नवरात्रि के मौके पर जानें कितना रहस्यमयी है भगवान शंकर और माता पार्वती का मिलन स्थल कामाख्या मंदिर

Edited by Rajneesh Anand
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कामाख्या मंदिर

Navratri In Kamakhya Temple : कामाख्या मंदिर 51 शक्तिपीठों में सबसे अद्‌भुत माना जाता है. यहां देवी सती का योनि गिरा था और इस मंदिर में देवी के उसी स्वरूप की पूजा की जाती है. ऐसी मान्यता है कि जिस नीलाचल पर्वत पर देवी मंदिर है, वहां माता सती और भगवान शंकर का मिलन होता था, इस वजह से भी यह मंदिर कई रहस्य को खुद में समेटे है. नवरात्रि के मौके पर यहां माता पार्वती की विशेष पूजा होती है. यह समय तंत्र सिद्धि के लिए भी बहुत खास होता है.

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Navratri In Kamakhya Temple : देश में नवरात्रि की धूम है और देवी दुर्गा के मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना का दौर जारी है. देवी दुर्गा यानी आदि शक्ति को समर्पित इस नवरात्रि के त्योहार में उनके नौ विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है. नवरात्रि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक पर्व है. नवरात्रि के दौरान ही मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था, इसी वजह से सभी देवी मंदिरों में नवरात्रि के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. देवी मंदिरों में शक्ति पीठों का विशेष महत्व है. देश में कुल 51 शक्ति पीठ हैं, जिनमें से कामाख्या मंदिर का महत्व बहुत ज्यादा है. इस मंदिर में पूजा का विशेष विधान है और यह तंत्र सिद्धि करने वालों के लिए बहुत खास माना जाता है. इसी वजह से इस मंदिर से कई रहस्य भी जुड़े हुए हैं.

कहां है कामाख्या मंदिर क्या है इतिहास?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब देवी सती के शोक में भगवान शंकर उनके शरीर को उठा कर इधर-उधर भटक रहे थे, तब भगवान विष्णु ने उनका मोहभंग करने के लिए उनके शरीर को टुकड़ों में काट दिया था. शरीर के टुकड़े जहां गिरे वहां देवी का शक्ति पीठ है. असम के गुवाहाटी शहर के नीलाचल पहाड़ी पर देवी कामाख्या का विश्व प्रसिद्ध मंदिर है. इस मंदिर में देवी का योनि अंग गिरा था, जिसकी यहां पूजा होती है. इस मंदिर से ना सिर्फ कई रहस्य जुड़े हैं, बल्कि इसके निर्माण को लेकर भी कई तरह के धार्मिक और ऐतिहासिक तर्क दिए जाते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार इस मंदिर की स्थापना सबसे पहले कामदेव ने भगवान विश्वकर्मा की मदद से करवाई थी. वह मंदिर वर्तमान मंदिर से बहुत ही बड़ा था. मंदिर का स्थापत्य और मूर्तिकला विभिन्न आश्चर्य से परिपूर्ण था. बाद में मंदिर का ऊपरी हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया.

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार कामाख्या मंदिर को प्रसिद्धि ब्रह्मपुत्र घाटी के पहले सर्वोच्च शासक नरक के समय मिली. लेकिन राजा नरक के उत्तराधिकारियों के इतिहास से यह स्पष्ट नहीं होता है कि उन्होंने मंदिर का संरक्षण किया था या नहीं. ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह स्पष्ट नहीं होता है कि सर्वप्रथमक इस मंदिर का निर्माण किसने कराया था. वर्तमान कामाख्या मंदिर, जिसका पुनर्निर्माण 1565 ई में उसी स्थान पर स्थित 11वीं-12वीं शताब्दी के एक पाषाण मंदिर के अवशेषों का उपयोग करके किया गया था, का समग्र स्थापत्य स्वरूप दो अलग-अलग शैलियों, अर्थात् पारंपरिक नागर या उत्तर भारतीय और अरब या मुगल, के संयोजन से निर्मित किया गया था.

कामदेव ने कराया था मंदिर का निर्माण

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कामाख्या मंदिर में दुर्गा पूजा

देवी सती के बाद भगवान शंकर समाधि में लीन हो गए थे और तारकासुर का आतंक काफी बढ़ गया था. उस वक्त देवताओं को यह ज्ञात हुआ कि भगवान शंकर का पुत्र ही तारकासुर की हत्या कर सकता है. तब देवताओं के आग्रह पर कामदेव ने भगवान शिव पर अपना बाण चलाया, लेकिन जब भगवान शंकर की समाधि टूटी, तो उन्होंनेक क्रोधित होकर अपनी तीसरी आंख खोली और कामदेव का भस्म कर सिया. कामदेव के भस्म होने के बाद कामदेव की पत्नी रति ने भगवान शिव से विनती की और कहा कि इसमें कामदेव का कोई दोष नहीं है, देवताओं ने उन्हें ऐसा करने को कहा था.

