लोकतांत्रिक इतिहास की लंबी धारा में, दुनिया के सबसे समृद्ध लोकतंत्र द्वारा दुनिया के सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ते लोकतंत्र को व्यवस्थित रूप से परेशान किया जाना सामान्य कूटनीतिक आक्रोश से अधिक प्रतिक्रिया की मांग करता है. डोनाल्ड ट्रंप ने कूटनीति के साधनों को दबाव और डराने-धमकाने के औजारों में बदल दिया है. यह दबाव विशेष रूप से भारत पर केंद्रित रहा है. व्यापार और वाणिज्य को हथियार बना दिया गया है. ट्रंप ने इन्हें सहमति बनाने के साधन से हटाकर व्यापार की शर्तें थोपने और किसी भी ऐसे साझेदार पर असमान दबाव डालने का एक कठोर उपकरण बना दिया है, जो तुरंत झुकने को तैयार नहीं होता. सबसे ताजा और उकसाने वाला कदम पिछले सप्ताह आया, जब वाशिंगटन नेशनल कैथेड्रल में सीनेटर लिंडसे ग्राहम के अंतिम संस्कार के कुछ घंटों बाद अमेरिकी सीनेट ने 86-12 के बहुमत से ग्राहम के विधेयक को आगे बढ़ाने के लिए मतदान किया. यह कानून उन देशों पर 100 प्रतिशत तक के द्वितीयक टैरिफ लगाने की अनुमति देता है, जो रूस से तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं. इसके पहले के मसौदे में भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान को निशाना बनाया गया था. ट्रंप की पक्षपातपूर्ण नीति इस अधिनियम में साफ दिखाई देती है. इसमें उन 15 यूरोपीय देशों को छूट दी गयी है, जो अब भी रूसी गैस आयात कर रहे हैं. भारत तेल खरीदता है, लेकिन यूरोप गैस खरीदता है. फिर भी अधिकतम दबाव के लिए केवल एक श्रेणी को चुना गया. इस द्विदलीय कानून को किसी भी राष्ट्रपति आदेश की तुलना में वापस लेना कहीं अधिक कठिन है. यह दबाव भरी कूटनीति का संस्थानीकरण है, जो अस्थायी कार्यकारी निर्णय को स्थायी विधायी आदेश में बदल देता है. यह मतदान उस अभियान का परिणाम है, जिसने पिछले 15 महीनों में भारतीय वस्तुओं पर शुल्क को पांच बार बदला है. इन दंडात्मक परिवर्तनों का उद्देश्य स्थायी ढांचा बनाना नहीं, बल्कि और अधिक रियायतें प्राप्त करना था. अप्रैल, 2025 में वाशिंगटन ने 26 फीसदी टैरिफ की धमकी दी. अगस्त तक यह दर 50 प्रतिशत हो गयी, जिसमें अतिरिक्त 25 फीसदी केवल इसलिए जोड़े गये, क्योंकि भारत रूसी कच्चा तेल खरीदता रहा. इस वर्ष की शुरुआत में ट्रंप और मोदी ने एक अंतरिम समझौते की घोषणा की, जिससे दर घटकर 18 प्रतिशत हो गयी, बदले में भारत द्वारा अमेरिकी ऊर्जा, तकनीक और अन्य वस्तुओं की 500 अरब डॉलर की खरीद का वादा किया गया. अठारह दिन बाद अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के फैसले में कहा कि इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट इन टैरिफों की अनुमति नहीं देता था. इससे पहले ही वसूले गये 160 अरब डॉलर से अधिक अमान्य हो गये और भारत के साथ समझौता भी निष्प्रभावी हो गया. ट्रंप ने इस न्यायिक झटके को स्वीकार किया और तुरंत 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत 10 फीसदी का अतिरिक्त शुल्क लगा दिया. जब यह अस्थायी अधिकार 24 जुलाई को समाप्त हुआ, तो उसी रात धारा 301 के तहत 10 फीसदी शुल्क लागू कर दिया गया, जिसे जबरन श्रम प्रवर्तन के आधार पर उचित ठहराया गया. लगातार पांच बार दरों में बदलाव, एक देश और 15 महीने-यह एक निरंतर