गालियां नहीं देनी चाहिए- यह हम सब जानते हैं, लेकिन कभी-न-कभी हम सब गाली देते रहे हैं और सुनते भी रहे हैं. गालियां भी भाषा से ही निकली हैं. जिस भाषा ने हंसने, रोने, उदास होने, प्रेम करने, चोट खाने, मरहम लगाने के लिए हमें अनगिनत शब्द दिये, उसी भाषा ने हमें हमारी घृणा, हमारी जुगुप्सा, किसी के प्रति हमारी चिढ़ प्रगट करने के लिए गालियां भी विकसित कीं. इन गालियों के केंद्र में स्त्रियां क्यों हैं, मांएं-बहनें क्यों हैं? क्योंकि जिस समाज ने ये गालियां विकसित कीं, उसे यह एहसास था कि मां-बहन के नाम पर की जाने वाली चोट सबसे मर्मांतक चोट होती है यानी इनमें इरादा जितना मां-बहन के अपमान का नहीं, उससे ज्यादा उस व्यक्ति को आहत करने का होता है, जिसे गालियां दी जाती हैं. सभ्यता और भाषा का रिश्ता अन्योन्याश्रित है. भाषा ने सभ्यता बनायी, सभ्यता ने भाषा बनायी, लेकिन सभ्यता की बसावट में सिर्फ सुंदर घर नहीं होते, नालियां भी होती हैं, गटर भी होते हैं, जिनसे गंदगी बाहर निकलती है. ये नालियां न हों, तो पूरा घर गटर में बदल जाए. गालियां शायद ऐसी ही नालियों का काम करती हैं- उनसे कई बार हमारे भीतर की घृणा निकल आती है, हम कुछ स्वस्थ हो जाते हैं. गालियों की तुक नालियों से यों ही नहीं मिलती. गालियों का भी अपना समाजशास्त्र रहा है. कई बार गालियां दबंग लोगों के विशेषाधिकार की सूचक होती हैं. ताकतवर आदमी कमजोर आदमी को गाली देता है. कई बार ये गालियां अपनी विफलता, अपनी अयोग्यता, अपना अन्याय छुपाने के लिए भी दी जाती हैं. गालियां कमजोर भी देते हैं- अपने गुस्से में, अपनी हताशा में, अपनी बेबसी में- ज्यादातर वे पीठ पीछे देते हैं. इन गालियों में लाचारी बोलती है- गाली देने के अलावा कुछ न कर सकने की टीस. कई बार लोग गाली देकर पिटने का जोखिम भी उठाते हैं- यह उनका प्रतिरोध होता है. वे जो सबसे मर्मांतक चोट पहुंचा सकते हैं, वह इन्हीं गालियों से संभव होती है. गालियों का एक खेल और होता है. वह खेल सभ्यता ने भाषा के साथ किया है या भाषा ने सभ्यता के साथ किया है. इस सभ्यता ने सिखाया है कि भाषा कोई जड़ चीज नहीं होती. शब्दों के भी अर्थ बिल्कुल वही स्थिर नहीं होते, जो शब्दकोश बताते हैं. हमारे रिश्तों के हिसाब से शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं. तो गालियां दोस्तों के बीच भी चलती हैं. ये अचानक मीठी गालियां हो जाती हैं. बिल्कुल वही गालियां- लेकिन उनकी लैंगिक चुभन वहां गायब हो जाती है, गाली देने-सुनने वालों में एक भाईचारा-सा बन जाता है. बेशक, दोस्तों के बीच चुहल में दी जाने वाली गालियां कई बार मुझे मर्दवाद के दोस्ताने जैसी लगती है- मूंछों पर ताव देते लोगों की आपसी आश्वस्ति कि इन गालियों से हमारा रिश्ता और प्रगाढ़ हो रहा है, लेकिन जब गालियां इतनी आम हैं, तो हम उनसे बचते क्यों हैं? हम क्यों चाहते हैं कि हमारे बच्चे गालियां न दें? हम क्यों इन गालियों को संस्कारों से जोड़ लेते हैं, क्योंकि गालियों की दुनिया है, तो नालियों की दुनिया ही. इस नाली में पांव न रखने पड़ें, तो अच्छा. हम जैसे अपने घर