H-1B Visa पर 3 साल तक रोक लगाने वाला बिल अमेरिकी संसद में पेश, कानून बना तो भारतीयों की नौकरी पर खतरा
Published by : Rajneesh Anand Updated At : 24 Apr 2026 6:19 PM
एच-1 बी वीजा बिल अमेरिकी संसद में पेश
H-1B Visa : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में एच-1 बी वीजा का मुद्दा हमेशा गरमाता रहता है, क्योंकि उन्होंने अमेरिका फर्स्ट की नीति घोषित की है. एच-1 बी वीजा के जरिए बाहर के लोगों को अमेरिका में पढ़ने और नौकरी करने का अवसर मिलता है, जिसकी वजह से अमेरिकियों को नुकसान उठाना पड़ता है, ऐसा वहां के कुछ कट्टरपंथी सोच वाले लोग मानते हैं. इस वजह से एच1बी वीजा को लेकर एक नया बिल अमेरिकी संसद में पेश हुआ है. आइए समझते हैं, इसमें क्या है खास:-
H-1B Visa : एच-1 बी वीजा एक बार फिर चर्चा में है. इसकी वजह यह है कि इस वीजा को लेकर एक नया बिल अमेरिकी संसद, कांग्रेस में पेश किया गया है. इस बिल को कांग्रेस की मेंबर एली क्रेन ने 22 अप्रैल को पेश किया है. इस बिल में जिस तरह के प्रावधान किए गए हैं वे एच-1बी वीजा पाने वालों की राह में बड़ा बाधक हो सकते हैं.
एच-1बी वीजा से जुड़े नए बिल में क्या है खास?
एच-1 बी वीजा पाने वालों में सबसे बड़ा हिस्सा भारतीयों का है. 2022-2023 के आंकड़ों के अनुसार एच-1बी वीजा पाने वालों में लगभग 72%-73% लोग भारतीय थे. यह आंकड़ा कई सालों में 75% तक गया है, इसलिए एच 1बी वीजा पर आए नए बिल के बारे में भारतीय जानना चाहते हैं कि इसमें क्या है खास? नए बिल को नाम दिया गया है- एंड H-1B वीजा एब्यूज एक्ट ऑफ 2026. इस बिल में यह प्रावधान किया गया है कि नए H-1B वीज़ा पर तीन साल की रोक लगा दी जाए. यानी अगले तीन साल तक किसी को भी नया एच-1 बी वीजा नहीं दिया जाएगा. बिल में यह बात की भी कही गई है कि प्रति वर्ष सिर्फ 25 हजार ही वीजा दिए जाएं, जो वर्तमान में 85 हजार के करीब है. बिल में यह व्यवस्था करने की भी बात की गई है ताकि जिसकी सैलरी न्यूनतम $200,000 होगी उन्हें ही वीजा मिलेगा, बाकियों को नहीं. OPT (अमेरिका में काम करने की अस्थायी अनुमति) के नियमों में भी बड़ा बदलाव किया जा सकता है. इन बदलावों की वजह से अमेरिका में स्किल्ड माइग्रेशन सिस्टम पूरी तरह बदल जाएगा.
| विषय | 🔸 अभी का नियम | 🔻 बिल लागू होने पर बदलाव |
|---|---|---|
| नए H-1B वीजा | हर साल जारी होते हैं | 3 साल तक पूरी तरह रोक |
| सालाना वीजा संख्या | 85,000 प्रति वर्ष | घटाकर 25,000 |
| सेलेक्शन सिस्टम | लॉटरी सिस्टम | सैलरी (wage-based) आधारित चयन |
| न्यूनतम सैलरी | तय सीमा नहीं (लोअर लेवल भी संभव) | कम से कम $200,000 अनिवार्य |
| OPT (काम की अनुमति) | 1–3 साल तक काम की अनुमति | खत्म या सख्त बदलाव |
| ग्रीन कार्ड (PR) | जारी (लंबी वेटिंग के साथ) | स्टेटस एडजस्टमेंट पर रोक संभव |
| डिपेंडेंट्स (परिवार) | साथ ले जा सकते हैं | परिवार ले जाने पर रोक |
| स्टूडेंट से वर्कर का रास्ता | F-1 → OPT → H-1B | पूरी पाइपलाइन टूट सकती है |
| मिड-लेवल प्रोफेशनल्स | अच्छे मौके | लगभग बाहर हो जाएंगे |
| भारतीयों पर असर | सबसे ज्यादा लाभार्थी (70%+) | सबसे ज्यादा प्रभावित |
भारतीयों पर क्या हो सकता है प्रभाव?
एच-1बी वीजा के जरिए हर साल बड़ी संख्या में भारतीय स्टूडेंट्स और कामगार अमेरिका जाते हैं, अगर तीन साल तक के लिए वीजा नहीं दिया जाएगा, तो हजारों भारतीय पढ़ाई और नौकरी के लिए अमेरिका नहीं जा पाएंगे. वीजा देने में भी कैप लगाया जा रहा है, यानी एक सीमित संख्या में ही वीजा दिया जाएगा. इससे कंपीटिशन बहुत बढ़ जाएगा और बहुत संभव है कि भारतीयों को अमेरिका का वीजा ना मिले. OPT खत्म करने से भारतीयों को बड़ा झटका लगेगा. उनके लिए पढ़ाई के बाद अमेरिका में नौकरी के अवसर लगभग समाप्त हो जाएंगे. ग्रीन कार्ड को रोकने से वैसे भारतीयों को झटका लगेगा जो स्थायी तौर पर वहां बसने के इच्छुक हैं. एच-1 बी वीजा होल्डर अपने साथ अपने परिजनों को नहीं ले जा पाएंगे क्योंकि डिपेंडेंट्स पर रोक लगाने का प्रावधान बिल में है. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि विदेशी कामगारों को अमेरिका में नौकरी ना मिले इसकी पूरी व्यवस्था इस बिल में की गई है.
क्या यह कठोर बिल पास होगा?
अमेरिका में टेक, हेल्थकेयर, रिसर्च जैसे सेक्टर में स्किल्ड वर्कर्स की हमेशा कमी रहती है. एच-1बी वीजा पर जाने वाले लोग इस कमी को पूरा करते हैं, जिसकी वजह से वहां काम समय पर हो पाते हैं और इनोवेशन, कंपनियों की ग्रोथ और ग्लोबल प्रतिस्पर्धा में अमेरिका बना रहता है. इस परिस्थिति में इतना कठोर बिल पास हो पाएगा, इसकी उम्मीद बहुत कम है. आमतौर पर ऐसे बिल पॉलिटिकल गेन के लिए लाए जाते हैं, सीनेट से इनके पक्ष में 60 वोट लेना बहुत मुश्किल होता है. हां, यह जरूर है कि एच-1 बी वीजा भारतीयों के लिए परेशानी का सबब तो बन गया है.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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