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बाइडेन के सामने नीतिगत चुनौतियां

By संपादकीय
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बाइडेन के सामने नीतिगत चुनौतियां
बाइडेन के सामने नीतिगत चुनौतियां
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करामतुल्लाह के गोरी, वरिष्ठ कूटनीति विशेषज्ञ

editor@thebillionpress.org

यह तय हो चुका है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बाइडेन अगले साल अमेरिका की बागडोर संभालेंगे. लेकिन, ट्रंप अभी भी अपनी हार स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. डोनाल्ड ट्रंप कार्यकाल ठीक उसी तरह समाप्त हो रहा है, जैसे उसकी शुरुआत हुई थी- अमेरिका को विभाजित कर और उसमें ध्रुवीकरण कर. अपने कार्यालय में पहले क्षण से ही वे कभी सभी अमेरिकियों के राष्ट्रपति नहीं रहे हैं.

अमेरिका की आबादी के बदलते स्वरूप से खतरा महसूस करनेवाले श्वेत वर्चस्व के समर्थकों के विध्वंसक एजेंडे को उकसाने की अपनी संकीर्णता से उबरने का उन्होंने कभी प्रयास नहीं किया. ट्रंप ने कभी भी अपने समर्थकों तथा उन लोगों के बीच बढ़ती खाई को पाटने की कोई जहमत नहीं उठायी, जिन्हें वे अपना दुश्मन मानते रहे हैं.

उनका यह विक्षोभ से भरा व्यवहार अमेरिका तक ही सीमित नहीं रहा है. ‘अमेरिका फर्स्ट’ का उनका नारा अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों को नाराज करने का बहाना बन गया तथा इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी वादों व जवाबदेही का कोई मतलब ही नहीं रहा. उन्होंने बेपरवाही से नाटो के सहयोगी देशों को परेशानी में डाला, जलवायु परिवर्तन से संबंधित पेरिस समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया, एशिया-प्रशांत क्षेत्र से जुड़े एक बहुपक्षीय आर्थिक सहयोग समझौते से भी नाता तोड़ लिया तथा ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से भी वे बाहर निकल गये, जिसे उनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बड़ी मेहनत से साकार किया था.

इस्राइली दमन से दबे फिलिस्तीनियों के विरुद्ध खुली अवमानना के साथ ट्रंप ने तेलअवीव स्थिति अमेरिकी दूतावास का स्थानांतरण जेरूसलम में कर दिया, जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों के साथ उनके प्रति अमेरिका की जवाबदेही के भी विरुद्ध था. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप अपने पतन की गर्त में कोरोना महामारी से लड़ने की अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह इनकार करने की वजह से पहुंचे. किसी और वजह से कहीं ज्यादा इस संक्रमण के विरुद्ध अमेरिका का नेतृत्व करने में उनकी असफलता बाइडेन के सामने हार का कारण बनी.

लगभग ढाई लाख अमेरिकियों की मौत के बावजूद अमेरिकी इतिहास के इस सबसे मुश्किल दौर में अपनी असफलता को लेकर उन्होंने कोई अफसोस भी नहीं जताया. इस तबाही के दुख पर उन्होंने विश्व व्यापार संगठन और चीन के साथ उसके कथित गठजोड़ को निशाना बनाकर नमक छिड़कने का ही काम किया. इसके उलट जो बाइडेन ने कोविड संक्रमण से लड़ाई को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता घोषित किया है. अपने गृह नगर में अपनी जीत की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा कि वे शीर्षस्थ वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की एक टीम तैयार करेंगे, जो इस महामारी से लड़ने की योजना बनायेगी.

बहरहाल, व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति के कार्यालय के दरवाजे पर ट्रंप का फैलाया हुआ बहुत सारा कचरा है, जिसे बाइडेन को साफ करना होगा और उसके बाद ही वे उस व्यक्ति द्वारा अमेरिकी राजनीति को दिये गये घावों को ठीक करने का काम शुरू कर सकते हैं, जो प्रख्यात विद्वान नॉम चोम्स्की के शब्दों में मानवजाति के इतिहास में शासन करनेवाला सबसे खराब अपराधी है. विभाजन के प्रमुख प्रणेता ट्रंप एक ऐसे देश को विरासत में छोड़ रहे हैं, जो नस्लीय और सामाजिक तौर पर गंभीर रूप से बंटा है तथा उनकी नीतियों की वजह से जिसका अतिशय ध्रुवीकरण हो चुका है.

