मुकुल श्रीवास्तवकुछ दिनों पहले बनारस के अस्सी घाट के किनारे बैठे दो बुजुर्गों की बातचीत पर मेरा ध्यान गया. एक ने गहरी सांस लेकर कहा, “अब तो लंका फतह कइके ही लौटब, चाहे जे होए.” यह महज एक वाक्य नहीं था, इसमें एक खास इलाकाई जिद, रामायण का सांस्कृतिक संदर्भ और भोजपुरी-अवधी मिश्रित हिंदी का वह अनूठा रस था, जिसे कोई भी भारतीय तुरंत समझ जाता. उत्सुकतावश, मैंने उसी समय अपनी जेब से स्मार्टफोन निकाला और सिलिकॉन वैली के एक सबसे आधुनिक ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल’, यानी एआइ टूल को यह वाक्य सौंप दिया. एआइ ने पलक झपकते इसका हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद किया : “नाउ आइ विल रिटर्न ओनली आफ्टर कंक्वेरिंग श्रीलंका, व्हाट एवर हैपेंस.” मैं स्तब्ध रह गया. मशीनी बुद्धि ने ‘लंका फतह’ का शाब्दिक अर्थ तो निकाल दिया, पर वह उस मुहावरे के पीछे छिपे सांस्कृतिक मर्म, संघर्ष के गौरव और भाषायी आत्मा को पूरी तरह मार चुका था. एआइ के लिए ‘लंका’ केवल एक भौगोलिक देश था, हमारी साझा चेतना का मुहावरा नहीं. यह दृश्य आज भारत के हर कोने, हर भाषा और हर डिजिटल स्क्रीन पर घटित हो रहा है. हम अनजाने में एक ऐसे भाषायी संकट की तरफ बढ़ रहे हैं, जहां हमारी बोलियां, मुहावरे और लोकोक्तियां सिलिकॉन वैली के सर्वरों में बैठकर तय किये जा रहे ‘औसत ज्ञान’ की बलि चढ़ रही हैं. ऊपरी तौर पर लगता है कि चैटजीपीटी या क्लॉड जैसी एआइ तकनीकें हिंदी में धाराप्रवाह लिख रही हैं, पर जब आप इसकी तह में जायेंगे, तो पायेंगे कि यह हिंदी असल में 'हिंदी' है ही नहीं, यह अंग्रेजी सोच का देवनागरी लिपि में किया गया एक यांत्रिक और बेजान अनुवाद है. डब्ल्यू3टेक्स के वेब प्रौद्योगिकी सर्वेक्षणों के अनुसार, इंटरनेट की शीर्ष एक करोड़ वेबसाइटों में 50 से 60 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में उपलब्ध है, जबकि हिंदी का योगदान 0.1 प्रतिशत से भी कम है. वहीं, यूनेस्को और कॉमन क्रॉल के वैश्विक डाटासेट दर्शाते हैं कि संपूर्ण इंटरनेट के लिखित डेटाबेस का 99 प्रतिशत से अधिक हिस्सा गैर-भारतीय भाषाओं के नियंत्रण में है. वर्ष 2026 के हालिया भाषायी अध्ययनों के अनुसार, दुनिया के सबसे उन्नत एआइ मॉडल्स (जैसे जीपीटी-5 श्रेणी के मॉडल) जब हिंदी सहित 11 प्रमुख भारतीय भाषाओं पर टेस्ट किये गये, तो सांस्कृतिक और प्रासंगिक सटीकता के मामले में उनका स्कोर 45 प्रतिशत के आसपास रहा. यूनेस्को की ‘एथिक्स ऑफ एआइ’ रिपोर्ट ने आगाह किया है कि पश्चिमी एआइ मॉडल्स दुनियाभर की स्थानीय भाषाओं का ‘डिजिटल विलोपन’ कर रहे हैं, क्योंकि वे हर भाषा को एक समान सांचे में ढालने की कोशिश करते हैं. एआइ मॉडल्स मुहावरों और चार अक्षर वाले सामासिक पदों (इडियम्स) का शाब्दिक अनुवाद कर देते हैं. जैसे ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ का अनुवाद कई बार एआइ ‘कमिन सीड इन कैमल्स माउथ’ जैसी हास्यास्पद पंक्तियों में करता है, जिससे भाषा का सौंदर्य समाप्त हो जाता है. जब दिल्ली, लखनऊ या पटना का कोई छात्र इतिहास, समाजशास्त्र या साहित्य के किसी विषय पर एआइ से संवाद करता है, तो एल्गोरिदम उसे इंटरनेट पर उपलब्ध लाखों सूचनाओं का एक ‘औसत’ निकालकर दे देता है, जिससे भाषा का वह अनूठा रस गायब हो जाता है, जिसे हम ‘सांस्कृतिक बारीकियां’ कहते हैं. भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में, जहां ‘कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी’ की परंपरा रही हो, वहां कैलिफोर्निया के एयर-कंडीशनर कमरों में तैयार कोडिंग यह तय कर रही है कि भारत के छात्र को राष्ट्रवाद, प्रेम, अध्यात्म या लोक-संस्कृति को किस चश्मे से देखना चाहिए. एआइ के पास कबीर की उलटबांसियों का व्याकरण तो हो सकता है, पर कबीर की फक्कड़ता और लोक चेतना को समझने वाला न्यूरल नेटवर्क उसके पास नहीं है. यह ज्ञान का एक नया केंद्रीकरण है. आज प्रकाशन उद्योग एक नये संकट से जूझ रहा है. नये लेखकों के आलेख व्याकरण के दृष्टिकोण से तो एकदम शुद्ध होते हैं, पर उनमें कोई ‘आत्मा’ या मौलिक गंध नहीं होती. कारण साफ है, युवा पीढ़ी अपनी भाषा को समृद्ध करने के लिए प्रेमचंद, रेणु, अज्ञेय या रामचंद्र शुक्ल को नहीं पढ़ रही, बल्कि वह चैटजीपीटी की स्क्रीन से भाषा सीख रही है. जब भाषा से उसके मुहावरे, उसकी लोकोक्तियां और उसकी स्थानीय गंध गायब हो जाती है, तो वह केवल संवाद का साधन रह जाती है, संस्कृति का संवाहक नहीं. मुहावरे समाज के सैकड़ों वर्षों के सामूहिक अनुभव और बुद्धिमत्ता से बनते हैं. जब एआइ इन मुहावरों को ‘अप्रासंगिक’ या ‘अनुवाद से बाहर’ मानकर छोड़ देता है, तो हम अपनी ऐतिहासिक निरंतरता से कटने लगते हैं. इस संकट का समाधान तकनीक का बहिष्कार नहीं, बल्कि तकनीक का 'लोकाचार' है. भारत सरकार के 'इंडिया एआइ मिशन' के तहत अब स्वदेशी लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स पर काम शुरू हुआ है, ताकि भारतीय एआइ सिस्टम पूरी तरह से भारतीयों द्वारा तैयार किये गये डाटा पर प्रशिक्षित हो सके. ‘सर्वम एआइ’और ‘भाषीणी’ जैसे प्रयास इस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, पर केवल कोडिंग बदलने से बात नहीं बनेगी. जब तक हम अपने डिजिटल इकोसिस्टम को अपनी मिट्टी के डाटा से नहीं सींचेंगे, तब तक स्क्रीन पर दिखने वाली हिंदी केवल एक ‘अनुवादित विवशता’ बनी रहेगी, हमारी ‘जीवंत चेतना’ नहीं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)