कश्मीर पर पाकिस्तानी सोच रखने वाली शबाना महमूद ब्रिटेन की पीएम बनीं, तो क्या होगा?

Edited by Rajneesh Anand
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शबाना महमूद

Shabana Mahmood : शबाना महमूद कश्मीर पर पाकिस्तानी सोच रखने वाली ब्रिटिश सांसद हैं और वर्तमान में वे वहां की होम सेक्रेटरी हैं. ब्रिटेन का होम सेक्रेटरी भारत के गृहमंत्री की तरह हैसियत रखता है. शबाना का मूल भी पीओके का मीरपुर है, जहां से उसका परिवार ब्रिटेन गया था. ऐसे में यह बड़ा सवाल कि अगर एपस्टीन फाइल्स की आग में ब्रिटिश पीएम कीर स्टारमर की कुर्सी चली गई और शबाना महमूद पीएम बनीं, तो क्या होगा?

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Shabana Mahmood : शबाना महमूद यह नाम विश्व की राजनीति पर हाल ही में चर्चा का केंद्र बन गया है, क्योंकि ऐसी संभावना जताई जा रही है कि शबाना महमूद ब्रिटेन की पहली मुस्लिम प्रधानमंत्री बन सकती हैं. शबाना महमूद पाकिस्तानी मूल की ब्रिटिश नागरिक हैं और उन्होंने आर्टिकल 370 को हटाने जाने का विरोध किया था. उन्होंने कश्मीर को लेकर कई बार भारत विरोधी तेवर दिखाया है, ऐसे में उनके प्रधानमंत्री बनने से क्या भारत और यूके के संबंधों पर असर पड़ सकता है?

कौन है शबाना महमूद?

शबाना महमूद लेबर पार्टी की तेज तर्रार नेता हैं. वह महज 45 साल की हैं. उनका जन्म इंग्लैंड के बर्मिंघम में हुआ है और वे एक पाकिस्तानी मूल के माता–पिता की संतान हैं. शबाना ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की है और शुरुआत में पेशे से वकील रही हैं और बाद में उन्होंने राजनेता बनने की ओर कदम बढ़ा दिया. शबाना का परिवार पीओके के मीरपुर से वास्ता रखता है. उनके पिता सिविल इंजीनियर हैं. शबाना ने शादी नहीं की है और अपने 4 भाई-बहनों में वो सबसे बड़ी हैं. 2010 में वे पहली बार संसद सदस्य (MP) के रूप में चुनी गईं. शबाना महमूद लेबर पार्टी की सदस्य हैं और कई महत्वपूर्ण पदों पर भी रह चुकी है. वर्तमान में वो होम सेक्रेटरी के तौर पर कार्यरत हैं. ब्रिटेन में होम सेक्रेटरी को भारत के गृहमंत्री के समकक्ष माना जा सकता है, लेकिन उसकी भूमिका विदेश नीतियों में भी अहम होती है. 2024 में शबाना ने न्याय मंत्री (Justice Secretary) और लॉर्ड चांसलर (Lord Chancellor) के रूप में भी सेवा दी.

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शबाना महमूद


ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर की कुर्सी पर खतरा क्यों मंडराया?

ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर सुपरमेरी जीत(बड़ी जीत) के साथ 5 जुलाई 2024 को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने थे, लेकिन एपस्टीन फाइल्स ने उनके लिए परेशानी खड़ी कर दी है. दरअसल कीर स्टारमर की परेशानी की वजह हैं पीटर मैंडेलसन. पीटर मैंडेलसन को कुछ समय पहले अमेरिका में ब्रिटिश राजदूत नियुक्त किया गया था और मैंडेलसन के संबंध जेफ्री एपस्टीन से थे. एपस्टीन फाइल्स में यह बताया गया है कि कि मैंडेलसन ने कई संवेदनशील जानकारी एपस्टीन को मेल की थी. इस मुद्दे को लेकर ब्रिटेन में बड़ा बवाल मचा हुआ है और प्रधानमंत्री की इस बात को लेकर आलोचना हो रही है कि आखिर उन्होंने ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति क्यों की. पीटर मैंडेलसन को पद से हटा दिया गया है, लेकिन ब्रिटेन में प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग हो रही है. हालांकि कीर स्टारमर ने इस्तीफा देने से मना किया है, लेकिन उनपर इस्तीफे का दबाव बहुत बढ़ गया है.

