जब भी राष्ट्रीय सुरक्षा की बात होती है, तब आमतौर पर चर्चा सीमाओं, रक्षा उपकरणों, ऊर्जा संसाधनों या रणनीतिक तकनीकों तक सीमित रह जाती है, लेकिन एक ऐसा संसाधन भी है, जिसकी सुरक्षा सीधे देश के भविष्य से जुड़ी है और जिसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम होती है. वह है मिट्टी. मिट्टी की सुरक्षा देश की सुरक्षा के साथ जुड़ी है. किसी राष्ट्र की वास्तविक आत्मनिर्भरता कारखानों, हथियारों और तकनीक से नहीं बनती, बल्कि उसकी बुनियाद उस जमीन में होती है, जो उसके नागरिकों का पेट भरती है. भारत की सभ्यता नदियों और मिट्टी के किनारे विकसित हुई है. यह 'ऋषि और कृषि' का देश है. हमारी कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा का आधार यही मिट्टी रही है, पर आज यह आधार धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है.मानव संसाधन की भांति मृदा व उसके पोषण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. मानव संसाधन के बेहतर प्रबंधन के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता, जलधारण क्षमता, प्रदूषण नियंत्रण, उर्वरकों के अतिशय प्रयोगों तथा असीमित दोहन जैसी चुनौतियों पर निगरानी रखी जानी चाहिए. स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है, ठीक इसी प्रकार स्वस्थ मिट्टी ही व्यक्ति, परिवार, समाज व राष्ट्र को स्वस्थ आहार व संतुलित विकास का वातावरण प्रदान करने में सहायक सिद्ध होगी. हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न संकट से बाहर निकाला. बीती सदी के छठे-सातवें दशक में जब देश अनाज के लिए विदेशी सहायता पर निर्भर था, तब उच्च उत्पादकता वाली किस्मों, सिंचाई और रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग ने भारत को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया. पर समय के साथ अधिक उत्पादन की यह दौड़ मिट्टी पर भारी पड़ने लगी. उर्वरकों का असंतुलित उपयोग, एक ही फसल को बार-बार उगाने की प्रवृत्ति, जैविक पदार्थों की कमी और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित की है. कई क्षेत्रों में मिट्टी का जैविक कार्बन घट रहा है, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी बढ़ रही है और भूमि की जल धारण क्षमता कमजोर हो रही है.इसका सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है. अब किसान पहले की तुलना में अधिक उर्वरक डालने और अधिक सिंचाई करने के बावजूद अपेक्षित उत्पादन हासिल नहीं कर पा रहे. खेती की लागत बढ़ रही है और छोटे व सीमांत किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है. मिट्टी का संकट केवल खेत तक सीमित नहीं है. खराब होती मिट्टी जल संकट को भी बढ़ाती है. जिस मिट्टी में जैविक पदार्थ कम होते हैं, वह वर्षा जल को रोकने में कमजोर हो जाती है. परिणामस्वरूप, जहां सूखे की स्थिति गंभीर होती है, वहीं भारी बारिश में बाढ़ और मिट्टी के कटाव की समस्या बढ़ जाती है. यह संकट अब भारत की आर्थिक और रणनीतिक सुरक्षा से भी जुड़ चुका है. देश अपनी कृषि जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में उर्वरकों पर निर्भर है. पोटाश जैसे महत्वपूर्ण उर्वरक की लगभग सभी जरूरत आयात से पूरी होती है.फॉस्फेटिक उर्वरकों और उनके कच्चे माल के लिए भी देश को वैश्विक बाजार पर निर्भर रहना पड़ता है. यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के प्रयासों के बावजूद मांग और आपूर्ति का अंतर पूरा करने के लिए आयात करना पड़ता है. यानी भारतीय कृषि केवल मौसम पर निर्भर नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार और भू-राजनीतिक परिस्थितियों से भी प्रभावित होती है. रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव या अन्य संकट की स्थिति में उर्वरकों की कीमत और उपलब्धता प्रभावित हो सकती है. मिट्टी का स्वास्थ्य सिर्फ कृषि मंत्रालय का विषय नहीं रह गया है. यह देश की आर्थिक सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता से भी जुड़ा है.माधान केवल अधिक उर्वरक उपलब्ध कराने में नहीं है, बल्कि खेती की पूरी सोच बदलने में है. हमें ऐसी कृषि व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा जिसमें मिट्टी को सिर्फ उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि एक जीवित संसाधन माना जाये. फसल चक्र, जैविक खाद, हरी खाद, जैव उर्वरक, प्राकृतिक खेती, सूक्ष्म सिंचाई और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन जैसी तकनीकों को व्यापक स्तर पर अपनाना होगा. किसानों को 'सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही विधि' के सिद्धांत पर आधारित उर्वरक प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित करना होगा. सरकार की मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम और टिकाऊ कृषि से जुड़ी योजनाएं इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं. पर केवल योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी.असली चुनौती इन्हें खेत तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने की है. कृषि विस्तार व्यवस्था को मजबूत करना होगा और किसानों को वैज्ञानिक जानकारी समय पर उपलब्ध करानी होगी. आत्मनिर्भर भारत की चर्चा अक्सर उद्योग, रक्षा और तकनीक के संदर्भ में होती है. पर आत्मनिर्भर कृषि के बिना आत्मनिर्भर भारत की कल्पना अधूरी है. जिस देश की मिट्टी स्वस्थ है, वही लंबे समय तक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है. स्वस्थ मिट्टी किसान की आय बढ़ाती है, पर्यावरण की रक्षा करती है और आयात निर्भरता को कम करती है. इसलिए मिट्टी को बचाना सिर्फ कृषि सुधार का कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय भविष्य की सुरक्षा का अभियान है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)