प्रो डॉ दिवांशु श्रीवास्तवलोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 का संसद से पारित होना भारत की प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, विश्वसनीयता और शुचिता स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक एवं निर्णायक कदम है. पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों और केंद्रीय स्तर पर प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं ने लाखों होनहार युवाओं के भविष्य पर प्रश्न चिह्न लगा दिया. जब महीनों की कठिन मेहनत और तपस्या के बाद कोई अभ्यर्थी परीक्षा केंद्र पहुंचता है और कुछ ही घंटों बाद परीक्षा के रद्द होने की खबर आती है, तो यह केवल एक प्रक्रियात्मक विफलता नहीं होती, बल्कि उस युवा के सपनों, उसके परिवार के त्याग और देश की न्यायसंगत व्यवस्था में उसके विश्वास पर कुठाराघात होता है. परीक्षा प्रक्रिया में इस तरह की गड़बड़ी से युवाओं का मनोबल टूटता है, जो उन्हें निराशा में धकेल देता है.इस पृष्ठभूमि में, मूल 2024 के कानून में व्याप्त कमियों को दूर करते हुए और अधिक दंडात्मक व समयबद्ध तंत्र का निर्माण करने वाला यह संशोधन विधेयक अत्यंत प्रासंगिक तथा जन आकांक्षाओं के अनुरूप प्रतीत होता है. संशोधन विधेयक की सबसे प्रमुख विशेषता इसमें शामिल कठोर दंडात्मक प्रावधान हैं, जो संगठित भू-माफियाओं और नकल माफियाओं के भीतर भय पैदा करने का प्रयास करते हैं. इस नये कानून के तहत व्यक्तिगत स्तर पर अनुचित साधनों के प्रयोग और संलिप्तता के लिए सजा की अवधि को बढ़ाकर पांच से 10 वर्ष की जेल तथा जुर्माने की राशि को 50 लाख रुपये तक कर दिया गया है.इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रश्नपत्र लीक कराने वाले संगठित गिरोहों, सर्विस प्रोवाइडर एजेंसियों और संस्थागत अपराधियों के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई सुनिश्चित की गयी है. संगठित परीक्षा अपराधों में शामिल सिंडिकेट के लिए न्यूनतम सात से 10 वर्ष तक के कारावास और 10 करोड़ रुपये तक के भारी-भरकम जुर्माने का प्रावधान रखा गया है. इसके अतिरिक्त, दोषी पायी जाने वाली संस्थाओं और सर्विस प्रोवाइडरों की संपत्तियों की कुर्की और जब्ती के साथ-साथ आठ वर्षों के लिए परीक्षाओं के संचालन से प्रतिबंध जैसे कड़े कदम शामिल किये गये हैं.अक्सर यह देखा गया है कि कठोर कानूनों के बावजूद मामलों की जांच और अदालती सुनवाई में वर्षों लग जाते हैं, जिससे मुख्य अपराधी या तो जमानत पर बाहर घूमते रहते हैं या साक्ष्यों के अभाव का लाभ उठा लेते हैं. इस प्रक्रियात्मक विलंब को समाप्त करने के लिए 2026 के इस विधेयक में विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों को वैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है. प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से विशेष सत्र अदालतों को नामित किया जायेगा, जो केवल परीक्षा की धांधली से जुड़े मामलों की दिन-प्रतिदिन सुनवाई करेंगी.इसके साथ ही, जांच और सुनवाई के लिए कुल पांच महीने की सख्त समय-सीमा तय की गयी है, जिसमें प्राथमिकी दर्ज होने के दो महीने के भीतर जांच पूरी करना और आरोप पत्र दाखिल होने के तीन महीने के भीतर सुनवाई संपन्न करना अनिवार्य होगा. अंतरराज्यीय स्तर पर फैले नकल माफिया के नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए केंद्र सरकार को एक विशेष कार्यबल गठित करने का अधिकार भी दिया गया है. जब एक से अधिक राज्यों में फैले गिरोह एक साथ डिजिटल या भौतिक माध्यमों से परीक्षा प्रणाली को भेदने का प्रयास करते हैं, तो स्थानीय पुलिस की सीमाओं के कारण जांच अक्सर प्रभावित होती थी. विशेष कार्यबल का प्रावधान न केवल अंतरराज्यीय समन्वय को मजबूत करेगा, बल्कि आधुनिक साइबर तकनीकों और फोरेंसिक विशेषज्ञों के माध्यम से ऐसे गिरोहों की जड़ तक पहुंचने में मदद करेगा.हालांकि, किसी भी कानून की वास्तविक सफलता उसके जमीनी क्रियान्वयन और प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है. कठोर कानून और भारी जुर्माना नि:संदेह निवारक का काम करेंगे, लेकिन जब तक परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों, जैसे संघ लोक सेवा आयोग, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी और राज्य लोक सेवा आयोगों की आंतरिक सुरक्षा प्रक्रियाओं को उन्नत और तकनीक संचालित नहीं बनाया जायेगा, तब तक अंतिम लक्ष्य प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण रहेगा. प्रश्नपत्रों के निर्माण, मुद्रण, परिवहन और डिजिटल केंद्रों के आवंटन में तकनीकी सुरक्षा मानकों (जैसे बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, एआइ आधारित निगरानी और एन्क्रिप्टेड प्रश्न पत्र हस्तांतरण) को अनिवार्य रूप से अपनाना होगा.निष्कर्ष यह है कि लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 भारत के परीक्षा तंत्र में विश्वास को पुनः स्थापित करने की दिशा में एक साहसिक और आवश्यक प्रशासनिक-विधिक सुधार है. भारत जैसे विशाल युवा जनसंख्या वाले देश में योग्यता की रक्षा करना केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं है, बल्कि यह देश के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को मजबूत करने का एक राष्ट्रीय दायित्व भी है. यदि इस कानून को बिना किसी राजनीतिक या प्रशासनिक शिथिलता के पूरी मुस्तैदी से लागू किया जाता है, तो यह देश के करोड़ों अभ्यर्थियों के लिए न्याय और समान अवसर का एक मजबूत सुरक्षा कवच साबित होगा. अभ्यर्थियों का न्याय प्रक्रिया पर भरोसा मजबूत होगा और नकल माफियाओं पर भी नकेल कसेगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)