इसका अर्थ है कि बाइडेन को इस संदर्भ में बहुत कुछ करना है, जो लगभग साढ़े सात करोड़ वोट लेकर अमेरिकी लोकतंत्र के इतिहास में एक विशिष्ट अध्याय जोड़ चुके हैं. इतिहास बाइडेन के साथ उपराष्ट्रपति बनने जा रहीं कमला हैरिस ने भी रचा है, जो जमैका और भारतीय मूल की हैं. वे इस पद पर पहुंचनेवाली पहली महिला होने के साथ पहली गैर-श्वेत महिला भी होंगी. हैरिस अमेरिकी नेतृत्व के शीर्ष के बिल्कुल निकट जा पहुंची हैं.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विदेश नीति में भी बदलाव आयेगा, किंतु यह बहुत जल्दी नहीं होगा. नाटो और यूरोप के सहयोगियों के साथ संबंधों को सुधारने के साथ अफगानिस्तान में अमेरिका के सबसे लंबे युद्ध से निकालना शीर्ष प्राथमिकताएं होंगी. लेकिन यह कहना जितना आसान है, उतना करना नहीं. अफगानिस्तान बाइडेन की ईमानदारी और स्पष्टता के लिए बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है. इस संदर्भ में पाकिस्तान पहले और भारत बाद में बाइडेन की विदेश नीति के राडार पर जगह पाने के लिए कोशिश करेगा.

ट्रंप ने अपने प्रशासन के रवैये से उलट यह संकोच के साथ माना था कि अफगान मसले के समाधान में और अमेरिका को आग से निकालने में पाकिस्तान की मदद की दरकार है. लेकिन उस प्रशासन ने अमेरिका के हटने के बाद के अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को भी चिह्नित करने का प्रयास किया था. खासकर उस स्थिति में अगर अफगान तालिबान के साथ अंतिम समझौते में भारत किसी तरह शामिल न हो सका. लेकिन पाकिस्तान के साथ अमेरिका के संबंधों में उतार-चढ़ाव की संभावना बनी रहेगी.

पाकिस्तान को यह याद रखना चाहिए कि डेमोक्रेट प्रशासन का झुकाव रिपब्लिकन प्रशास0न की तुलना में पाकिस्तान की ओर कुछ कम ही होता है. भारत को ताजा भरोसा यह दिया जा सकता है कि उसके साथ नजदीकी सहयोग बनाना नये प्रशासन की प्राथमिकता है. भारतीय नेता और नीति निर्धारक भले यह स्वीकार न करें, पर भारत गुटनिरपेक्षता के दौर में भी अवसर मिलने पर अमेरिकी काफिले के साथ रवानगी के लिए तैयार रहता था. इसका एक उदाहरण यह है कि पंडित नेहरू 1962 में चीनी आक्रमण के समय जब राष्ट्रपति केनेडी से हथियार हासिल करना चाहते थे, तब वे अमेरिका के साथ रक्षा समझौता करने के लिए भी तैयार थे.

दरअसल, बाइडेन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ट्रंप की तरह भले गलबहियां न करें, लेकिन अमेरिका के ऐसा करने की पूरी संभावना है. इसका कारण चीन के साथ उसकी तनातनी है और उसमें भारत का साथ संतुलन साधने में मददगार हो सकता है. भारत के लिए बाइडेन प्रशासन से आशंकित होने की कोई वजह नहीं है. लेकिन ट्रंप के साथ बेहद नजदीकी बना चुके सऊदी अरब और खाड़ी देशों के शेखों की चिंता बढ़ेगी. ईरान के प्रति अपनी नफरत में चूर ट्रंप अरब के तानाशाहों को तुष्ट करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे. ईरान अपने संबंधों की कुछ मरम्मत की उम्मीद कर सकता है. एक नया खेल शुरू होनेवाला है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

Posted by: Pritish sahay

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