हिंद महासागर क्षेत्र आज विश्व की सबसे महत्वपूर्ण सामरिक एवं आर्थिक धुरी बन चुका है. विश्व के लगभग 80 प्रतिशत समुद्री तेल व्यापार तथा वैश्विक कंटेनर व्यापार का एक बड़ा भाग इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है. ऐसे में, समुद्री सुरक्षा, समुद्री मार्गों की निर्बाध उपलब्धता तथा समुद्री कानूनों का पालन केवल क्षेत्रीय देशों का ही नहीं, पूरे विश्व का साझा दायित्व बन गया है. इसी पृष्ठभूमि में भारतीय नौसेना के दक्षिणी नौसैनिक कमान कोच्चि में 20 से 23 जुलाई, 2026 तक हुए ऑपरेशन 'सदर्न रेडिनेस' का विशेष महत्व है. इस चार दिवसीय बहुराष्ट्रीय कार्यक्रम में 25 से अधिक देशों के लगभग 250 प्रतिनिधियों, चार अंतरराष्ट्रीय संगठनों तथा अनेक समुद्री सुरक्षा विशेषज्ञों ने भाग लिया. इसे भारतीय नौसेना के नेतृत्व वाले कंबाइंड टास्क फोर्स-154 (सीटीएफ-154) तथा कंबाइंड मैरिटाइम फोर्सेज (सीएमएफ) के सहयोग से आयोजित किया गया. इस कार्यक्रम का मूल उद्देश्य विभिन्न देशों की नौसेनाओं और समुद्री सुरक्षा एजेंसियों के बीच साझा प्रशिक्षण, सूचना आदान-प्रदान तथा सामूहिक प्रतिक्रिया क्षमता विकसित करना था. वर्तमान समय में समुद्री डकैती, आतंकवाद, हथियारों एवं मादक पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी, अवैध मत्स्यन तथा समुद्री साइबर खतरों जैसी चुनौतियां किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं. इनसे निपटने के लिए बहुराष्ट्रीय सहयोग अनिवार्य है. इस कार्यक्रम में निम्न विषयों पर विशेष ध्यान दिया गया-समुद्री सुरक्षा एवं समुद्री डोमेन जागरूकता, समुद्री कानूनों का प्रभावी अनुपालन, समुद्री आतंकवाद एवं समुद्री डकैती से निपटना, खोज एवं बचाव, मानवीय सहायता एवं आपदा राहत, संयुक्त संचालन की योजना एवं निर्णय प्रक्रिया, आधुनिक तकनीकों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा सूचना साझाकरण का उपयोग. इस प्रकार यह केवल सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा के व्यापक दृष्टिकोण को विकसित करने का प्रयास था और इसमें निम्न पहलू शामिल थे-क्लासरूम में चर्चा, कमांड-पोस्ट प्लानिंग, टेबलटॉप सिमुलेशन, सिनेरियो बेस्ड क्राइसिस मैनेजमेंट, लीगल और मैरीटाइम सिक्योरिटी वर्कशॉप, इंटर ऑपरेबिलिटी ट्रेनिंग और कुछ प्रैक्टिकल डेमोंस्ट्रेशन.इस सम्मेलन का उद्देश्य किसी खास कॉम्बैट मिशन की रिहर्सल करने की बजाय पार्टनर नेवी की तैयारी को बढ़ाना था. इसके जरिये भारत की समुद्री नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन किया गया. भारत स्वयं को हिंद महासागर क्षेत्र में 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' के रूप में स्थापित करना चाहता है. कोच्चि में इतने बड़े बहुराष्ट्रीय कार्यक्रम का सफल आयोजन यह दर्शाता है कि भारत केवल अपनी सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र की सामूहिक सुरक्षा में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने की क्षमता रखता है. विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों का भारतीय नौसेना के प्रशिक्षण संस्थानों में आकर संयुक्त अभ्यास करना प्रमाण है कि भारतीय नौसेना आज एक विश्वसनीय, पेशेवर और आधुनिक नौसेना के रूप में सम्मानित है. इससे भारत की रक्षा कूटनीति को भी नयी मजबूती मिलती है. इस अभियान से इंटर ऑपरेबिलिटी का विकास हुआ है. किसी भी बहुराष्ट्रीय अभियान में विभिन्न देशों की नौसेनाओं का एक-दूसरे के साथ सहजता से कार्य करना अत्यंत आवश्यक होता है. इस कार्यक्रम से संचार प्रणाली, संचालन प्रक्रियाओं, सामरिक निर्णयों तथा संयुक्त अभियानों के मानकों में बेहतर तालमेल विकसित हुआ. भविष्य में समुद्री संकट की स्थिति में यह समन्वय अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा. इस