Global Climate and Health Alliance Report: जुलाई में आयोजित नाटो (NATO) शिखर सम्मेलन के बाद तथा अमेरिका-ईरान युद्ध में 60 दिनों के युद्धविराम (Ceasefire) के समाप्त होने और पुनः संघर्ष शुरू होने के बीच एक नयी रिपोर्ट ने वैश्विक समुदाय की चिंता बढ़ा दी है. ‘ग्लोबल क्लाइमेट एंड हेल्थ अलायंस’ की ओर से जारी रिपोर्ट ‘क्लाइमेट चेंज, आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट, एंड ग्लोबल पब्लिक हेल्थ : ए रीइन्फोर्सिंग साइकिल ऑफ हार्म’ (Climate Change, Armed Conflict, and Global Public Health: A Reinforcing Cycle of Harm) में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन और सशस्त्र संघर्ष अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं. ये दोनों एक-दूसरे को बढ़ावा देकर मानव स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं.संकटों का ताना-बाना : पॉलीक्राइसिस की अवधारणारिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक स्तर पर कोई भी संकट अलग-अलग असर नहीं छोड़ता. जब जलवायु परिवर्तन, सशस्त्र संघर्ष, आर्थिक अस्थिरता, संसाधनों की कमी से जूझती स्वास्थ्य प्रणालियां और डिजिटल परिदृश्य एक साथ टकराते हैं, तो यह पॉलीक्राइसिस (Polycrisis) की स्थिति उत्पन्न करता है.ये भी पढ़ें: यूरोप पर ‘हीट डोम’ का कहर : खतरे में 32.7 करोड़ आबादी और 1484.66 लाख करोड़ की संपत्ति, जर्मनी-पोलैंड में 45 डिग्री तापमान का अलर्टकई गुणा बढ़ेगा सुरक्षा खतरा : कोर्टनी हॉवर्डग्लोबल क्लाइमेट एंड हेल्थ अलायंस की बोर्ड अध्यक्ष डॉ कोर्टनी हॉवर्ड कते हैं कि जंगल की आग से लेकर युद्धों तक, यदि हम पॉलीक्राइसिस के प्रत्येक तत्व से अलग-अलग निपटने का प्रयास करेंगे, तो इसका असर हर व्यक्ति के स्वास्थ्य पर पड़ेगा. इसमें दुनिया के सबसे गरीब और कमजोर लोग सबसे अधिक प्रभावित होंगे. पृथ्वी की जलवायु, महासागरों और जैव विविधता में बढ़ती अस्थिरता वैश्विक स्तर पर मानव सुरक्षा के लिए थ्रेट मल्टीप्लायर (Threat Multiplier) का काम करती रहेगी. यानी सुरक्षा का खतरा कई गुणा बढ़ता रहेगा.जलवायु परिवर्तन और सशस्त्र संघर्ष का आपस में संबंधरिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन लोगों तक भोजन, पानी, आजीविका और ऊर्जा जैसी जीवन की बुनियादी जरूरतों की पहुंच को प्रभावित करता है. इसके कारण लोगों को मजबूरी में विस्थापित होना पड़ता है. यह अंततः तनाव पैदा करके सशस्त्र संघर्ष को जन्म दे सकता है.ये भी पढ़ें: बंगाल में तेजी से बदल रहा मौसम, साइलेंट किलर बना ह्यूमिड हीट, घर का तापमान 32 डिग्री सेंटीग्रेडबुनियादी सुविधाओं को नष्ट करते हैं युद्धइतना ही नहीं, युद्ध और सशस्त्र संघर्ष लोगों को बेघर कर देते हैं. बुनियादी सुविधाओं को नष्ट करते हैं. पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं. यह एक ऐसा विनाशकारी दुष्चक्र है, जिसके भयानक परिणाम सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health) को भुगतने पड़ते हैं. अमेरिका-ईरान युद्ध (US-Iran War) का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे इस संघर्ष का प्रभाव वैश्विक स्तर पर ईंधन और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ रहा है.स्वास्थ्यकर्मियों और ढांचे की सुरक्षा पर जोरसंघर्ष वाले क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं पर असर को लेकर चिंता व्यक्त की गयी है. संगठन की उपाध्यक्ष और पूर्व UNFCCC यूथ एनवॉय डॉ ओम्निया अल ओम्रानी ने कहा है कि स्वास्थ्यकर्मी विषम परिस्थितियों में सेवाएं देते हैं. उनकी सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए.ये भी पढ़ें: क्लाइमेट चेंज से रोटी पर संकट, रात की गर्मी से खतरे में खाद्य सुरक्षायुद्ध से होने वाले उत्सर्जन की तय हो जवाबदेही : हॉवर्डडॉ हॉवर्ड ने कहा कि किसी भी संघर्ष की स्थिति में सरकारों को स्वास्थ्यकर्मियों, अस्पतालों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों की रक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए. इसके अलावा, सैन्य गतिविधियों (Military Activities) से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (Greenhouse Gas Emissions) के प्रति भी सरकारों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए.सैन्य खर्च की बजाय जलवायु और स्वास्थ्य में निवेश की मांगग्लोबल क्लाइमेट एंड हेल्थ अलायंस की कार्यकारी निदेशक जेनी मिलर ने दुनिया भर के नीति निर्माताओं और सरकारों से अपील की है कि वे सैन्य बजट बढ़ाने की बजाय शांति, स्वास्थ्य प्रणालियों और जलवायु अनुकूलन में निवेश करें. अलायंस ने मुख्य रूप से इन 3 बिंदुओं पर बल दिया है.सैन्य बजट का पुनर्आवंटन : सैन्य तैयारियों से फंड हटाकर जलवायु-अनुकूल समुदायों और स्वास्थ्य प्रणालियों के निर्माण में लगाया जाये.स्वच्छ ऊर्जा तक पहुंच : सार्वभौमिक स्वच्छ ऊर्जा (Universal Access to Clean Energy) और नवीकरणीय ऊर्जा से चलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं को प्राथमिकता दी जाये.बहुपक्षीय सहयोग : अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानूनों का सख्ती से पालन किया जाये और बहुपक्षीय सहयोग (Multilateral Cooperation) को बढ़ावा दिया जाये.