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संतों के समर्थन से सत्ता की राजनीति

Updated at : 03 Oct 2024 10:45 PM (IST)
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Saints

Power Politics with saints

कभी संत कुंभनदास ने लिखा था- ‘संतन को कहा सीकरी काम/ आवत जात पन्हैया टूटीं, बिसरि गयौ हरि-नाम.’ यह कविता मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में लिखी गयी मानी जाती है. आशय था कि संत को सीकरी (तब की राजधानी, जिसे अब फतेहपुर सीकरी कहा जाता है) से क्या काम

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धर्म एवं राजनीति के घालमेल को लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं माना जाता. फिर भी कई संत और राजनीतिक सत्ता परस्पर निकटता के लिए लालायित दिखते हैं. धर्मगुरुओं से दलों और नेताओं की निकटता की चर्चा चुनाव के समय ज्यादा होती है. दरअसल उनके रिश्तों का आधार ही चुनावी गणित है. इस निकटता की प्रवृत्ति राष्ट्रव्यापी है. कुछ संत सत्ता-राजनीति के गलियारों में प्रवेश भी कर चुके हैं.

कभी संत कुंभनदास ने लिखा था- ‘संतन को कहा सीकरी काम/ आवत जात पन्हैया टूटीं, बिसरि गयौ हरि-नाम.’ यह कविता मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में लिखी गयी मानी जाती है. आशय था कि संत को सीकरी (तब की राजधानी, जिसे अब फतेहपुर सीकरी कहा जाता है) से क्या काम. तब बादशाह का हुक्म ही व्यवस्था होती थी. फिर भी संत को सत्ता से निकटता की चाह नहीं थी. शायद सत्ता भी नजदीकियों की अपेक्षा नहीं रखती थी, लेकिन अब लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी दोनों की बढ़ती निकटता सवाल खड़े करती है. धर्म एवं राजनीति के घालमेल को लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं माना जाता. फिर भी कई संत और राजनीतिक सत्ता परस्पर निकटता के लिए लालायित दिखते हैं. धर्मगुरुओं से दलों और नेताओं की निकटता की चर्चा चुनाव के समय ज्यादा होती है. दरअसल उनके रिश्तों का आधार ही चुनावी गणित है. इस निकटता की प्रवृत्ति राष्ट्रव्यापी है. कुछ संत सत्ता-राजनीति के गलियारों में प्रवेश भी कर चुके हैं.
चुनावी राजनीति को यह रिश्ता सबसे ज्यादा पंजाब और हरियाणा में प्रभावित करता है. इन राज्यों में ज्यादा चर्चा डेरा सच्चा सौदा की रहती है. इसलिए भी कि दोनों राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों में असर वाला यह डेरा अपने प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के चलते विवादास्पद रहा है. प्रवचन से लेकर फिल्मी परदे तक छाने के महत्वाकांक्षी राम रहीम को हत्या और बलात्कार के अपराध में 20 साल की सजा सुनायी जा चुकी है. सजा सुनाये जाने पर अनुयायियों की हिंसा में हरियाणा में 38 लोग मारे गये थे. ऐसे बाबा के विरुद्ध जांच और अदालत से सजा की प्रक्रिया की मुश्किलों का अंदाजा भी लगाया जा सकता है. कुछ लोग चिर-परिचित वाक्य दोहरा सकते हैं कि देर है, अंधेर नहीं या फिर कानून के हाथ लंबे होते हैं, पर यह विश्वास भी बाबा के मामले में टूटता दिखता है. राम रहीम को पांच साल में दस बार, कुल 265 दिनों की परोल या फरलो मिल चुकी है. हरियाणा में चुनाव की घोषणा 16 अगस्त को हुई, पर उससे पहले ही बाबा को 12 अगस्त को 21 दिन की फरलो मिल गयी. अब जब पांच अक्तूबर को मतदान है, तो राम रहीम को 20 दिन की परोल मिल गयी है. सुनारिया जेल, जहां राम रहीम सजा भुगत रहे हैं, के जेलर सुनील सांगवान को भाजपा से टिकट मिलने से तो इस स्वयंभू संत और सत्ता के संबंधों पर सवाल एवं संदेह और भी गहरे हो गये हैं. सत्ता की ऐसी उदारता का दूसरा उदाहरण शायद ही मिले, पर चुनावी राजनीति में बाबा का सिक्का चलता है.
हरियाणा में 2014 और 2019 में भाजपा की जीत में डेरा सच्चा सौदा की भूमिका बतायी जाती है. लोकसभा की पांच और विधानसभा की 22 सीटों पर डेरा का असर माना जाता है. सो, तमाम दलों के नेता वहां हाजिरी लगाते हैं. ऐसा नहीं कि डेरा का सिक्का हर बार चल जाता हो. इस साल लोकसभा चुनाव में राम रहीम की अनुपस्थिति में डेरा संभाल रही उसकी मुंहबोली बेटी हनीप्रीत से भाजपा के पांच नेता समर्थन मांगने गये. डेरा ने भाजपा को समर्थन का ऐलान किया, पर पिछली बार सभी दस सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार पांच पर अटक गयी. पंजाब में भी 2002 में डेरा ने कांग्रेस का समर्थन किया और कैप्टन अमरेंद्र सिंह के नेतृत्व में सरकार बन गयी, लेकिन 2007 के चुनाव में डेरा के समर्थन के बावजूद कांग्रेस हार गयी. पंजाब और हरियाणा में डेरों की कमी नहीं. कुछ का असर अन्य राज्यों में भी है. ऐसा ही एक डेरा है राधास्वामी ब्यास. इसके वेबसाइट के मुताबिक, 1891 में स्थापित इस डेरे के अनुयायी 90 देशों में हैं, पर ज्यादा संख्या पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी डेरा जा चुके हैं. लोकसभा चुनाव के समय भाजपा, कांग्रेस, अकाली दल और आप के नेताओं ने हाजिरी लगायी थी. पिछले दिनों डेरा की आंतरिक हलचल से राजनीतिक दलों की धड़कनें भी तेज हो गयीं. खबर आयी कि डेरा मुखी गुरिंदर सिंह ढिल्लों ने 45 साल के जसदीप सिंह गिल को उत्तराधिकारी बनाया है. कुछ ही घंटों में दूसरी खबर आयी कि गिल नये प्रमुख नहीं होंगे, बल्कि ढिल्लों के साथ ही बैठेंगे.
पंजाब के निरंकारी, नामधारी, नूर महल और सच्चखंड बल्ला डेरों का भी हरियाणा में कुछ असर है, पर कई स्थानीय डेरे ज्यादा प्रभावशाली हैं. सतलोक आश्रम के संत रामपाल जेल में हैं, पर क्षेत्रीय चुनावी असर की आस कई दल और उम्मीदवार लगाये रहते हैं. रोहतक स्थित मस्तनाथ मठ का असर रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ तक है. नाथ संप्रदाय के इस मठ के महंत बाबा बालकनाथ राजस्थान में भाजपा विधायक हैं. वे सांसद भी रह चुके हैं, पर हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से उनकी नजदीकियां भी किसी से छिपी नहीं हैं. गौकरण धाम, कपिल पुरी धाम, कालीदास महाराज, ईश्वर शाह, महंत सतीश दास समेत कई डेरा अलग-अलग क्षेत्रों में असर रखते हैं. दलों और नेताओं से निकटता से परहेज किसी संत को नहीं लगता. आप कह सकते हैं कि ‘अब तो संतों को भी सीकरी से ही काम.’

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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राज कुमार सिंह

लेखक के बारे में

By राज कुमार सिंह

राज कुमार सिंह is a contributor at Prabhat Khabar.

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