शबाना महमूद अगर ब्रिटेन की पीएम बनी, तो भारत के साथ बिगड़ेंगे संबंध?

शबाना महमूद पाकिस्तानी मूल की राजनेता हैं. इसी वजह से एक आम भारतीय के मन में यह सवाल है कि क्या शबाना महमूद के प्रधानमंत्री बनने से भारत के साथ ब्रिटेन के संबंध बिगड़ सकते हैं? इस शंका के बीच हमें कुछ बातों को समझना होगा. सबसे बड़ी बात यह है कि किसी भी देश की राजनीति और वहां की नीतियां राष्ट्रीय हित के अनुसार तय होती हैं ना कि किसी व्यक्ति के धर्म और उसके सोच के आधार पर. इस स्थिति में अगर शबाना महमूद ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बन भी जाती हैं, तो उनकी व्यक्तिगत राय का असर भारत और ब्रिटेन के संबंधों पर पर पड़ेगा इसकी संभावना शून्य है.

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यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि दोनों देशों के बीच संबंध व्यापार, निवेश और रक्षा सहयोग को लेकर हैं. यह संबंध दोनों देशों ने अपने–अपने राष्ट्रीय हित को देखकर बनाया है, ऐसे में अगर कोई एक व्यक्ति इस सहयोग को तोड़ना चाहे तो यह संभव नहीं होगा.

शबाना महमूद ने आर्टिकल 370 को हटाए जाने का विरोध किया है

शबाना महमूद ने कश्मीर के मुद्दे को लेकर कई बार भारत सरकार की आलोचना की है. उन्होंने कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त करने की भी आलोचना की थी. उन्होंने कहा था कि यह कश्मीरियों के अधिकारों के साथ विश्वासघात जैसा कदम है और आर्टिकल 370 को हटाना अस्थिरता पैदा कर सकता है. उन्होंने अपने लिखित और मौखिक बयानों में कई बार कश्मीर को भारत के अधिकार वाला कश्मीर बताकर यह स्पष्ट किया है कि कश्मीर को लेकर उनकी सोच क्या है और वो किस कदर कश्मीर के मसले पर पाकिस्तानी सोच रखती हैं. उन्होंने यह बात भी कही थी कि कश्मीर की स्थिति कैसी हो, यह वहां के लोगों को सोचने देना चाहिए.

ब्रिटेन के राष्ट्रीय हितों को दरकिनार नहीं कर पाएंगी शबाना महमूद : धनंजय त्रिपाठी

शबाना महमूद ब्रिटेन में होम सेक्रेटरी के पद पर आसीन हैं, इस लिहाज से वो काफी मजबूत स्थिति में हैं और उन्हें नेक्स्ट टू पीएम माना जाता है. बावजूद इसके यह कहना कि एपस्टीन फाइल्स की वजह से अगर कीर स्टारमर को पद छोड़ना पड़ा तो शबाना महमूद ही पीएम होंगी बहुत जल्दबाजी होगी. ब्रिटिश मीडिया में इस तरह की कोई बात अभी चल भी नहीं रही है. हां, वो पावरफुल हैं इसमें कोई दो राय नहीं है. उक्त बातें साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी ने प्रभात खबर के साथ बातचीत में कही.

धनंजय त्रिपाठी ने कहा कि जहां तक ब्रिटेन और भारत के संबंधों की बात है, तो पीएम कोई भी व्यक्ति और किसी भी तरह की विचारधारा रखता हो, वह राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं कर सकता है. इस लिहाज से शबाना महमूद ब्रिटेन के हितों की अनदेखी नहीं कर सकती हैं. जहां तक कश्मीर पर उनकी राय की बात है, तो एक सांसद के तौर पर बयान देना और एक प्रधानमंत्री के तौर पर निर्णय लेना दोनों में बहुत फर्क है. भारत और ब्रिटेन के बीच मजबूत व्यापारिक संबंध हैं और भारत एक मजबूत राष्ट्र है. शबाना महमूद पाकिस्तानी नहीं बल्कि ब्रिटिश नागरिक हैं, इसलिए वो हमेशा अपने देश की नीतियों और उसके हित के अनुसार ही फैसला करेंगी. फिर भी अभी यह कहना बहुत जल्दबाजी और कयास ही है कि शबाना महमूद ब्रिटेन की पीएम हो सकती हैं.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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