संघर्ष पानी का : सूर्योदय के साथ शुरू होती पानी की तलाश , गर्भवती होने पर भी जारी रहती है जद्दोजहद

Author : शिवांश श्रीवास्तव Published by : Rajneesh Anand Updated At : 19 May 2026 1:19 PM

विज्ञापन

जल संकट का सामना करती महिलाएं

Clean Water Crisis : हरियाणा के नूह जिले में सूर्योदय के साथ ही औरतें और लड़कियां हाथों में मटका और बाल्टियां लेकर कुंड के आसपास जमा होने लगती हैं. कुंड दरअसल अंडरग्राउंड पानी की टंकी है, जहां से पीने का पानी लेने के लिए औरतें जमा होती हैं.

विज्ञापन

यह स्टोरी मूल से Asian Dispatch में 11 मई को प्रकाशित है, जिसका हिंदी अनुवाद प्रभात खबर में उनकी अनुमति से प्रकाशित किया गया है.

Clean Water Crisis : लगभग 12,200 की आबादी वाले इस गांव के लिए पीने के पानी का एकमात्र जरिया ये कुंड हैं. पानी में लवण यानी नमक की मात्रा अधिक होने की वजह से ग्राउंडवाटर पीने लायक नहीं माना जाता है.प्रदेश में राज्य सरकार यह दावा करती है कि उन्होंने केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन- हर घर जल के तहत सभी ग्रामीण घरों में नल के पानी के कनेक्शन दे दिए हैं, जबकि हमने पाया कि या तो इन नलों में पानी नहीं है या पाइपलाइन सभी घरों तक नहीं पहुंची है.

कुएं का पानी खारा हो गया है और घरों तक नल का पानी नहीं पहुंचा

water-crisis-in-haryana
घरों तक पानी नहीं पहुंचा, कुंड जाकर पानी लाती हैं महिलाएं

82 साल की शकीला सिर्फ 17 साल की थीं, जब उनकी शादी हुई और वे मालब गांव में बस गईं. वह अपने दो बेटों के साथ रहती हैं और कहती हैं कि पहले गांव में कुएं थे. पानी मीठा था, लेकिन इतने सालों में, यह खारा हो गया है. नल अभी भी हमारे घरों तक नहीं पहुंचे हैं. मैंने अपनी पूरी जिंदगी सिर पर बाल्टियां ढोते हुए बिताई हैं. अब मेरा सिर कमजोर हो गया है, पानी ढोना अब मुश्किल काम है. जल शक्ति मंत्रालय के तहत काम करने वाली सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड द्वारा जारी नेशनल ग्राउंड वॉटर क्वालिटी रिपोर्ट 2025 के अनुसार, हरियाणा ग्राउंड वॉटर में नमक के मामले में तीसरे नंबर पर है. रिपोर्ट में बताया गया है कि राजस्थान, पंजाब और हरियाणा जैसे इलाकों में एवापोरेशन(वाष्पीकरण) की दर ज्यादा है, जिसकी वजह से ग्राउंडवॉटर में नमक का जमाव हो जाता है. जब पानी एवापोरेट होता है, तो मिट्टी या ग्राउंडवॉटर में नमक ज्यादा कंसंट्रेट हो जाता है, जिससे EC (इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी) ज्यादा हो जाती है, जो पीने के पानी और खेती दोनों के लिए नुकसानदेह है.

ये अंडरग्राउंड पानी की टंकियां सरपंच बनवाते हैं और उसके रखरखाव की भी जिम्मेदारी उठाते हैं. इन टंकियों की क्षमता 18,000 लीटर तक पानी की है और जरूरत के हिसाब से उन्हें भरा जाता है. कुंड के पास मिली 60 साल की महिला मकसुइया बताती हैं कि एक साल पहले, हमें पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी, लेकिन अब पास में लगे अंडरग्राउंड टैंकों ने दूरी कम कर दी है, लेकिन मेहनत उतनी ही करनी पड़ती है.

गांव के कुछ लोगों का कहना है कि इन टैंकों पर अक्सर लंबी लाइन लगती है और जब कुंड में पानी खत्म हो जाता है, तो उन्हें पानी लाने के लिए पास के गांवों में जाना पड़ता है. इस स्थिति में उन्हें थकावट, बेहोशी और बार-बार डिहाइड्रेशन का सामना करना पड़ता है. लोगों ने यह भी बताया कि पानी की इस कमी का सबसे अधिक असर छोटी लड़कियों और महिलाओं पर पड़ता है.

