गाजियाबाद : मोबाइल गेम दिमाग को हाइजैक करके मरने का डर करता है खत्म

ऑनलाइन गेमिंग के दुष्प्रभाव
mobile gaming : मोबाइल या ऑनलाइन गेम इस तरह से डिजाइन किये जाते हैं कि बच्चे उस आभासी दुनिया को ही असली दुनिया समझने लगें. इससे बच्चों की ईगो से दूरी हो जाती है. यहां ईगो का अर्थ अहं नहीं है, बल्कि सचेत होने की स्थिति है.
Mobile Gaming : गाजियाबाद में तीन बहनों ने एक साथ बालकनी से कूदकर आत्महत्या कर ली है. ऑनलाइन गेमिंग की लत को इसके पीछे की वजह बताया जा रहा है. ऑनलाइन गेम किस तरह बच्चों का जीवन बर्बाद कर रहा है और किस तरह बच्चे इसकी जाल में फंस जाते हैं और इसका निवारण क्या है, इन तमाम बातों पर संदीप आनंद, प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से विशेष बातचीत.
मोबाइल गेम या वर्चुअल दुनिया बच्चों के दिमाग को किस तरह हाइजैक कर लेती है कि उनमें मरने का डर खत्म हो जाता है?
मोबाइल या ऑनलाइन गेम इस तरह से डिजाइन किये जाते हैं कि बच्चे उस आभासी दुनिया को ही असली दुनिया समझने लगें. इससे बच्चों की ईगो से दूरी हो जाती है. यहां ईगो का अर्थ अहं नहीं है, बल्कि सचेत होने की स्थिति है. जब ईगो से दूरी हो जाती है, तो ऐसी स्थिति में वो जो अनोखी दुनिया है, वह वास्तविक लगने लगती है. ऐसी स्थिति में जो वास्तविक मृत्यु होगी उसका अहसास ही नहीं होगा. दूसरी बात, गेम में यदि बार-बार मरने-जीने की बातें होगी, तो उससे गेम खेलने वालों में जीने-मरने का डर समाप्त हो जायेगा. तीसरी और महत्वपूर्ण बात यह है कि जब हम उत्तेजित करने वाली चीजें करते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में डोपामाइन हार्मोन का स्राव अधिक होता है, उससे हमारे भीतर आवेग बढ़ जाता है, जो हमें आत्मघाती प्रवृत्ति की तरफ ले जा सकता है.
तीन बहनों का एक साथ जान देना क्या शेयर्ड साइकोसिस का मामला है? क्या एक बच्चे की सनक या भ्रम साथ रहने वाले दूसरे भाई-बहनों को भी मानसिक रूप से संक्रमित कर सकती है?
दो-तीन बच्चे जो एक साथ रहते हैं, खेलते हैं, वे एक साथ मिलकर, यानी सामूहिक रूप से एक काम को अंजाम दे सकते हैं, यदि गेम उस ढंग से डिजाइन किया गया है तो. देखिए, समूह के स्तर पर जब लोग आभासी दुनिया में प्रवेश करते हैं, ताे वे एक साथ भ्रम की स्थिति में आ सकते हैं. एक बच्चा जो काम कर रहा है, उसे देखकर दूसरे बच्चे का इमोशन ट्रिगर होगा और इस तरह भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी और फिर उसमें सभी बच्चे शामिल हो जायेंगे. जिसे आप शेयर्ड साइकोसिस कह रहे हैं, वह वास्तव में भ्रम की ही स्थिति है.
ऑनलाइन गेमिंग या मोबाइल पर वीडियो या रील देखना कब तक सुरक्षित है और कब इसे लेकर सतर्क हो जाना चाहिए?
उ. यहां पेरेंटिंग का नियम यह कहता है कि माता-पिता को अपने बच्चों के मोबाइल देखने का घंटा निर्धारित कर देना चाहिए कि आप इतने से इतने बजे तक मोबाइल देखेंगे या गेम खेलेंगे. दूसरी बात, यदि बच्चे के व्यवहार में आपको बदलाव देखने को मिले, जो सामान्य तौर पर उसके स्वभाव का हिस्सा नहीं है, तो माता-पिता को सतर्क हो जाना चाहिए. बच्चा यदि अवसाद में चला जाये, या गुमसुम हो जाये, या लगातार किसी बात को सोचने लगे या समाज से कट जाये, तो यह स्थिति उसे आत्महत्या की तरफ धकेल सकती है. ऐसी स्थिति में बच्चे को लेकर पूरी सावधानी बरती जानी चाहिए. ऐसे बच्चे को लोगों के बीच लाना चाहिए. यानी उसे अकेले नहीं छोड़ना चाहिए.
अगर लगे की बच्चे को लत लग रही है तो उसे मोबाइल से दूर करने का तरीका क्या है?
बच्चों के लिए मोबाइल देखने का एक समय तय कर दिया जाये. इस स्थिति में बच्चों के लिए गोल्डन रूल ही लागू होगा.
बच्चों की निगरानी कैसे की जाये, क्या उनकी डायरी पढ़ना या चोरी-चुपके उनके मोबाइल चेक करना सही है. बच्चे ऐसी किसी लत का शिकार न हों, इसके लिए हर घर में कौन सा एक ‘गोल्डन रूल’ लागू होना चाहिए?
गोल्डन रूल तो यह कहता है कि माता-पिता को हर सप्ताह कम से कम चार-पांच घंटे अपने बच्चों के साथ बिताना चाहिए. यदि माता-पिता ऐसा नहीं कर पायेंगे, तो बच्चे की सामाजिक भावनाएं कमजोर हो जायेगी और वह अपनी सामान्य आदतों से हटकर व्यवहार कर रहा है, यह माता-पिता को पता ही नहीं चलेगा. माता-पिता का बच्चों के साथ चार-से-पांच घंटा बिताना इसलिए जरूरी है, क्योंकि ऐसा करके वे जान सकते हैं कि बच्चे के मन में क्या चल रहा है.
ऐसी स्थिति में फर्स्ट साइकोलॉजिकल एड, यानी प्रथम मनोवैज्ञानिक सहायता भी मदद कर सकती है. यानी यदि बच्चे के किसी पड़ोसी या उसके टीचर भी उसके व्यवहार में कुछ असामान्य बदलाव महसूस करें, तो बच्चों के माता-पिता या घरवालों को बता सकते हैं. इस तरह की सतर्कता भी बच्चों को आत्मघाती प्रवृत्ति की ओर धकेलने से बचा सकती है.
अंत में, यह संकट सामूहिक है, जब तक इसके मूल कारणों को पहचान कर उसे दूर नहीं किया जायेगा, तब तक यह समस्या दूर नहीं होगी. ऐसी घटनाओं के होने का मूल कारण है पेरेंटिंग का कमजोर होना. पेरेंटिंग को मजबूत करने की जरूरत है और इसका अर्थ है कि बच्चों को न अत्यधिक छूट दी जाये, न ही उन पर बहुत अधिक अंकुश लगायी जाये. यानी मध्यम मार्ग अपनाया जाये.
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