डॉ पवन दुग्गलहाल ही में एक सेवा प्रदाता द्वारा प्रधानमंत्री के सेल्फी वीडियो को पहले कानूनी आधार का हवाला देकर रोकना, फिर इसे तकनीकी गड़बड़ी बताना और अंततः भारत सरकार से माफी मांगना कुछ बड़े सवाल खड़े करता है. क्या कोई सेवा प्रदाता केवल माफी मांगकर अपने कानूनी दायित्व से मुक्त हो सकता है? क्या केवल माफी मांग लेने से वैधानिक प्रावधानों का प्रभाव समाप्त हो सकता है? भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 देश में इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप को नियंत्रित करने वाला मूल कानून है. यह एक विशेष कानून है और आइटी अधिनियम की धारा 81 के अनुसार, इसके प्रावधान वर्तमान में लागू किसी भी अन्य कानून में मौजूद असंगत प्रावधानों पर प्रभावी होते हैं. भारत में मध्यस्थों की कानूनी देयता आइटी अधिनियम की धारा 79 के अंतर्गत निर्धारित होती है. इसमें यह प्रावधान है कि किसी मध्यस्थ को उसके प्लेटफॉर्म के माध्यम से उपलब्ध कराये गये किसी तीसरे पक्ष के डाटा या सूचना के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जायेगा, बशर्ते कि वह चार शर्तें पूरी करता हो : वह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 तथा उसके अंतर्गत बनाये गये नियमों और विनियमों का पालन करता हो.वह कानून के तहत अपने दायित्वों का निर्वहन करते समय उचित सावधानी बरतता हो. वह किसी अपराध के किये जाने में षड्यंत्र न करता हो और न उसके लिए उकसाता हो. तथा जब किसी सूचना को हटाने या उस तक पहुंच को निष्क्रिय करने के लिए कहा जाये, तो वह ऐसा शीघ्रता से करता हो, और इस प्रक्रिया में मूल इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को नष्ट या दूषित न करता हो. मध्यस्थों के लिए उचित सावधानी बरतना कानूनी दायित्व है. उचित सावधानी के मानदंडों को सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 में, 2026 में किये गये संशोधनों के साथ स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है. एक प्रमुख मानदंड के अनुसार, मध्यस्थ को देश के कानून का पालन करना आवश्यक है, जिसमें आइटी अधिनियम और उसके अंतर्गत बनाये गये नियम भी शामिल हैं, तथा उसे ऐसी कोई सामग्री प्रकाशित नहीं करनी चाहिए, जो अश्लील या सार्वजनिक नीति के विरुद्ध हो. इस मामले में प्रधानमंत्री के वीडियो संबोधन को मनमाने ढंग से हटाने और बिना किसी कानूनी आधार के कई घंटों तक उसे अवरुद्ध रखने में उचित सावधानी का पूरी तरह अभाव दिखाई देता है. यदि वास्तव में यह तकनीकी गड़बड़ी थी, तो सेवा प्रदाता की जिम्मेदारी है कि वह यह प्रदर्शित करे कि उसने सभी आवश्यक सावधानियां बरती थीं और इसके बावजूद वह उस गड़बड़ी या उससे उत्पन्न अपराध को रोक नहीं सका. ऐसे अनेक मामले सामने आये हैं, जिनमें सेवा प्रदाताओं को कथित रूप से बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री के प्रकाशन और प्रसारण से जुड़ा पाया गया है. उन्हें सक्रिय रूप से ऐसी सामग्री को बढ़ावा देते हुए भी देखा गया है, जिससे इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण राजस्व उत्पन्न हुआ. ऐसे कृत्य न केवल सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत अपराध हैं, बल्कि पॉस्को अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत भी अपराध हैं. जब किसी मध्यस्थ की गतिविधियां आइटी अधिनियम, पॉस्को