GST रिफाॅर्म का झारखंड पर क्या होगा असर, आखिर क्यों प्रदेश ने केंद्र सरकार से की है क्षतिपूर्ति की मांग?
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण और झारखंड के वित्तमंत्री राधाकृष्ण किशोर
GST Reform And Jharkhand : जीएसटी रिफाॅर्म का उद्देश्य देश में उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद बढ़ाना है. सरकार के इस फैसले पर झारखंड सरकार ने आपत्ति दर्ज कराते हुए क्षतिपूर्ति की मांग की है, क्योंकि टैक्स कम होने से राज्य सरकार के जीएसटी संग्रह में गिरावट आएगी. झारखंड एक गरीब राज्य है, इसलिए जीएसटी रिफाॅर्म का असर प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा
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GST Reform And Jharkhand : केंद्र सरकार ने जीएसटी के टैक्स स्लैब में बदलाव करके आम आदमी को बड़ी राहत तो दी है, लेकिन कई राज्य इस रिफाॅर्म से खुश नहीं हैं, जिनमें से एक झारखंड भी है. जीएसटी कांउसिल की बैठक में झारखंड ने अपने विरोध को दर्ज भी कराया था. झारखंड के अलावा जिन राज्यों ने जीएसटी रिफाॅर्म पर आपत्ति दर्ज कराई उनमें हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, पंजाब, तमिलनाडु, तेलंगाना और बंगाल हैं. इन सभी राज्यों में बीजेपी की सरकार नहीं है.- Intro
जीएसटी सुधार का झारखंड पर क्या होगा असर
जीएसटी रिफाॅर्म के बाद टैक्स स्लैब टू टियर स्ट्रक्चर में होंगे. सरकार ने टैक्स स्लैब को 5% और 18% में बांट दिया है. 12 और 28 प्रतिशत के स्लैब को खत्म कर दिया गया है. सरकार ने घरेलू मांग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से साबुन से लेकर छोटी कारों तक सैकड़ों उपभोक्ता वस्तुओं पर जीएसटी दरों में कटौती की है. अब बाजार में डिमांड बढ़ने से वस्तुओं की बिक्री तो बढ़ेगी, लेकिन उसपर टैक्स कम लगेगा. इस टैक्स स्लैब से झारखंड को नुकसान होगा और उसका जीएसटी संग्रह कम हो जाएगा. जीएसटी संग्रह कम होने से राजस्व प्रभावित होगा.यही वजह है कि झारखंड ने जीएसटी रिफाॅर्म पर आपत्ति दर्ज कराते हुए केंद्र सरकार से भरपाई की मांग की है.
जीएसटी रिफाॅर्म पर झारखंड ने क्या आपत्ति दर्ज कराई
जीएसटी रिफाॅर्म पर झारखंड के वित्तमंत्री राधाकृष्ण किशोर ने मीटिंग से पहले और मीटिंग में यह कहा है कि हमें 2,000 करोड़ प्रतिवर्ष का नुकसान होगा. अत: हमें इस क्षतिपूर्ति की गारंटी दी जाए. वित्त मंत्री ने कहा कि झारखंड एक ऐसा राज्य है जहां की अर्थव्यवस्था खनिज आधारित है. झारखंड खनिज का उत्पादन करता है, लेकिन कोयला–स्टील जैसे उत्पादकों का 75–80% बाहर के राज्यों को जाता है. अब इसका असर यह होता है कि कोयला और स्टील जैसे उत्पादों का GST उन राज्यों को मिलता है जहां इनका उपभोग होता है, क्योंकि जीएसटी डेस्टिनेशन-बेस्ड टैक्स है. इसका परिणाम यह होता है कि अगर दिल्ली में स्टील ज्यादा बेची गई तो आमदनी दिल्ली को ज्यादा होगा, जबकि झारखंड को इससे फायदा कम मिलेगा. इसलिए झारखंड ने क्षतिपूर्ति की मांग की है.
झारखंड में मांग बढ़ने की संभावना कम : अर्थशास्त्री हरेश्वर दयाल
केंद्र सरकार ने जीएसटी को तर्कसंगत बनाने का प्रयास किया है, जो स्वागत योग्य है. करों के सरलीकरण से आम आदमी और व्यापारी दोनों को लाभ होता है, लेकिन करों के इस स्वरूप से झारखंड को नुकसान होगा. उक्त बातें अर्थशास्त्री हरेश्वर दयाल ने प्रभात खबर के साथ खास बातचीत में कही. उन्होंने बताया कि सरकार ने जीएसटी के टैक्स स्लैब में बदलाव डिमांड को बढ़ाने के लिए किया है. इसका कारण यह है कि अमेरिकी टैरिफ ने हमारे सामानों की मांग वहां कम कर दी है. अब सरकार इसकी भरपाई देश में डिमांड को बढ़ाकर करना चाह रही है. सरकार के इस प्रयास से टैरिफ का असर कितना कम होगा, यह बात अलग है, लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि झारखंड के एक गरीब राज्य है, जहां आम आदमी की क्रय शक्ति यानी सामान खरीदने की क्षमता कम है. यहां प्रति व्यक्ति आय भी अन्य राज्यों की तुलना में कम है. 2023–24 में झारखंड का प्रति व्यक्ति वार्षिक आय एक लाख पांच हजार दो सौ चौहत्तर ( 105274) रुपए था. इसका अर्थ यह है कि एक झारखंडी की प्रतिमाह आय 9 हजार रुपए के करीब है. देश के केवल दो राज्य (बिहार एवं उत्तर प्रदेश) की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय झारखंड से कम है. आय कम होने की वजह से यहां उपभोग (consumption) भी कम होता है. इसका अर्थ यह है कि जीएसटी रिफाॅर्म के बाद भी यहां डिमांड उस अनुपात में नहीं बढ़ेगी कि सरकार की क्षतिपूर्ति हो जाए. डिमांड उन राज्यों में ज्यादा बढ़ेगा, जो अमीर हैं और जहां प्रति व्यक्ति आय अधिक है. परिणाम यह होगा कि कुछ वर्षों में उनके राजस्व में सुधार हो जाएगा.
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राज्यों को CGST से मिलने वाले अंशदान में भी कमी आएगी
जीएसटी रिफाॅर्म से बेशक कर वसूली में कमी आएगी. इस बात को समझाते हुए अर्थशास्त्री हरेश्वर दयाल बताते हैं कि जीएसटी में केंद्र सरकार का भी हिस्सा होता है. अब चूंकि टैक्स कम कर दिया गया है तो केंद्र के हिस्से में जो कर जाता था यानी CGST उसमें भी कमी आएगी. पहले यह होता था कि केंद्र सरकार CGST में से सभी राज्यों को अंशदान देती थी, अब उस अंशदान में भी कमी आएगी, जो झारखंड के लिए बड़ी चिंता का विषय है. इसी वजह से झारखंड सरकार ने कम से कम पांच साल के लिए क्षतिपूर्ति की मांग की है.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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