लैला कबीर की मौत ने याद दिलाया फायरब्रांड नेता जॉर्ज फर्नांडिस से उनका प्रेम, शादी, अलगाव और जया जेटली से संबंध

Edited by Rajneesh Anand
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लैला कबीर ,जया जेटली , जॉर्ज फर्नांडिस

Leila Kabir : लैला कबीर क्या आप इस नाम से परिचित हैं? अगर नहीं तो जानिए कि यह नाम 70 के दशक में काफी चर्चा में रहा था. वजह यह थी कि उस जमाने के फायरब्रांड समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस से लैला कबीर की शादी हुई थी. लैला कबीर का जीवन सुर्खियों के बीच ही बीता, लेकिन उनके निधन की सूचना सुर्खियां नहीं बटोर सकीं. लैला कबीर का निधन गुरुवार की शाम को 88 साल की उम्र में दिल्ली स्थित उनके आवास में हो गया. लैला कबीर और जार्ज फर्नांडिस का संबंध काफी रोचक अंदाज में जुड़ा था उनकी प्रेम कहानी में मिलन, विरह और तीसरे व्यक्ति की एंट्री भी थी, लेकिन आजीवन वे पति-पत्नी ही रहे.

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Leila Kabir : पूर्व रक्षामंत्री और दिग्गज समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस की पत्नी लैला कबीर का गुरुवार की शाम को निधन हो गया. लैला कबीर के पिता हुमायूं कबीर जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल थे. लैला कबीर एक आत्मनिर्भर महिला थी और रेडक्राॅस सोसाइटी से जुड़ी थी. लीला कबीर ने आॅक्सफोर्ट यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी. पिछले दो साल से वे कैंसर से पीड़ित थीं, लेकिन निधन उनका घर पर हुआ. उनके बेटे शाॅन फर्नांडिस उनके साथ थे.

कैसे हुई थी जॉर्ज फर्नांडिस और लैला कबीर की मुलाकात

जॉर्ज फर्नांडिस और लैला कबीर की मुलाकात एक हवाई यात्रा के दौरान हुई थी. पहली मुलाकात में ही दोनों एक दूसरे को दिल दे बैठे थे और महज कुछ सप्ताह की पहचान में दोनों ने 22 जुलाई 1971 को शादी कर ली थी. शादी के बाद 1974 में उनके बेटे शॉन फर्नांडिस का जन्म हुआ. जॉर्ज फर्नांडिस और लैला कबीर अलग-अलग पृष्ठभूमि के थे बावजूद इसके दोनों ने शादी की. लेकिन जैसे-जैसे जॉर्ज फर्नांडिस राजनीति में अधिक सक्रिय होते गए, लैला से उनकी दूरी बढ़ती गई. लैला कबीर को उनके निजी जीवन में किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं था, लेकिन जॉर्ज फर्नांडिस राजनीति में रम गए थे. इस वजह से वे परिवार को समय नहीं दे पाते थे और लैला कबीर को उनकी यह बात पसंद नहीं आ रही थी, जिसकी वजह से दोनों के बीच दुराव हो गया. 1984 में दोनों के बीच अलगाव हो गया, हालांकि जॉर्ज फर्नांडिस और लैला कबीर ने तलाक नहीं लिया था.

जॉर्ज फर्नांडिस के जीवन में जया जेटली का प्रवेश

जॉर्ज फर्नांडिस से अलगाव के बाद लैला कबीर विदेश में ही ज्यादा रहती थीं. उन्होंने खुद को सामाजिक कार्यों में व्यस्त कर लिया था और जॉर्ज फर्नांडिस राजनीति में पूरी तरह रम गए थे. इसी बीच उनके जीवन में जया जेटली का प्रवेश हुआ, जो ना सिर्फ कार्य क्षेत्र में उनकी संगिनी बनी, बल्कि आजीवन उनका साथ दिया. जया जेटली के पति अशोक जेटली जॉर्ज फर्नांडिस के मंत्रालय में सेक्रेटरी थे. इसी वजह से जया और जॉर्ज के बीच नजदीकी बढ़ी. दोनों ने साथ में राजनीति की और खास मित्र बन गए. पति से तलाक के बाद जया ने अपना पूरा जीवन जॉर्ज फर्नांडिस को ही समर्पित कर दिया. जया ने अल्जाइमर और पार्किंसन से पीड़ित जॉर्ज फर्नांडिस की बहुत सेवा की. जिस वक्त उनकी अपनी पत्नी उनके साथ नहीं थी, उस वक्त जया जेटली ने पूरी निष्ठा के साथ उनका साथ दिया.

जया जेटली और लैला कबीर का टकराव

जया जेटली और लैला कबीर दो ऐसी महिला थीं, जिनके जीवन में जॉर्ज फर्नांडिस का बहुत महत्व था,लेकिन दोनों महिलाओं के बीच कोई खास रिश्ता नहीं था. जब जॉर्ज फर्नांडिस की तबीयत बहुत बिगड़ गई और ऐसा प्रतीत होने लगा कि उनका अंत समय नजदीक है, तो लैला कबीर ने 2009 में वापसी की और अपना हक जताया. जॉर्ज फर्नांडिस चूंकि बीमारी से पीड़ित थे, इसलिए वे कुछ भी करने में असमर्थ थे. लैला ने जया जेटली का जॉर्ज फर्नांडिस से मिलना बंद करा दिया, चूंकि अधिकारिक पत्नी लैला कबीर ही थी, इसलिए विवाद बढ़ा और कोर्ट तक पहुंचा. कुछ संपत्ति का भी विवाद था, लेकिन कोर्ट ने जया जेटली को जॉर्ज फर्नांडिस से मिलने और उनकी सेवा करने की अनुमति दे दी. 2019 में जॉर्ज फर्नांडिस का निधन हो गया, उस वक्त जया उनके साथ ही थीं और उन्होंने ही मृत्यु की जानकारी भी दी थी.

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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