अकेलापन समाज में बन रहा डिफाॅल्ट सेटिंग, फ्रेंडशिप का आया रेसेशन
फ्रेंडशिप रिसेशन
Friendship Recession : एक विज्ञापन कुछ साल पहले बहुत प्रसिद्ध था-क्योंकि हर एक फ्रेंड जरूरी होता है. इस छोटे से स्लोगन में जीवन को सुखद पाने का रहस्य छिपा है. हाल ही में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक रिसर्च ने बताया है कि अमेरिका में दोस्ती का रिसेशन आ गया है और दोस्ती की कमी की वजह से आम लोग मानसिक के साथ-साथ शारीरिक बीमारियों के भी शिकार हो रहे हैं. यह समस्या अब ग्लोबल होती जा रही है और इसकी वजह से बर्थ रेट पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है.
Friendship Recession : आधुनिक समाज में अकेलापन डिफॉल्ट सेटिंग की तरह पनपता जा रहा है. इसकी वजह से समाज बिखर रहा है और आदि मानव से आधुनिक मानव बना इंसान ना केवल शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी बहुत प्रभावित हो रहा है और यह स्थिति बहुत ही खतरनाक बनती जा रही है. अमेरिका के विश्व प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी हार्वर्ड में किए गए शोध में यह सच्चाई सामने आयी है.
अमेरिका में Friendship Recession यानी दोस्ती की मंदी का दौर
हार्वर्ड केनेडी स्कूल (Harvard Kennedy School) की छात्रा कैरोलिन ब्रुकमैन ने अपने रिसर्च में यह बताया है कि अमेरिकी समाज में दोस्ती कम होती जा रही है और लोगों में दोस्ती को बनाए रखने की इच्छा और क्षमता भी कमजोर हो गई है. वहां के समाज में इसे Friendship Recession यानी दोस्ती की मंदी का नाम दिया गया है. रिसर्च में जो आंकड़े सामने आए हैं वो और भी डराने वा ले हैं. आंकड़ों के अनुसार 1990 के बाद से अबतक उन लोगों की संख्या 12% हो गई है, जो यह कहते हैं कि उनके पास कोई करीबी दोस्त ही नहीं हैं. करीबी दोस्त रखने वालों की संख्या लगभग तीन गुना घट गई है. 2014 से पहले तक आम अमेरिकी दोस्तों के साथ सप्ताह में 7 घंटे गुजारते थे, लेकि अब वह महज 4 घंटे प्रति सप्ताह रह गया है. उनके लिए यह सूचना चौंकाने वाली हो सकती है, जो लोग सामाजिक जीवन की कमी के लिए कोविड को जिम्मेदार ठहरा रहे थे.
- Friendship Recession के खतरनाक संकेत
- 12% अमेरिकियों के पास कोई करीबी दोस्त नहीं
- दोस्ती का समय घटकर 4 घंटे प्रति सप्ताह
- Solo Dining में 29% की बढ़ोतरी
- 40% लोगों के पास सिर्फ ऑनलाइन दोस्त
- जेनरेशन Z सबसे ज्यादा प्रभावित
सिर्फ समाज की संरचना नहीं, संस्कृति भी जिम्मेदार
अमेरिका में दोस्ती की मंदी का जो दौर चल रहा है, उसके लिए समाज की संरचना मात्र ही जिम्मेदार नहीं है. यह सच है कि आपसी मेलजोल का घटना, शहरीकरण का प्रभाव और पार्क, कम्युनिटी सेंटर और काॅफी शाॅप का कम होना जिम्मेदार हैं. रिसर्च कहता है कि हमें यह भी देखना होगा कि आखिर अकेले बाहर खाना, जिसे सोलो डाइनिंग कहते हैं, वो किस सोच के साथ बढ़ रहे हैं. अमेरिका में अकेले खाना खाने की प्रवृत्ति आम लोगों में पिछले दो वर्षों में 29% बढ़ी है. सामाजिक कटाव को देखते हुए अमेरिका में सामाजिक जीवन को जीवित करने की ट्रेनिंग दी जा रही है.
सामाजिक जीवन पर हावी हुआ काम
हार्वर्ड के रिसर्च में बताया गया है कि आज के समय में इंसान का काम ही उसकी सबसे बड़ी पहचान बन गया है . आम आदमी काम के औसत घंटों से ज्यादा काम करता है. वह मशीन बनकर रह गया है. यहां तक कि 65 वर्ष से अधिक आयु के कामकाजी लोगों का की संख्या भी अब 19% हो गई है. रिश्तों पर करियर हावी हो गया है, जिसने समाज का संतुलन बिगाड़ दिया है.
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इंटेंसिव पैरेंटिंग ने समाज का संतुलन बिगाड़ने में मुख्य भूमिका निभाई
आधुनिक समाज के माता–पिता अपने बच्चों पर विशेष ध्यान देते हैं और पूरा समय बच्चों की देखभाल में ही गुजारते हैं, जिसकी वजह से वे अपने अन्य महत्वपूर्ण रिश्तों को महत्व नहीं देते हैं. वे अब बाहर जाने की बजाय अपने बच्चें के साथ घर पर रहते हैं और दोस्ती के नाम पर डिजिटल दोस्ती कर रहे हैं. लगभग 40% अमेरिकियों के पास केवल ऑनलाइन दोस्त हैं. जेन जी की स्थिति यह है कि वे स्कूल के बाहर दोस्तों के साथ प्रतिदिन सिर्फ 40 मिनट बिताते हैं. ऑनलाइन दोस्ती ने स्क्रीनटाइम तो बढ़ाया ही है साथ ही स्ट्रेस और बेचैनी को भी बहुत बढ़ा दिया है.
क्या कहता है न्यूरोसाइंस?
हार्वर्ड के रिसर्च में जॉन कैसियोप्पो बताते हैं कि न्यूरोसाइंस यह कहता है कि अकेलापन इंसान में निगेटिविटी को बढ़ाता है. इसकी वजह से इंसान अपने आसपास नकारात्मक चीजों को बढ़ाने लगता है और इस वजह से दिमाग उसके उन्हीं संवेदनाओं को बढ़ा देता है, जो उसे दर्द का अहसास कराते हैं. वह किसी से मिलने–जुलने में डर का अनुभव करता है. लेकिन असामाजिकता उसे अंत में अकेलेपन के जोखिम में डाल देती है. इस स्थिति से निकलने के लिए मनुष्य को यह याद रखना होगा कि वह एक सामाजिक प्राणी है और इसके बिना उसका जीवन संभव नहीं है.
क्या भारत पर हो सकता है असर?
भारत में दोस्ती की मंदी जैसी स्थिति तो नहीं है, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि भारत, अमेरिका से आने वाली बयार को अपनाता है. शहरी भारत में रिश्तों की मर्यादा खत्म हो चुकी है. मेट्रो शहरों में न्यूक्लियर परिवार बढ़ते जा रहे हैं, सामाजिक गतिविधि कम हो रही है. काम का बोझ लगातार बढ़ रहा है और डिजिटल का समाज आम लोगों को अपने कब्जे में कर रहा है. इसकी वजह से मानसिक और शारीरिक दोनों तरह की समस्या बढ़ रही है, इसलिए भारत के लोगों को सावधान रहने की जरूरत तो है.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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