पुनर्संरचना की कहानी है, जो कूटनीतिक अस्थिरता को दर्शाती है. अमेरिका के 250 साल के इतिहास में पहली बार उसके राष्ट्रपति की छवि ऐसे दबंग की बन गयी है, जिसे सिद्धांत व स्थिरता की कम परवाह है. चीन भी रूस से समान मात्रा में तेल आयात करता है. लेकिन उसे बार-बार दंड का सामना नहीं करना पड़ा और उसे एक तरह के समझौते का अवसर दिया गया. भारत अधिक सहयोगी साझेदार है, पर उसे ही अधिक बार दंडित किया गया. रणनीतिक साझेदारी के महत्व को ध्यान में रखते हुए भारत ने कई रियायतें दी हैं. वर्ष 2025 में अमेरिका का भारत के साथ वस्तु व्यापार घाटा करीब 58 अरब डॉलर था, जो पिछले वर्ष से 27 प्रतिशत अधिक था. हालांकि, 2025-26 में भारत का अमेरिका के साथ अधिशेष घटकर 34.4 अरब डॉलर रह गया, जो पिछले वर्ष 40.9 अरब डॉलर था. भारत ने रूस से कच्चे तेल के आयात का हिस्सा कम किया, अमेरिकी ऊर्जा की खरीद बढ़ायी और बातचीत के रास्ते खुले रखे, जबकि भारतीय कंपनियों ने अमेरिका में नये निवेश भी किये. उच्च स्तरीय वार्ताओं के एक दर्जन से अधिक दौर और वाशिंगटन व नयी दिल्ली के बीच वरिष्ठ अधिकारियों की यात्राएं हुईं. पर इन्हें या तो औपचारिकता तक सीमित रखा गया या ट्रंप ने इन्हें अप्रासंगिक बताया. इनमें से किसी भी प्रयास से स्थिर दर, स्थायी छूट या वर्तमान शुल्कों के लिए स्पष्ट कानूनी आधार नहीं मिला. सहयोग को पारस्परिक लाभ के रूप में नहीं, बल्कि बार-बार परखा जाने वाला लचीलापन माना गया. विडंबना यह है कि ट्रंप मोदी को मित्र बताते हैं, जबकि हर संभव कानूनी और राजनीतिक अवसर का उपयोग कर उनकी छवि को नुकसान पहुंचाते हैं. ट्रंप का राष्ट्रपति कार्यकाल वैश्विक सहमति बनाने वाली संस्था से टकराव पर आधारित व्यवस्था में बदल गया है. नेतन्याहू और जेलेंस्की जैसे नेताओं को सार्वजनिक समर्थन और कूटनीतिक छूट मिलती है, पर सबसे तेजी से बढ़ते बड़े लोकतंत्र को एक समस्या की तरह देखा जाता है. प्रधानमंत्री मोदी ने अब तक स्थिति को बढ़ाने से बचते हुए भारत की रणनीतिक स्वायत्तता सुरक्षित रखी है. पर यह दबाव भरा कूटनीतिक अभियान जितना लंबा चलेगा, उतना ही स्पष्ट होगा कि इसका नुकसान अंततः ट्रंप के राजनीतिक आधार और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी होगा. भारत अपने विनिर्माण आधार को मजबूत कर रहा है, ग्लोबल साउथ में साझेदारियां बढ़ा रहा है और दक्षिण एशिया में चीन के प्रभाव के संतुलन के रूप में उभर रहा है. इससे वह और मजबूत बनेगा. इस उभरती शक्ति को निशाना बनाकर वाशिंगटन अमेरिकियों की रक्षा नहीं कर रहा, बल्कि उन व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को कमजोर कर रहा है, जो एशिया में संतुलन और साझा हितों को बढ़ावा दे सकते थे. जो महाशक्ति कूटनीति को उत्पीड़न समझने लगती है, अंततः महसूस करेगी कि जिन देशों को वह नियंत्रित करना चाहती है, उनके पास विकल्प मौजूद हैं. भारत पहले ही एक उभरती शक्ति के रूप में धैर्य का परिचय दे चुका है, जिसे पता है कि समय उसके पक्ष में है. अमेरिका को यह याद रखना चाहिए कि धैर्य का मतलब हमेशा सहनशीलता नहीं होता, और कूटनीति का हथियार बनाना अंततः उसी को कमजोर करता है, जो इसका उपयोग करता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं)