती है, अब जब वह सामान अमेरिकी आयातक कंपनी उठाती है, तो 50% टैरिफ की वजह से उसे 5000+2500=7500 रुपए देने पड़ते हैं. भारत से निर्यात करने वाली कंपनी को तो 5000 रुपए मिल जाते हैं, लेकिन शेष 2500 रुपए अमेरिकी सरकार के खाते में जाते हैं. अब जो कंपनी पहले 5000 रुपए में भारत से सामान खरीदती थी उसे 7500 रुपए उसी सामान को खरीदने के लिए देने पड़ेंगे. उसके बाद वह उसपर लॉजिस्टिक का खर्चा जोड़ेगा, मान लेते हैं कि यह खर्च 500 रुपए है, तो अब 7500 का सामान 8000 रुपए का हो गया और अमेरिका में जो ग्राहक उसके खरीदेगा उसे पहले 5000 में जो सामान मिलता था वह अब 8000 रुपए में मिलेगा.
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क्या होगा बढ़े हुए टैरिफ का असर
बढ़े हुए टैरिफ की वजह जब कोई सामान महंगी हो जाएगी तो बाजार में उसकी मांग कम हो जाएगी. इसकी वजह से आयातक उस सामान को मंगाना बंद कर देंगे या उस सामान को मंगाने के लिए दूसरा विकल्प तलाशेंगे, ऐसी स्थिति में भारतीय कंपनियों को बड़ा नुकसान होगा, क्योंकि उनका निर्यात प्रभावित होगा. ट्रंप की नीति यह है कि जब भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में महंगे या फिर बाजार से आउट हो जाएंगे तो अमेरिकी सामानों की बिक्री बढ़ेगी जिससे उनकी अमेरिका फर्स्ट की नीति को मजबूती मिलेगी. टाइम्स आॅफ इंडिया के अनुसार अमेरिकी टैरिफ की वजह से तमिलनाडु की कई कपड़ा कंपनियों के सामने चुनौती उत्पन्न हो गई और लगभग 6000 करोड़ रुपए का कारोबार खतरे में है. वहीं गुजरात और जयपुर की ज्वलरी कंपनियों के सामने भी बड़ा खतरा मंडरा रहा है. गुजरात की ज्वेलरी इंडस्ट्री के निर्यात में लगभग 70% की कमी आई है, वहीं हजारों नौकरियों पर भी संकट के बादल छा रहे हैं.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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