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संस्थानों की वैश्विक रैंकिंग

Updated at : 10 Jun 2022 8:17 AM (IST)
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संस्थानों की वैश्विक रैंकिंग

देश में विश्वविद्यालयों की ऐसी प्रणाली तैयार होनी चाहिए, जो सीखने और कौशल विकास का बेहतर जरिया बने और शिक्षार्थियों पर शिक्षण लागत का बोझ कम करे.

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वर्ष 2023 की क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में भारतीय विज्ञान संस्थान (आइआइएससी) ने 31 स्थानों का सुधार दर्ज किया है और देश का सर्वश्रेष्ठ संस्थान बना. शीर्ष 200 वैश्विक संस्थानों की सूची में आइआइएससी ने 155वां, आइआइटी बांबे ने 172वां और आइआइटी दिल्ली ने 174वां स्थान प्राप्त किया है. इस बार शीर्ष 1000 वैश्विक संस्थानों में भारतीय संस्थानों की संख्या 22 से बढ़कर 27 हो गयी है.

मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी लगातार 11वें साल सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय रहा और कैंब्रिज विश्वविद्यालय तथा स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे. रैंकिंग मुख्य रूप से छह मानकों- अकादमिक प्रतिष्ठा, नियोक्ता प्रतिष्ठा, संकाय-छात्र अनुपात, प्रति संकाय उद्धरण, अंतरराष्ट्रीय संकाय अनुपात और अंतरराष्ट्रीय छात्र अनुपात, के आधार पर तैयार होती है. आइआइएससी, बेंगलुरु का प्रदर्शन छह में से चार मानकों पर बेहतर हुआ है.

रैंकिंग दर्शाती है कि भारतीय संस्थानों का संकाय-छात्र अनुपात अपेक्षा अनुरूप नहीं रहा है. रैंकिंग में शामिल 41 भारतीय विश्वविद्यालयों में मात्र चार में ही यह अनुपात सुधरा है. रैंकिंग से यह भी स्पष्ट है कि अनेक भारतीय विश्वविद्यालय शोधकार्यों में सुधार तो कर रहे हैं, लेकिन शिक्षण क्षमता में पर्याप्त सुधार की दरकार अभी बनी हुई है.

शीर्ष शिक्षण संस्थानों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा और शोध की मांग बढ़ने के साथ पढ़ाई की लागत का भी बढ़ना चिंताजनक है. व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस का बोझ असहनीय हो रहा है. इससे गुणवत्ता प्रभावित होने के साथ-साथ शिक्षा के बाजारीकरण होने का खतरा है. देश में विश्वविद्यालयों की ऐसी प्रणाली तैयार होनी चाहिए, जो सीखने और कौशल विकास का बेहतर जरिया बने और शिक्षार्थियों पर शिक्षण लागत का बोझ कम करे. राधाकृष्णन आयोग (1948) के अनुसार, बौद्धिक विकास, न्याय, स्वतंत्रता, बौद्धिक दृष्टिकोण के साथ सामाजिक सुधार देश में उच्च शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए.

उच्च शिक्षा में अच्छी कार्यनीति, गुणवत्ता पूर्ण और प्रायोजित शोधकार्यों को बढ़ावा देने की जरूरत है, साथ ही सामूहिकता को प्रोत्साहित किया जाये. उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण, स्वदेशी अनुसंधान व नवाचार को प्रेरित करना होगा, ताकि उच्च संस्थानों से निकलनेवाले युवा देश और समाज हित में अपना योगदान दे सकें. संस्थानों को अधिक स्वायत्तता देने के साथ-साथ इंटरडिसीप्लिनरी विषयों के आकार और दायरे को भी बढ़ाना जरूरी है.

सबसे अहम है कि उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (जीइआर) बढ़े. वर्तमान में यह 26.3 प्रतिशत ही है, इसे 2035 तक कम से कम 50 प्रतिशत तक ले जाने की आवश्यकता है. शिक्षा में निवेश इस उम्मीद के साथ होना चाहिए कि यह व्यावसायिक और व्यक्तिगत विकास के लिहाज से बेहतर भविष्य की बुनियाद बनेगा. डिग्री और ज्ञान बराबर होते हैं, इस अवधारणा को तोड़ते हुए सुनिश्चित करने की जरूरत है कि उच्च शिक्षण संस्थान रचनात्मकता की उर्वर भूमि बनें, जहां देश के युवा अपनी क्षमता की सही पहचान करें और उसका सदुपयोग कर सकें.

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