साफ-सुथरा रखना चाहते हैं, वैसे ही अपना या अपने बच्चों का मन भी साफ रखना चाहते हैं, लेकिन हमारे घरों में जैसे बाहर की धूल चली आती है, वैसे ही मन पर भी चली आती है, जैसे हम रोज घर बुहारते हैं, वैसे नैतिकता की झाड़ू लेकर रोज बच्चों का मन बुहारते हैं. मुश्किल यह है कि घर की झाड़ू पुरानी होने पर तो हम बदल लेते हैं. नैतिकता की झाड़ू झड़ चुकी है या उसकी सींकें खत्म हो चुकी हैं, यह हमें पता नहीं चलता. हम इस सड़ी-गली झाड़ू से मन का घर साफ करने निकलते हैं- यह समझे बिना कि उसके लिए नयी सींकें, नयी झाड़ू चाहिए, जो नये पर्यावरण की धूल को ठीक से बुहार सके. हम एक खोखली नैतिकता के व्यूह में घिरे रहते हैं और हमारी दुनिया गालियों से भरी रहती है. यह सच है कि हमारी दुनिया बहुत बदल चुकी है. जब नहीं बदली थी, तब भी समाज की पहचान करने वाले साहित्य में कई बार गालियां चली आती थीं. काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ बनारस नाम की उस सनातन नगरी का गाली-वृत्तांत ही है, जो सभ्यता के हर दौर में बनी रही है- हमारी धार्मिक आस्थाओं का केंद्र रही है. राही मासूम रजा ने जब ‘आधा गांव’ लिखा, तो उसमें भी कुछ गालियां चली आयीं. उसे जोधपुर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से इसीलिए निकाल दिया गया कि उसमें गालियां थीं, लेकिन इन उपन्यासों से किसी शुद्धतावादी अभियान के तहत गालियां निकाल दी जातीं, तो क्या उनमें जीवन बचा रहता? सच्चाई बची रहती? एक तर्क यह हो सकता है कि इतनी सच्चाई क्यों देखना? यथार्थ का यह स्थूल रूप है. हम किसी के अंतरंग कक्षों में नहीं झांकते, लेकिन इंसानी तहजीब की फितरत है कि सारे तर्क बेमानी हो जाते हैं. उसके भीतर का मनोविज्ञान कुछ ऐसा है कि वह जितना रोशनी की पहचान करना चाहता है, उससे ज्यादा अंधेरों को जानना चाहता है. हम गालियों से चाहे जितना भागें, वे हमारा पीछा करती रही हैं- अवचेतन में बसे कई अन्य प्रेतों की तरह. इस फर्क के साथ कि हमारे कई प्रेत अदृश्य होते हैं, गालियां सार्वजनिक होती हैं, वे हमारा भेद खोल देती हैं. बीसवीं सदी में विकसित हुआ सिनेमा आज अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा माध्यम है. ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के रूप में वह घर-घर पहुंचा हुआ है. इनकी मार्फत गालियां भी हमारे ड्रॉइंग रूम में पहुंच गयी हैं. वे हमारे मनोरंजन का हिस्सा हो गयी हैं. जब आप इस पर बहुत एतराज नहीं करते, तो उस नयी पीढ़ी पर क्यों करते हैं, जो इसी समाज से, इसी नये ड्राइंग रूम से ये गालियां सीख कर निकली है और अकुंठ भाव से दे रही है? ठीक है कि हमें गालियों पर तालियां नहीं बजानी चाहिए, लेकिन गाली बकने वालों को संस्कारहीन घोषित कर ट्रोल करना कहीं से उचित नहीं है. समझने की कोशिश यह करनी चाहिए कि इन गालियों से जो निकल रहा है, वह कैसा गुस्सा है, कैसा प्रतिरोध है या कैसी हताशा है और वह कौन-सी कार्रवाई हो सकती है, जिससे हम गाली देने वालों को ताली बजाने वालों में बदल सकते हैं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)