गर्भवती महिलाओं को पानी के लिए करना पड़ता है संघर्ष

26 साल की अर्शी सात महीने की प्रेग्नेंट है और उसे कुछ भी भारी उठाने से मना किया गया है, लेकिन वह अपने परिवार के लिए पानी लाने रोजाना अंडरग्राउंड टैंक पर आती हैं. टैंक से पानी निकालते हुए वह कहती हैं, मेरा पति काम पर बाहर जाता है और पानी ही सब कुछ है. अगर मुझे पानी पीना है तो मुझे ये भारी बाल्टियां उठानी पड़ती हैं. जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है और घरों में पानी की मांग बढ़ती है, महिलाओं को दिन में कई बार अंडरग्राउंड टैंक के चक्कर लगाने पड़ते हैं.

महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ रहा खराब असर

भारत में पिछले 50 सालों से पानी बचाने पर काम कर रहे एक एनजीओ तरुण भारत संघ (TBS) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मौलिक सिसोदिया बताते हैं कि जिस तरह गांव की महिलाएं पानी के लिए संघर्ष करती हैं इसका महिलाओं की जिंदगी पर बहुत गहरा असर पड़ता है. उनकी पूरी जिंदगी पानी की तलाश में ही निकल जाती है, कई औरतें बच्चे के जन्म से कुछ दिन पहले तक भी पानी ढोती रहती हैं, परिणाम यह होता है कि वे पीठ दर्द की समस्या से परेशान रहती हैं. इसके अतिरिक्त भी उनमें कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं दिखती हैं.

लड़कियों की शिक्षा होती है बाधित

नूह में स्कूल ड्रॉपआउट रेट पिछले कुछ सालों में और खराब हो गया है. द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025-2026 में यह राज्य के एवरेज 3.05 के मुकाबले 12.84 था. हालांकि पानी की कमी ड्रॉपआउट रेट बढ़ने का अकेला कारण नहीं है, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसका लड़कियों की पढ़ाई पर सीधा असर पड़ता है. परिवार अक्सर छोटी लड़कियों को स्कूल जाने से मना कर देते हैं क्योंकि वे पानी भरने जैसे घर के कामों में मदद करती हैं. नूह जिले में पानी की कमी पर TBS की एक रिपोर्ट में कहा गया है, अगर स्कूल में पानी और साफ टॉयलेट नहीं हैं, तो स्कूल से एब्सेंट होना जल्दी ही ड्रॉपआउट में बदल जाता है.

विधानसभा में उठ चुका है मामला

एशियन डिस्पैच से बात करते हुए, नूह के विधायक आफताब अहमद ने बताया कि उन्होंने कई बार विधानसभा में इस मसले पर चिंता जताई है. लेकिन उन्होंने यह माना कि यहां पानी की सप्लाई डिमांड पूरी करने के लिए काफी नहीं है. इस समस्या को स्वीकारते हुए हरियाणा के पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर विनय प्रकाश चौहान ने कहा कि सरकार मलाब में अलग-अलग इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है. उन्होंने कहा, हम खास तौर पर पानी की सप्लाई और सीवरेज सिस्टम के लिए अलग-अलग प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं और हम हर व्यक्ति को 135 लीटर पानी देने के लिए एक डेडिकेटेड वॉटर बूस्टिंग स्टेशन बना रहे हैं.

अंडरग्राउंड टैंकों की साफ-सफाई बड़ी चिंता

पानी की गुणवत्ता की जांच

मलाब गांव में लोगों के लिए अंडरवाटर टैंक ही पीने के पानी का एकमात्र जरिया है, लेकिन टैंकों की सफाई नहीं होने की वजह से पानी की क्वालिटी खराब हो जाती है.गांव की एक महिला अवीदा कहती हैं, आस-पास का इलाका साफ नहीं है,हमारे मेहमान वह पानी पीने से मना कर देते हैं जिस पर हम जिंदा रहते हैं. वे कहते हैं ‘हम उस पानी से हाथ भी नहीं धोएंगे जो आप पीते हैं,लेकिन हम क्या कर सकते हैं? हमारे पास कोई और ऑप्शन नहीं है.मिनिस्ट्री ऑफ कंज्यूमर अफेयर्स, फूड एंड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन के तहत आने वाले ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स के अनुसार, पीने के पानी के लिए टोटल डिजॉल्वड सॉलिड्स (TDS) 500 mg/L से कम होना चाहिए, लेकिन यह भी कहा गया है कि कोई दूसरा सोर्स न होने पर 2,000 mg/L तक TDS मजबूरी में स्वीकार्य है. इन अंडरग्राउंड टैंकों के पानी का TDS 451 mg/L है, पीने योग्य पानी की बेहतर क्वालिटी के अंदर आता है.

पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग की सीनियर पब्लिक हेल्थ स्पेशलिस्ट डॉ सुवर्णा गोस्वामी कहती हैं, TDS आइडियली 50–150 mg/L के बीच होना चाहिए. 150–300 ठीक है, और 500 mg/L तक ज्यादा से ज्यादा स्वीकार्य है. इससे अधिक होने पर पानी की क्वालिटी खराब हो जाती है, और 1200 mg/L से ऊपर यह पीने लायक नहीं रहता. उनका कहना है कि 451 mg/L की मात्रा तय लिमिट के अंदर है, लेकिन यह अधिकतम लिमिट के करीब है. अगर सालों तक इसी क्वालिटी का पानी इस्तेमाल किया जाता है, तो उसका असर सेहत पर असर पड़ सकता है. इस पानी का इस्तेमाल करने वालों में हाइपरटेंशन, दिल की बीमारियां, स्ट्रोक और किडनी की समस्याएं हो सकती हैं.

पानी में खारापन कई वजहों से होता है, जैसे ज्योग्राफिकल और हिस्टॉरिकल वजहें, शहरीकरण और क्लाइमेट चेंज.मौलिक सिसोदिया बताते हैं कि यह इलाका कभी समुद्र के नीचे था और लाखों सालों में पानी कम होने के साथ, खारापन इस पूरी जगह में ही बना रहा. उनका कहना है कि इंसानी गतिविधियों की वजह से पिछले कुछ सालों में हालात और खराब हुए हैं. बारिश का पानी पहले जमीन में समा जाता था और खारे पानी को ऊपर आने से रोकता था, लेकिन हमने इस प्राकृतिक प्रक्रिया को बाधित कर दिया है.साथ ही, गुरुग्राम जैसे आसपास के क्षेत्रों में तेजी से शहरीकरण और भूजल के अत्यधिक दोहन ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है. पानी निकालने की दर इतनी अधिक रही है कि जमीन के नीचे मौजूद नमक धीरे-धीरे ऊपर की ओर आने लगा है. शहरीकरण की मांग और जलवायु परिवर्तन भी भूजल की गुणवत्ता में गिरावट और पानी की कमी के प्रमुख कारण हैं.

समस्या का निदान खुद तलाशना

मलाब गांव के कुछ लोगों ने अपने घरों में भूमिगत टैंक बनाए हैं, लेकिन यह एक महंगा समाधान है, खासकर ऐसे गांव के लिए जहां ज्यादातर लोग खेती या दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं. गांव के एक किसान साजिद के परिवार में पांच लोग हैं, वो कहते हैं कि टैंक बनाने में हमें 70,000 से 80,000 रुपये खर्च करने पड़े हैं. वे बताते हैं कि आसपास के आठ-नौ परिवारों ने मिलकर यह खर्च उठाया ताकि उन्हें गांव के सामुदायिक टैंक तक बार-बार न जाना पड़े.लेकिन इन टैंकों को एक बार भरवाने की लागत लगभग 2,000 रुपये आती है. गर्मी का मौसम के आते ही पानी की मांग बढ़ेगी और इन टैंकों को बार-बार भरवाने की जरूरत पड़ेगी, जिससे इसका खर्च भी बढ़ेगा. जिस गांव में औसत मासिक आय 10,000 से 12,000 रुपये के बीच है, उनके लिए यह स्थिति परेशान करने वाली है. साजिद कहते हैं कि इस खर्च को संभालना मुश्किल हो जाता है. गांव के ज्यादातर परिवार पानी और पैसे दोनों को बांटकर काम चलाते हैं.

जो लोग व्यक्तिगत टैंक नहीं बनवा सकते, वे या तो स्थानीय लोगों द्वारा लगाए गए ओवरहेड पाइपलाइन से आने वाले खारे पानी पर निर्भर हैं या फिर रोजमर्रा के काम जैसे कपड़े धोना, नहाना आदि के लिए तालाब का उपयोग करते हैं. तालाब का पानी बहुत अधिक प्रदूषित है और इसका TDS स्तर 2683 mg/L है. डॉ गोस्वामी कहते हैं कि इतना अधिक TDS वाला पानी साफ-सफाई और धुलाई के लिए भी उपयुक्त नहीं है. वे चेतावनी देते हैं कि लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से त्वचा रोग हो सकते हैं.

