Monsoon Session : क्या राहुल गांधी कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में जान फूकेंगे? दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर से खास इंटरव्यू

आगामी संसद का मानसून सत्र केवल विधायी कामकाज का मंच नहीं होगा, बल्कि यह इस बात की भी परीक्षा लेगा कि भारत का लोकतंत्र असहमति, विरोध और सवाल पूछने की नई प्रवृत्तियों को कैसे संभालता है. इस मुद्दे पर हमने दिल्ली यूनिवर्सिटी की सहायक-प्रोफेसर डॉ. चांदनी सेनगुप्ता से बात की.
Monsoon Session : जोहार. आज है 13 जुलाई.
20 जुलाई 2026 से शुरू होने वाला संसद का मानसून सत्र केवल विधायी कामकाज का मंच नहीं होगा, बल्कि यह इस बात की भी परीक्षा लेगा कि भारत का लोकतंत्र असहमति, विरोध और सवाल पूछने की नई प्रवृत्तियों को कैसे संभालता है. इसी पृष्ठभूमि में काकरोच जनता पार्टी यानी CJP का जंतर-मंतर से संसद तक मार्च, केवल एक प्रदर्शन नहीं बल्कि राजनीतिक संचार के बदलते स्वरूप का संकेत भी बन गया है.
इस मुद्दे पर हमने दिल्ली यूनिवर्सिटी की सहायक-प्रोफेसर डॉ. चांदनी सेनगुप्ता से बात की. उनके विचारों से निकला सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या यह नया उभार वास्तविक जन-आक्रोश का विस्तार है? या फिर सोशल मीडिया के युग में पनपी ऐसी राजनीति, जो स्थायी समाधान देने के बजाय केवल भावनाओं को उबालती है? लोकतंत्र में विरोध का अधिकार अनिवार्य है, लेकिन विरोध की हर अभिव्यक्ति लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का पर्याय नहीं बन जाती! आईये डॉ. सेनगुप्ता से इस पुरे मुद्दे को समझते है.
‘संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है. लेकिन इस बार संसद से पहले सड़कों की चर्चा ज्यादा क्यों है?’
डॉ. सेनगुप्ता: क्योंकि आज राजनीति केवल संसद में नहीं होती. अब राजनीति मोबाइल स्क्रीन पर भी होती है. पहले कोई आंदोलन खड़ा करने में महीनों लगते थे. आज एक वायरल वीडियो, एक हैशटैग या कुछ छोटी-छोटी रीलें लाखों लोगों तक कुछ घंटों में पहुंच जाती हैं.
20 जुलाई 2026 से शुरू होने वाला मानसून सत्र ऐसे समय में आ रहा है, जब दिल्ली में एक नया समूह, काकरोच जनता पार्टी (CJP), सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में आया है. जंतर-मंतर पर उसके प्रदर्शन ने भी लोगों का ध्यान खींचा. इसलिए संसद के भीतर बहस होगी, लेकिन संसद के बाहर भी विरोध की राजनीति दिखाई दे सकती है.
‘CJP आखिर है क्या?’
डॉ. सेनगुप्ता: बताया जाता है कि CJP का गठन मई 2026 में हुआ. इसकी पहचान मुख्य रूप से सोशल मीडिया के जरिए बनी. इसके कई चेहरे पहले अलग-अलग राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों या मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े रहे हैं.
इसलिए इसे पूरी तरह नया जन-आंदोलन कहने से पहले हमें यह समझना होगा कि इसके पीछे संगठन कौन चला रहा है, इसके संसाधन कहां से आ रहे हैं और इसका दीर्घकालिक लक्ष्य क्या है.
‘सोशल मीडिया पर तो ऐसा लगता है कि CJP के पीछे पूरा देश खड़ा है.’
डॉ. सेनगुप्ता: यही आज की सबसे बड़ी चुनौती है.
सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली लोकप्रियता और जमीन पर वास्तविक समर्थन हमेशा एक जैसे नहीं होते.
बीस सेकंड की रील बनाना आसान है. एक प्रभावशाली नारा लिखना भी आसान है. लेकिन हजारों लोगों को लगातार संगठित रखना, नीति बनाना और लोकतांत्रिक संगठन चलाना बहुत कठिन काम है.
डिजिटल दुनिया कभी-कभी वास्तविक समर्थन का भ्रम भी पैदा कर देती है.
‘लेकिन विरोध करना तो लोकतंत्र का अधिकार है?’
डॉ. सेनगुप्ता: बिल्कुल.
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना आवश्यक है. विपक्ष, मीडिया, नागरिक संगठन और आम जनता, सभी सवाल पूछ सकते हैं.
लेकिन एक अंतर समझना जरूरी है.
यदि कोई आंदोलन किसी नीति की आलोचना करता है, तो वह लोकतंत्र को मजबूत करता है.
लेकिन यदि हर संस्था;
संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, प्रशासन, पुलिस, सभी को बिना प्रमाण लगातार अविश्वसनीय बताया जाने लगे, तो धीरे-धीरे जनता का लोकतंत्र पर ही भरोसा कमजोर होने लगता है.
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि संस्थाओं पर लोगों के विश्वास से भी चलता है.

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‘तो क्या CJP को भी सवालों का जवाब देना चाहिए?’
डॉ. सेनगुप्ता: बिल्कुल.
यदि कोई संगठन सरकार से पारदर्शिता मांगता है, तो उसे स्वयं भी पारदर्शी होना चाहिए.
उदाहरण के लिए—
- संगठन को पैसा कौन दे रहा है?
- निर्णय कौन लेता है?
- नेतृत्व कैसे चुना जाता है?
- क्या कोई लिखित नीतिगत एजेंडा है?
- यदि किसी पुराने राजनीतिक दल से संबंध हैं, तो क्या उन्हें सार्वजनिक किया गया है?
लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं होती. आंदोलन भी जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं.
‘मानसून सत्र में सरकार को CJP से किस तरह की चुनौती मिल सकती है?’
डॉ. सेनगुप्ता: यदि CJP अपनी डिजिटल पहुंच बनाए रखता है, तो सरकार को कई स्तरों पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है.
- पहला, सोशल मीडिया पर लगातार ट्रेंड और अभियान चलाकर सरकार के हर निर्णय को चुनौती देने की कोशिश हो सकती है.
- दूसरा, संसद के बाहर विरोध-प्रदर्शन, धरना और जनसभाओं के जरिए राजनीतिक माहौल बनाया जा सकता है.
- तीसरा, युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं के बीच सरकार के खिलाफ असंतोष को संगठित करने का प्रयास हो सकता है.
- चौथा, संसद में विपक्ष जिन मुद्दों को उठाएगा, उन्हें सोशल मीडिया पर और अधिक भावनात्मक तथा वायरल रूप देकर सरकार पर अतिरिक्त दबाव बनाया जा सकता है.
- पाँचवां, यदि बेरोजगारी, महंगाई, परीक्षा, शिक्षा, भ्रष्टाचार या नागरिक अधिकार जैसे मुद्दों पर जनता की पहले से चिंता है, तो CJP उन्हें अपने अभियानों का केंद्र बना सकता है.
हालांकि यह भी उतना ही सच है कि किसी भी आंदोलन की स्थायी सफलता केवल नारों से नहीं, बल्कि संगठन, विश्वसनीयता और स्पष्ट नीतियों से तय होती है.

‘क्या केवल आक्रोश से राजनीति चल सकती है?’
डॉ. सेनगुप्ता: कुछ समय तक शायद हां.
लेकिन लंबे समय तक नहीं
इतिहास बताता है कि सफल आंदोलनों ने केवल विरोध नहीं किया. उन्होंने समाधान भी दिए.
उन्होंने कानूनों में सुधार सुझाए.
नई नीतियां प्रस्तावित कीं.
वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत किए.
यदि कोई आंदोलन केवल गुस्सा पैदा करता है, लेकिन समाधान नहीं देता, तो धीरे-धीरे उसका प्रभाव कम होने लगता है.
‘तो युवाओं को क्या करना चाहिए?’
डॉ. सेनगुप्ता: युवाओं को हर सूचना पर तुरंत विश्वास नहीं करना चाहिए.
किसी भी वायरल वीडियो या भाषण से पहले कुछ प्रश्न जरूर पूछिए—
- इसका स्रोत क्या है?
- तथ्य क्या कहते हैं?
- क्या दूसरी तरफ की बात भी सुनी गई है?
- क्या केवल भावनाएं दिखाई जा रही हैं या समाधान भी बताए जा रहे हैं?
डिजिटल युग में सबसे बड़ा लोकतांत्रिक कौशल है: सोचना, जांचना और फिर निर्णय लेना.
‘क्या राहुल गांधी कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में जान फूकेंगे?’
डॉ. सेनगुप्ता: राहुल गांधी सबसे बड़े विपक्षी चेहरा है. उनकी पार्टी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है. अभिजीत दीपके और राहुल गांधी के विरोध के मुद्दे एक हो सकते है, पर राहुल गांधी अपनी ही पैर पर कुल्हाड़ी क्यों मारेंगे?
खास बातें
मानसून सत्र केवल संसद की कार्यवाही नहीं होगा. यह संसद और सोशल मीडिया, दोनों के बीच चल रही नई राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी समय होगा.
CJP जैसे नए डिजिटल समूह यह दिखाते हैं कि आज राजनीति कितनी तेजी से बदल रही है. वे सरकार पर दबाव बना सकते हैं, नए मुद्दों को राष्ट्रीय बहस में ला सकते हैं और युवाओं को सक्रिय कर सकते हैं.
साथ ही, किसी भी आंदोलन की विश्वसनीयता उसकी पारदर्शिता, तथ्य-आधारित राजनीति, लोकतांत्रिक मूल्यों के सम्मान और ठोस नीतिगत विकल्पों पर निर्भर करती है.
लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है. लेकिन उतना ही आवश्यक है कि असहमति जिम्मेदारी, तथ्यों और संस्थाओं के प्रति सम्मान के साथ व्यक्त की जाए. तभी विरोध लोकतंत्र को मजबूत बनाता है, कमजोर नहीं.
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लेखक के बारे में
By अचल प्रियदर्शी
अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.
उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.
उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.
साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.
ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;
Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)
बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)
International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)
ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)
झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)
जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)
Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)
उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)
बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)
International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)
Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)
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