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उन्होंने भगवान शिव से कामदेव को पुनर्जीवित करने का अनुरोध किया.उनके अनुरोध को स्वीकार करते हुए भगवान शिव ने कामदेव को जीवनदान दिया. लेकिन उनका सुंदर शरीर लुप्त हो गया था, तब रति और कामदेव ने उनसे पुराने स्वरूप की मांग की, तब भगवान शंकर ने कामदेव को नीलाचल पर्वत पर देवी की पवित्र योनि मुद्रा खोजने और वहां देवी की पूजा करने की सलाह दी, तभी वह अपना सौंदर्य पुनः प्राप्त कर पाएंगे. कई वर्षों की साधना के बाद, कामदेव सफल हो गए. देवी की कृपा से उन्हें उनका सुंदर शरीर भी वापस मिल गया, तब कृतज्ञ कामदेव ने विश्वकर्मा की सहायता से देवी की योनि मुद्रा के ऊपर एक भव्य मंदिर बनवाया. बाद में इस क्षेत्र को कामरूप के नाम से जाना जाने लगा क्योंकि कामदेव ने यहां अपना सौंदर्य पुनः प्राप्त किया था.

भगवान शंकर और देवी पार्वती का मिलन स्थल है कामाख्या का मंदिर

शाक्त संप्रदाय के सबसे पवित्र ग्रंथों में से एक है कालिका पुराण. कालिका पुराण के अनुसार प्राचीन कामरूप में नीलाचल नामक स्थान का उल्लेख है, जहां भगवान शिव और शक्ति अपनी भौतिक कामना अर्थात काम की पूर्ति करते थे. इसीलिए यहां किसी देवी की मूर्ति नहीं है, बल्कि योनि मुद्रा की पूजा होती है. यह स्थान सृष्टि और प्रजनन शक्ति का प्रतीक माना जाता है. कालिका पुराण में कामाख्या मंदिर के बारे में कई विवरण हैं. योगिनी तंत्र, एक अन्य प्राचीन साहित्य है जो लगभग 16वीं शताब्दी में रचा गया माना जाता है, जिसमें देवी कामाख्या का उल्लेख मिलता है. ‘योगिनी तंत्र’ में प्रजनन के प्रतीक के रूप में कामाख्या के उद्भव से संबंधित कथा है. मां कामाख्या या कामेश्वरी कामनाओं की प्रसिद्ध देवी हैं. यहां तंत्र विद्या की साधना करने वाले तांत्रिक अपनी सिद्धि की पूर्ति के लिए आते हैं.

नवरात्रि में विशेष तांत्रिक पूजा का महत्व

शारदीय नवरात्र जिसे असम के कामाख्या मंदिर में दुर्गा पूजा के नाम से जाना जाता है, इसकी पूजा पूरे नौ दिनों तक होती है. इस अवसर पर यहां तांत्रिक पूजा, विशेष अनुष्ठान और बलि पूजा होती है. इस अवसर पर यहां मां के नौ रूपों की पूजा होती है. साथ ही देवी के दस अवतार दस महाविद्या की भी यहां पूजा होती है.कामाख्या मंदिर परिसर में मां कामाख्या, दसमहाविद्या और भगवान शंकर के पांच मंदिर हैं.

कामाख्या का प्रसिद्धि अंबुबाची मेला

कामाख्या मंदिर के सबसे प्रसिद्ध आयोजनों में शामिल है अंबुबाची मेला. यह मेला आषाढ़ मास में आयोजित किया जाता है. इस मेले के दौरान मंदिर के कपाट तीन दिनों के लिए बंद रहते हैं और मंदिर में किसी को भी प्रवेश नहीं दिया जाता है. ऐसी मान्यता है कि इन तीन दिनों में देवी रजस्वला रहती हैं, यानी उन्हें पीरियड्‌स होता है. इन तीन दिनों के लिए जब मंदिर का कपाट बंद किया जाता है, तो योनि मुद्रा पर एक सफेद कपड़ा ढंक दिया जाता है. जब चौथे दिन मंदिर खुलता है तो वह सफेद कपड़ा लाल हो चुका होता है. कपड़ा गीला भी रहता है. उस कपड़े के टुकड़े को यहां प्रसाद स्वरूप प्रदान किया जाता है. मंदिर के बगल में स्थित ब्रह्मपुत्र नदी का पानी अंबुबाची मेले के दौरान लाल हो जाता है क्योंकि माता रजस्वला होती हैं. हालांकि वैज्ञानिक इस तर्क को स्वीकार नहीं करते हैं, लेकिन मां कामाख्या के प्रति लोगों की श्रद्धा इसे सच मानती है.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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