आगे का रास्ता

विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान केवल बुनियादी ढांचे के विकास तक सीमित नहीं होना चाहिए. सिसोदिया कहते हैं कि जल जीवन मिशन जैसी पहल इस समस्या का पूरा समाधान नहीं कर सकतीं. महज पाइप बिछा देने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि पानी भी आएगा. वे जोर देते हैं कि नूह जैसे क्षेत्रों में, जहां भूजल पहले से खारा है, असली चुनौती पानी की आपूर्ति का स्रोत है, न कि केवल उसका वितरण. सोशल एंड पॉलिटिकल रिसर्च फाउंडेशन (SPRF) की एक रिपोर्ट में समुदाय आधारित जल संचयन प्रणाली को मजबूत करने और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक बनाने पर जोर दिया गया है. सृजन (SRIJAN) संस्था के प्रोग्राम मैनेजर आशीष अंबष्ठ कहते हैं, समुदाय को केंद्र में रखना होगा. उन्हें योजना बनाने, योगदान देने और निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना जरूरी है.वे कहते हैं कि लगातार भागीदारी, स्थानीय स्वामित्व और व्यवहार में बदलाव जरूरी है, वरना ढांचे तो बन जाएंगे, लेकिन टिक नहीं पाएंगे.

सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए गुरुजल संस्था, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के सहयोग से, मलाब और घासेरा गांवों में तीन साल का हस्तक्षेप कार्यक्रम शुरू करने की योजना बना रही है. गुरुजल की सह-संस्थापक और सीईओ शुभी केसरवानी कहती हैं कि उनका लक्ष्य प्रशासनिक खामियों को दूर करना है, क्योंकि दोनों गांवों में पीने के पानी की भारी कमी, उच्च लवणता और एक्टिव नल-जल आपूर्ति का अभाव है. जलसंकट के दीर्घकालिक समाधान के लिए इसमें कुंड निर्माण, वर्षा जल संचयन, तालाबों का पुनर्जीवन और पब्लिक-प्राइवेट मॉडल के तहत आरओ प्लांट लगाने की योजना शामिल है.

हालांकि यह जल संकट सिर्फ मलाब, नूह, हरियाणा या भारत तक सीमित नहीं है. दक्षिण एशिया में बदलते मौसम और घटते भूजल स्तर के कारण स्वच्छ पानी की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन गई है.यूनिसेफ के अनुसार, इस क्षेत्र में लगभग 34.7 करोड़ बच्चे उच्च या अत्यधिक जल संकट का सामना कर रहे हैं. जल प्रदूषण और उसका खारापन दक्षिण एशिया के बड़े हिस्सों को प्रभावित कर रहे हैं.

भारत में लगभग 1.93 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र लवणता से प्रभावित है और 19 राज्यों के 119 जिलों में फ्लोराइड की वजह से जल प्रदूषण की समस्या है.बांग्लादेश में 3.5 से 7.7 करोड़ लोग आर्सेनिक युक्त पानी के संपर्क में हैं, जबकि पाकिस्तान में सिंध और पंजाब की लगभग 36% आबादी दूषित पानी से प्रभावित है.नेपाल में स्थिति अपेक्षाकृत कम गंभीर है, लेकिन वहां भी पानी में आर्सेनिक की मात्रा बहुत बड़ा खतरा है.

मलाब में लोग अपने घरों तक पानी पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं, वहीं उनकी मुश्किलें पूरे दक्षिण एशिया की एक बड़ी सच्चाई को दिखाती हैं, जहां पानी तक लोगों की पहुंच पक्की नहीं है और पानी की सुरक्षा भविष्य के लिए बड़ा सवाल बन गई है.

ये भी पढ़ें : History of Munda Tribes 5 : पड़हा राजा के हाथों में होती थी शासन की कमान, आम सहमति से होते थे सभी कार्य

विज्ञापन
शिवांश श्रीवास्तव

लेखक के बारे में

By शिवांश श्रीवास्तव

शिवांश श्रीवास्तव is a contributor at Prabhat Khabar.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola