-डॉ संजय भारद्वाज और श्रेष्ठा शर्मा-बांग्लादेश को लेकर भारत की विदेश नीति ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां संवाद और तनाव साथ-साथ चल रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को आमंत्रित किया है. यह आपसी रिश्तों को सामान्य बनाने की भारत की तरफ से पहल है. पर इसी समय बांग्लादेश ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनके सहयोगियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया है. हसीना समर्थक राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन भी पद छोड़ चुके हैं और उनके खिलाफ जांच चल रही है. इससे पहले तारिक रहमान अपनी पहली प्रमुख विदेश यात्रा पर चीन गये थे. वहां तीस्ता नदी परियोजना पर सहमति बनी और मोंगला बंदरगाह परियोजना में चीन की भूमिका भी आगे बढ़ी. ये घटनाएं बांग्लादेश के बदलते रणनीतिक वातावरण की ओर संकेत करती हैं. शेख हसीना चूंकि भारत में हैं, इसलिए उनके खिलाफ जारी वारंट केवल बांग्लादेश की आंतरिक न्यायिक प्रक्रिया का मामला नहीं रह जाता है. यदि ढाका आगे शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग करता है, तो भारत के सामने आसान विकल्प नहीं होगा. बांग्लादेश की नयी सरकार के सामने भी केवल शासन चलाने की चुनौती नहीं है, उसे अपनी अलग राजनीतिक पहचान भी बनानी है. शेख हसीना विरोधी आंदोलन से बनी सरकार के लिए पिछली व्यवस्था से दूरी दिखाना राजनीतिक मजबूरी है. उसे जमात-ए-इस्लामी और दूसरे इस्लामी संगठनों की अपेक्षाओं को भी संतुलित रखना है. इसी कारण भारत को लेकर बांग्लादेश की राजनीति और सार्वजनिक बहस का स्वर भी बदल गया है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की विदेश नीति अवामी लीग से अलग रही है. चीन के साथ उसकी निकटता भी नयी नहीं है. शेख हसीना सरकार ने बेशक भारत के साथ राजनीतिक संबंध मजबूत किये, पर आर्थिक स्तर पर चीन के साथ भी संतुलन बनाये रखा. बांग्लादेश लंबे समय से दोनों शक्तियों के बीच संतुलन साधने की नीति अपनाता रहा है. बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद से भारत ने टकराव के बजाय बातचीत का रास्ता चुना है. खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में विदेश मंत्री एस जयशंकर ढाका गये थे, तो तारिक रहमान के शपथ ग्रहण समारोह में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था. वह प्रधानमंत्री का पत्र लेकर गये थे, जिसमें संबंधों को आगे बढ़ाने की इच्छा जताते हुए तारिक रहमान को भारत आने का निमंत्रण दिया गया था. अप्रैल में बांग्लादेश के विदेश मंत्री की भारत यात्रा ने संवाद को और आगे बढ़ाया. मोहम्मद यूनुस प्रशासन के दौरान करीब दो वर्षों तक पर्यटक वीजा बंद रहे. अब भारत ने उन्हें शुरू कर दिया है. व्यापारिक रिश्तों में आयी अनिश्चितता को भी दोनों देश दूर कर रहे हैं. बांग्लादेश भारत के लिए केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, संपर्क, व्यापार, ऊर्जा सहयोग और बंगाल की खाड़ी की समुद्री रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है. बांग्लादेश भी भारत की अनदेखी नहीं कर सकता. व्यापार, जल, सीमा सुरक्षा, ऊर्जा और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में एक-दूसरे पर निर्भरता बनी हुई है. इसी क्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनेश त्रिवेदी को ढाका में नया उच्चायुक्त नियुक्त किया जाना बताता है कि भारत इस रिश्ते को विशेष महत्व दे रहा है. आगामी सितंबर में नयी दिल्ली में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन होना है. बांग्लादेश ब्रिक्स का सदस्य नहीं है, उसे विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है. इस निमंत्रण के तीन बड़े अर्थ हैं. पहला, यह भारत की 'पड़ोस पहले' नीति और ग्लोबल साउथ के साथ पड़ोसी देशों को जोड़ने की उसकी रणनीति का हिस्सा है. दूसरा, इससे तारिक रहमान को नयी दिल्ली आने का ऐसा अवसर मिलता है, जिसे भारत की ओर झुकाव नहीं, बल्कि एक बहुपक्षीय सम्मेलन में भागीदारी के रूप में देखा जा सकता है. जिस सरकार पर घरेलू राजनीति में भारत से दूरी बनाये रखने का दबाव हो, उसके लिए यह अंतर महत्वपूर्ण है. तीसरा, यह भारत के लिए यह दिखाने का अवसर भी है कि क्षेत्रीय मंचों तक बांग्लादेश की पहुंच में उसकी भूमिका बनी हुई है. पर इस पहल की अपनी सीमाएं भी हैं. ब्रिक्स के मंच पर चीन और रूस भी मौजूद होंगे. यदि ढाका ब्रिक्स को चीन-प्रभावित वैश्विक मंच के रूप में देखता है, तो इस निमंत्रण का भारत को सीमित लाभ ही मिलेगा. इसलिए यह देखना होगा कि तारिक रहमान शिखर सम्मेलन में आते हैं या नहीं, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात किस रूप में होती है. नयी दिल्ली की चिंता यह है कि भारत-बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी जल समझौता डेढ़ दशक से लंबित है. जिस मुद्दे को भारत वर्षों तक हल नहीं कर सका, उसमें अब तीसरा पक्ष सक्रिय हो गया है. चीन इसे उत्तरी बांग्लादेश में अपनी आर्थिक और अवसंरचनात्मक मौजूदगी बढ़ाने के अवसर के रूप में देखता है, जबकि भारत के लिए यह केवल जल प्रबंधन का नहीं, बल्कि एक संवेदनशील भू-राजनीतिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी का प्रश्न है.ऐसे ही, बंगाल की खाड़ी में स्थित मोंगला बंदरगाह भारत की समुद्री सुरक्षा, पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी और हिंद महासागर की रणनीति से जुड़ा हुआ है. द्विपक्षीय रिश्ते में भरोसे की कमी भी अपनी जगह है. गंगा जल संधि दिसंबर में समाप्त हो रही है और उसके नवीनीकरण को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. तीस्ता जल बंटवारा समझौता पिछले पंद्रह वर्षों से अधिक समय से लंबित है. सीमा पर बीएसएफ की कार्रवाई पर बांग्लादेश चिंता जताता रहा है, जबकि भारत की प्राथमिकता सीमा सुरक्षा और सीमा-पार अपराधों पर नियंत्रण है. भारत को अब यह स्वीकार करना होगा कि बांग्लादेश की घरेलू राजनीति बदल चुकी है. नयी दिल्ली को उसी बदली हुई राजनीतिक वास्तविकता के अनुसार अपनी नीति बनानी होगी. आपसी रिश्तों का आधार भी और व्यापक बनाना होगा. केवल सरकारों के बीच अच्छे संबंध पर्याप्त नहीं होंगे. राजनीतिक दलों, सरकारी संस्थानों, व्यापारिक समुदाय, शिक्षाविदों, मीडिया और नागरिक समाज के साथ भी लगातार संवाद बढ़ाना होगा. हाल के वर्षों में बांग्लादेश में बढ़ती भारत विरोधी भावना, अल्पसंख्यकों पर हमलों को लेकर पैदा हुई चिंताएं और दोनों देशों के मीडिया में बनी नकारात्मक धारणाओं ने आपसी विश्वास को कमजोर किया है. इस भरोसे को फिर से मजबूत किये बिना राजनीतिक संबंधों को स्थायी आधार नहीं मिल सकता. दोनों देशों की सकारात्मक सोच और आपसी विश्वास ही इस रिश्ते को मजबूती दे सकते हैं. (ये लेखकद्वय के निजी विचार हैं.)