अधिनियम या बीएनएस के अंतर्गत अपराध की श्रेणी में आ जाती हैं, तब स्वाभाविक रूप से यह निष्कर्ष निकलता है कि ऐसा मध्यस्थ कानूनी दायित्व से मिलने वाली वैधानिक छूट का हकदार नहीं रह जाता. अब समय आ गया है कि भारत मध्यस्थों को कानून के तहत उनके दायित्वों के बारे में शिक्षित करने के उद्देश्य से लंबी चर्चा या बहस में शामिल होना बंद करे. वे अपने दायित्वों को पूरी तरह जानते हैं, पर उनका पालन न करने का विकल्प चुनते हैं. वे इस धारणा के तहत काम करते हैं कि वे कानून से ऊपर हैं और उनका विशाल आकार, वित्तीय प्रभाव तथा बड़ा उपयोगकर्ता आधार उन्हें कानूनी दायित्व से बच निकलने में मदद करेगा. अब भारत के लिए मौजूदा कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने का समय आ गया है. अधिकांश सेवा प्रदाताओं द्वारा एआइ का उपयोग किये जाने के कारण वे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 2(1)(डब्ल्यू) के तहत 'मध्यस्थ' की श्रेणी में आने की पात्रता खो देते हैं. इसका कारण यह है कि उनके एआइ प्लेटफॉर्म अब आउटपुट तैयार करते समय संपादकीय नियंत्रण का प्रयोग करते हैं, जिससे ये संस्थाएं प्रकाशक, प्रसारक और ब्रॉडकास्टर की भूमिका में आ जाती हैं. ऐसे में, वे कानूनी दायित्व से मिलने वाली वैधानिक छूट के और भी कम हकदार रह जाते हैं. भारत को सभी हितधारकों और मध्यस्थों के लिए एक प्रभावी निवारक संदेश देना आवश्यक है : कानून का पालन न करने पर दंड से बचा नहीं जा सकेगा. सरकार को स्पष्ट और निवारक संदेश देना चाहिए कि भारतीय कानून का उल्लंघन मध्यस्थ अपने जोखिम पर करते हैं और ऐसा करने पर वे पूरी तरह कानूनी दायित्व के दायरे में आयेंगे. अब यह निर्णय लेने की जिम्मेदारी सरकार पर है कि वह आगे कैसे कदम उठाती है. यह केवल इस विशेष मामले में सेवा प्रदाता से निपटने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी मध्यस्थों के लिए उचित नये निर्देश और संदेश तैयार करने तक भी जाना चाहिए. आगे सरकार को : सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 और 87 के अंतर्गत मध्यस्थों के लिए उचित सावधानी बरतने के नये मानदंड निर्धारित करने चाहिए. यह स्पष्ट रूप से निर्धारित करना चाहिए कि किसी मध्यस्थ द्वारा एआइ का उपयोग, उससे मिलने वाले संपादकीय नियंत्रण के कारण, उस मध्यस्थ को एक सक्रिय ब्रॉडकास्टर, प्रसारक और प्रकाशक में बदल देता है और इस प्रकार उसे कानूनी दायित्व से मिलने वाली वैधानिक छूट के लिए अयोग्य बना देता है. अब समय केवल कानूनी दायित्व के संभावित जोखिम को सीमित करने या मध्यस्थों की देयता के संबंध में भारत के रुख की दोबारा समीक्षा करने का नहीं है, बल्कि मौजूदा कानूनी प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए आगे बढ़ने का है. भारतीय साइबर कानून में जनता का विश्वास फिर से स्थापित करना जरूरी है. मौजूदा कानून के क्रियान्वयन में किसी भी प्रकार की कमजोरी अंततः उलटा असर डालेगी और कानूनी ढांचे की मध्यस्थों को जवाबदेह ठहराने की क्षमता में जनता के विश्वास को कमजोर करेगी. अब सभी की निगाहें सरकार पर होंगी कि वह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 तथा उसके अंतर्गत बनाये गये नियमों और विनियमों के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए किस प्रकार आगे बढ़ती है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)