अभियान से भारतीय नौसेना के प्रशिक्षण कमान की भूमिका मजबूत हुई है. ऐसे अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों के आयोजन से प्रशिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता और वैश्विक पहचान, दोनों में वृद्धि होती है. इस सम्मेलन में समुद्री सुरक्षा चुनौतियों से निपटने की तैयारी की गयी. आज हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री डकैती, आतंकवाद, अवैध हथियारों की तस्करी तथा ड्रोन एवं साइबर आधारित खतरों में वृद्धि हो रही है. ऐसे में, विभिन्न देशों की सर्वोत्तम कार्य पद्धतियों का आदान-प्रदान भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता को और सुदृढ़ बनाता है. इससे देश की 'सागर' एवं 'महासागर' नीति को बल मिला है. देश की समुद्री नीति तथा उसके विस्तारित दृष्टिकोण 'महासागर' का मूल उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में सहयोग, सुरक्षा और साझा समृद्धि सुनिश्चित करना है. 'सदर्न रेडिनेस' इसी नीति का व्यावहारिक उदाहरण है. यह आयोजन रक्षा कूटनीति का प्रभावी माध्यम बना. आधुनिक समय में युद्ध केवल हथियारों से नहीं, कूटनीति और साझेदारी से भी जीते जाते हैं. संयुक्त नौसैनिक अभ्यास देशों के बीच विश्वास निर्माण का प्रभावी माध्यम होते हैं. इससे भविष्य में रक्षा तकनीक, प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक्स, खुफिया जानकारी और समुद्री निगरानी के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने की संभावना रहती है. हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक भूमिका है. देश का लगभग 95 प्रतिशत विदेशी व्यापार मात्रा के आधार पर तथा 70 प्रतिशत से अधिक मूल्य के आधार पर समुद्री मार्गों से होता है. ऊर्जा आयात का अधिकांश भाग भी समुद्री मार्गों पर निर्भर है. इसलिए समुद्री सुरक्षा भारत की आर्थिक सुरक्षा से सीधे जुड़ी हुई है. चीन की बढ़ती समुद्री गतिविधियां, हिंद महासागर में बाहरी शक्तियों की उपस्थिति तथा समुद्री प्रतिस्पर्धा ने भी भारत के लिए अपनी नौसैनिक क्षमता तथा साझेदारियों को मजबूत करना और भी जरूरी बना दिया है. ऐसे बहुपक्षीय कार्यक्रम भारत को क्षेत्रीय संतुलन बनाये रखने तथा सहयोगात्मक सुरक्षा व्यवस्था विकसित करने में सहायता करते हैं. आने वाले वर्षों में इस प्रकार के बहुराष्ट्रीय कार्यक्रमों का दायरा और विस्तृत होगा. कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मानवरहित समुद्री प्रणालियां, साइबर सुरक्षा, समुद्री निगरानी तथा जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियां भी इन अभ्यासों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेंगी. भारत इन क्षेत्रों में अपनी तकनीकी क्षमता और प्रशिक्षण कौशल के आधार पर अग्रणी भूमिका निभा सकता है. ऑपरेशन 'सदर्न रेडिनेस' केवल एक संयुक्त नौसैनिक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं था, यह भारत की उभरती समुद्री शक्ति, रक्षा कूटनीति तथा हिंद महासागर क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका का प्रभावशाली प्रदर्शन भी था. इसने स्पष्ट किया कि आधुनिक समुद्री सुरक्षा किसी एक देश के प्रयासों से सुनिश्चित नहीं की जा सकती, इसके लिए सहयोग, विश्वास, सूचना साझाकरण और संयुक्त तैयारी अनिवार्य है. भारतीय नौसेना के लिए यह आयोजन उसकी पेशेवर क्षमता, अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और रणनीतिक प्रभाव को बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हुआ है. साथ ही, इसने भारत के उस दीर्घकालिक दृष्टिकोण को भी सुदृढ़ किया है, जिसके अंतर्गत भारत हिंद महासागर क्षेत्र में 'सुरक्षा, सहयोग और साझा समृद्धि' का विश्वसनीय अग्रदूत बनने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)