आदर्श जोशी, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट aadarshjoshi65@gmail.comभारत में नदियां केवल जल निकाय नहीं हैं, वे जीवन रेखा, देवियां और सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक हैं. गंगा, यमुना और अनगिनत अन्य नदियों का अनुष्ठानों, त्योहारों और धार्मिक समारोहों के माध्यम से उत्सव मनाया जाता है. गंगा दशहरा और कुंभ मेला जैसे पर्वों में लाखों लोग नदियों का सम्मान करने के लिए एकत्र होते हैं, यह विश्वास करते हुए कि उनका जल पवित्र और दिव्य है. फिर भी, भारत की नदियां दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में गिनी जाती हैं. इसके विपरीत ब्रिटेन ने, जिसका अपनी नदियों से कोई सांस्कृतिक या आध्यात्मिक संबंध नहीं है, अपने जलमार्गों को सस्टेनेबिलिटी के आदर्श उदाहरणों में बदल दिया है. टेम्स नदी को 1950 के दशक में ‘जैविक रूप से मृत’ घोषित कर दिया गया था. पर आज वह एक समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र है, जहां मछलियों की 125 से अधिक प्रजातियां और सील पाई जाती हैं. यह उल्लेखनीय तुलना एक प्रश्न उठाती है : वह ब्रिटेन अपनी नदियों को संरक्षित रखने में कैसे सफल हुआ, जहां उनकी अनुष्ठानिक पूजा नहीं होती? भारत में नदियों की पूजा की जाती है, लेकिन यह देश नदियों के संरक्षण के लिए संघर्ष कर रहा है.इसका उत्तर जिम्मेदारी और कार्रवाई में निहित है. ब्रिटेन में नदी संरक्षण सरकारों, उद्योगों और नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है. कठोर कानून यह सुनिश्चित करते हैं कि उद्योग पर्यावरणीय नियमों का पालन करें, जबकि समुदाय सक्रिय रूप से जलमार्गों की निगरानी और पुनर्स्थापन में भाग लेते हैं. ‘टेम्स 21’ जैसी संस्थाएं नागरिकों को सफाई अभियानों में भाग लेने के लिए संगठित करती हैं. पिछले वर्ष यूके के जल नियामक ‘ओफवाट’ ने जल आपूर्ति और अपशिष्ट जल प्रबंधन के लिए जिम्मेदार उपयोगिता कंपनियों पर अनुचित अपशिष्ट निर्वहन और नदी प्रदूषण के कारण कुल 168 मिलियन पौंड का रिकॉर्ड जुर्माना लगाया. इसके विपरीत, भारत श्रद्धा और जिम्मेदारी के बीच एक असंगति से जूझ रहा है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा 2022 में किये गये अध्ययन में 603 नदियों का आकलन किया गया, जिसमें 30 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों की 279 नदियों में 311 प्रदूषित हिस्से पाये गये. यद्यपि यह 2018 में दर्ज 351 प्रदूषित हिस्सों की तुलना में सुधार है, फिर भी आधे से अधिक नदियों का अब भी प्रदूषित बने रहना बताता है कि अभी बहुत काम करना बाकी है.इसका एक प्रमुख कारण है नागरिक जिम्मेदारी का अभाव. नदियों को बिना शोधन वाले सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और घरेलू कचरे के सुविधाजनक डंपिंग स्थल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. मूर्ति विसर्जन और नदियों में चढ़ावा अर्पित करना जल की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं. इससे होने वाले नुकसान के प्रति जागरूकता के बावजूद पर्यावरण-अनुकूल विकल्प अपनाने या हानिकारक प्रथाओं में बदलाव करने के लिए बहुत कम प्रयास किये जाते हैं. नदी संरक्षण में प्रौद्योगिकी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और यह ब्रिटेन की सफलता की आधारशिला है. अपशिष्ट जल शोधन संयंत्र नदियों में पानी छोड़ने से पहले प्रदूषकों को हटाने के लिए उन्नत निस्पंदन प्रणालियों, जैविक प्रक्रियाओं और रासायनिक उपचारों का उपयोग करते हैं. रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम इन प्रयासों को अधिक प्रभावी बनाते हैं, जो लगातार ऑक्सीजन स्तर, पीएच और प्रदूषकों की सांद्रता जैसे मानकों पर नजर रखते हैं. जब प्रदूषण सुरक्षित सीमा से अधिक हो जाता है, तब तुरंत चेतावनी जारी की जाती है, जिससे संबंधित अधिकारी शीघ्र कार्रवाई कर पाते हैं.ये सक्रिय उपाय नदियों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित करते हैं और पारिस्थितिक संतुलन बनाये रखते हैं. अपने यहां भी गंगा जैसी नदियों के लिए ‘नमामि गंगे’ जैसी पहलों के अंतर्गत इसी प्रकार की तकनीकों को अपनाया गया है. सीवेज शोधन संयंत्रों और सेंसर-आधारित जल गुणवत्ता निगरानी प्रणालियों ने कुछ क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर सफलता प्राप्त की है. हालांकि, व्यापक स्तर पर इनका कार्यान्वयन अपर्याप्त वित्तपोषण, रख रखाव संबंधी समस्याओं और जनभागीदारी की कमी जैसी चुनौतियों के कारण बाधित होता है. सार्थक प्रभाव के लिए भारत को इन तकनीकों को अपनाने और उनका विस्तार करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और मजबूत करनी होगी, साथ ही, उन्हें अधिक कठोर नियमों और सामुदायिक सहभागिता के साथ एकीकृत करना होगा.ब्रिटेन का उदाहरण दर्शाता है कि नदियों का स्वास्थ्य सांस्कृतिक श्रद्धा पर नहीं, बल्कि निरंतर कार्रवाई, जवाबदेही और जन जागरूकता पर निर्भर करता है. भारत में श्रद्धा और जिम्मेदारी के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है, क्योंकि पवित्र नदियां अनियंत्रित प्रदूषण और हानिकारक गतिविधियों के कारण लगातार प्रदूषित हो रही हैं. भारत की नदियां करोड़ों लोगों की जीवन रेखा हैं. उनकी रक्षा करना केवल पर्यावरणीय दायित्व नहीं, एक नैतिक कर्तव्य भी है. यदि भारत अपनी नदियों को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना चाहता है, तो उसे श्रद्धा और जिम्मेदारी के बीच की इस खाई को पाटना होगा.(ये लेखक के निजी विचार हैं.)