-डॉ प्रमोद कुमार-(सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग सरिया कॉलेज, सरिया, गिरिडीह)विज्ञान और तकनीक का उद्देश्य मानव जीवन को सुविधाजनक, सुरक्षित और ज्ञान समृद्ध बनाना था. मोबाइल फोन भी उसी उद्देश्य की एक महान उपलब्धि है. कुछ दशक पहले तक मोबाइल केवल बातचीत का माध्यम था, पर आज यह शिक्षा, बैंकिंग, व्यापार, चिकित्सा, मनोरंजन, सामाजिक संबंध और प्रशासन तक का प्रमुख साधन बन चुका है. पर विडंबना यह है कि जिस उपकरण को मनुष्य ने अपने नियंत्रण में रखने के लिए बनाया था, आज वही उपकरण मनुष्य के मन, समय और व्यवहार को नियंत्रित करने लगा है. आज सर्वाधिक चिंता बच्चों में बढ़ती मोबाइल निर्भरता है. पहले बच्चे घर के आंगन में खेलते थे, मिट्टी से जुड़ते थे, मित्रों के साथ हंसते-बोलते थे और दादा-दादी या नाना-नानी से कहानियां सुनते थे. आज वही बचपन मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन में सिमटता जा रहा है. परिणामस्वरूप, बच्चों का शारीरिक विकास, मानसिक एकाग्रता, रचनात्मकता और सामाजिक व्यवहार प्रभावित होने लगा है. पढ़ाई में रुचि कम हो रही है, आंखों की समस्या बढ़ रही है और वास्तविक दुनिया की अपेक्षा आभासी दुनिया अधिक आकर्षक लगने लगी है. आश्चर्य की बात यह है कि अब बुजुर्ग भी इससे अछूते नहीं हैं. जो पीढ़ी कभी परिवार के बीच बैठकर अनुभवों का आदान-प्रदान करती थी, धार्मिक ग्रंथ पढ़ती थी, पड़ोसियों से मिलती-जुलती थी या शाम में चौपाल पर समय बिताती थी, वह भी अब मोबाइल स्क्रीन में अधिक समय व्यतीत करने लगी है. इससे परिवार के भीतर संवाद कम होता जा रहा है. रिश्तों में आत्मीयता कम हो रही है. मित्रता डिजिटल प्रतिक्रियाओं तक सीमित होती जा रही है. धैर्य कम हो रहा है और तुरंत मनोरंजन की आदत बढ़ रही है. लोग वास्तविक जीवन की कठिनाइयों से जूझने के बजाय आभासी दुनिया में अधिक समय बिताने लगे हैं. स्वास्थ्य पर भी इसके गंभीर दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं. यदि यही स्थिति भविष्य में बनी रही, तो इसके परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं. एक ऐसा समाज विकसित होगा जहां ज्ञान तो बहुत होगा, पर विवेक कम होगा. संपर्क तो हजारों लोगों से होगा, पर आत्मीय संबंध कम होंगे. मनोरंजन तो भरपूर होगा, पर मानसिक शांति दुर्लभ होगी. मोबाइल केवल हानिकारक नहीं है, इसके सकारात्मक पक्ष भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. आज शिक्षा ऑनलाइन उपलब्ध है. विद्यार्थी देश-विदेश के श्रेष्ठ शिक्षकों से सीख सकते हैं. किसान मौसम और कृषि संबंधी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. रोगी चिकित्सीय सलाह ले सकते हैं. डिजिटल भुगतान ने आर्थिक लेन-देन को सरल बनाया है. आपदा के समय मोबाइल जीवनरक्षक सिद्ध होता है. परिवार और मित्र दूर रहकर भी जुड़े रहते हैं. सरकारी योजनाओं की जानकारी आम नागरिक तक पहुंच रही है. समस्या मोबाइल नहीं, बल्कि उसका अनियंत्रित और उद्देश्यहीन उपयोग है. जब मोबाइल साधन से अधिक मनोरंजन का माध्यम बन जाता है और व्यक्ति अपने समय तथा व्यवहार पर नियंत्रण खो देता है, तभी संकट उत्पन्न होता है. भावी पीढ़ी यदि वास्तविक जीवन की अपेक्षा केवल आभासी संसार में जीने लगेंगी, तो सामाजिक संस्कार, पारिवारिक मूल्य और मानवीय संवेदनाएं कमजोर पड़ सकती हैं. ऐसी स्थिति में केवल चिंता करना पर्याप्त नहीं है, समाधान की दिशा में ठोस प्रयास भी आवश्यक हैं. सबसे पहले प्रत्येक व्यक्ति को यह स्वीकार करना होगा कि मोबाइल उसका सेवक है, स्वामी नहीं. प्रतिदिन मोबाइल उपयोग का निश्चित समय निर्धारित किया जाये. बिना किसी विशेष आवश्यकता के बार-बार मोबाइल देखने की आदत छोड़ी जाये. अनावश्यक सूचनाओं और मनोरंजन संबंधी एप्स का सीमित उपयोग किया जाये. इस दिशा में परिवार की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. घर में प्रतिदिन कुछ समय ऐसा निर्धारित होना चाहिए, जब सभी सदस्य बिना मोबाइल के साथ बैठें, बातचीत, भोजन या कोई सामूहिक गतिविधि करें. बच्चों के सामने माता-पिता भी मोबाइल का संयमित उपयोग करें. छोटे बच्चों को मनोरंजन के लिए मोबाइल देने के स्थान पर पुस्तकें, चित्रकला, खेल, संगीत और रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित किया जाये. विद्यालयों और महाविद्यालयों को भी डिजिटल साक्षरता के साथ-साथ डिजिटल अनुशासन की शिक्षा देनी चाहिए. विद्यार्थियों को यह समझाना आवश्यक है कि तकनीक का उपयोग ज्ञान के लिए करें, समय नष्ट करने के लिए नहीं. समाज में भी इस विषय पर जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए, ताकि लोग मोबाइल के लाभ और हानि दोनों को संतुलित दृष्टि से समझ सकें. तकनीक का विरोध करना समाधान नहीं है. आवश्यकता उसके विवेकपूर्ण उपयोग की है. मोबाइल ज्ञान का द्वार भी बन सकता है और समय की सबसे बड़ी बर्बादी का कारण भी. यह निर्णय हमारे हाथ में है कि हम इसे अपने जीवन का साधन बनायें या अपने जीवन का स्वामी. आइए, हम संकल्प लें कि तकनीक को अपनायेंगे, पर उसके गुलाम नहीं बनेंगे. मोबाइल हमारी जेब में रहे, हमारे मन में नहीं. तभी आधुनिकता और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित हो सकेगा एवं आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ, संस्कारित तथा उद्देश्यपूर्ण जीवन का मार्ग मिल सकेगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)