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आदिवासियों के मुद्दों पर ध्यान जरूरी

Updated at : 17 Feb 2021 6:46 AM (IST)
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आदिवासियों के मुद्दों पर ध्यान जरूरी

सभी आदिवासी बहुल क्षेत्रों को प्रशासनिक विभागों में बांटकर, उसके अधिकार लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नेतृत्व के हाथ में दिया जाना चाहिए.

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मोहन गुरुस्वामी

वरिष्ठ स्तंभकार

mohanguru@gmail.com

देश में करीब 573 समुदायों को सरकार ने अनुसूचित जनजाति के रूप में चिन्हित किया है और ये विशेष लाभों के अधिकारी हैं तथा विभिन्न जगहों पर निर्धारित आरक्षण प्राप्त कर सकते हैं. सबसे बड़े जनजातीय समूह गोंड की संख्या करीब 74 लाख है. इसके बाद संथाल हैं, जिनकी आबादी लगभग 42 लाख है. सबसे छोटा आदिवासी समूह अंडमान में चैमल हैं. इनकी संख्या मात्र 18 है. मध्य भारत में आदिवासियों की कुल संख्या का करीब 75 फीसदी हिस्सा बसता है. देश की जनसंख्या में 8.2 फीसदी भाग आदिवासियों का है, जो सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में हैं.

आदिवासी आबादी को आम तौर पर तीन समूहों में बांटा जा सकता है. पहले समूह में वे समुदाय हैं, जो इंडो-आर्यन प्रवासियों के आगमन से पहले से हैं. अनेक नृशास्त्रियों ने इन्हें ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषी ऑस्ट्रोलॉयड माना है. मध्य भारत के आदिवासी इसी समूह से हैं. अन्य दो बड़े समूह- कॉकासॉइड और साइनो-तिब्बतन या मंगोलॉइड- हैं, जो हिमालयी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में हैं. ये बाद के युगों में आये हैं. यदि हम इसे मानें, तो निहार रंजन रे के ‘भारत के असली मूलनिवासी’ की व्याख्या पर केवल मध्य भारत के आदिवासी खरे उतरते हैं.

ओडिशा में 72 प्रतिशत से अधिक आदिवासी गरीबी रेखा से नीचे हैं. राष्ट्रीय स्तर पर 45.86 फीसदी आदिवासी गरीबी रेखा से नीचे हैं. भारत में गरीबी रेखा भुखमरी की रेखा से अधिक कुछ नहीं है, जिसका मतलब है कि देश के असली मूलनिवासियों में लगभग आधे हर रात भूखे पेट सोते हैं. अनेक अध्ययनों में बताया गया है कि आदिवासियों की औसत लंबाई घटती जा रही है, जबकि अन्य लोगों को बेहतर पोषण का लाभ मिला है.

साल 1950 के भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 के तहत पांचवीं और छठी अनुसूची में चिन्हित बहुसंख्यक आदिवासी क्षेत्रों में स्व-शासन का प्रावधान था. साल 1999 में भारत सरकार ने आदिवासियों के विकास के लिए एक राष्ट्रीय नीति का प्रस्ताव भी किया था, जिसमें शिक्षा, वन, स्वास्थ्य सेवा, भाषा, पुनर्वास और भूमि अधिकार पर विशेष जोर दिया गया था. एनडीए सरकार ने आदिवासी मामलों का मंत्रालय भी बनाया था. लेकिन इसमें कोई खास प्रगति नहीं हुई. लेकिन यह भी कहा जाना चाहिए कि आदिवासियों के लिए अचानक उमड़ी चिंता की वजह उनके ईसाइयत अपनाने की आशंका थी, जिससे उनके हिंदू समाज में सम्मिलन में मुश्किल हो जाती. इसलिए छत्तीसगढ़ और झारखंड बनने के बाद भी आदिवासियों के वास्तविक मुद्दों का समाधान नहीं हुआ.

यदि आदिवासी नेता उभरते भी हैं, तो उन्हें पारंपरिक सत्ता वर्ग के तौर-तरीके अपने में समेट लेते हैं और वे भी भ्रष्ट हो जाते हैं. यूपीए सरकार ने वनाधिकार को स्वीकृत करते हुए 2005 में अनुसूचित जनजाति विधेयक प्रस्तावित किया, लेकिन स्वयंभू वन्यजीव कार्यकर्ताओं और वन्यजीव पर्यटन लॉबी के दबाव में कुछ नहीं हो सका. 16 दिसंबर, 1946 में संविधान सभा में प्रख्यात आदिवासी नेता जयपाल सिंह ने कहा था- ‘एक जंगली, एक आदिवासी होने के नाते मुझसे इस प्रस्ताव के कानूनी पेचों को समझने की उम्मीद नहीं की जा रही है, लेकिन मेरी समझ मुझे कहती है कि हम सभी को आजादी और संघर्ष की राह पर साथ चलना होगा.

यदि भारतीयों में से किसी के साथ बहुत खराब बर्ताव हुआ है, तो मेरे लोगों के साथ हुआ है. उन्हें उपेक्षित किया गया है. सिंधु घाटी सभ्यता, जिसकी मैं संतान हूं, का इतिहास बताता है कि बाद में आनेवाले, यहां बैठे आपमें से अधिकतर आक्रांता हैं, लोगों ने मेरे लोगों को सिंधु घाटी से जंगलों में भगाया. मेरे लोगों का पूरा इतिहास गैर-मूलनिवासियों द्वारा लगातार शोषण और दोहन का रहा है, जिसमें कभी-कभी विद्रोह और अराजकता का दौर रहा है, और फिर भी मैं पंडित जवाहरलाल नेहरू की बातों पर भरोसा कर रहा हूं. मैं भरोसा कर रहा हूं कि हम स्वतंत्र भारत के एक नये अध्याय की शुरुआत कर रहे हैं, जहां अवसर की समानता होगी और किसी की भी उपेक्षा नहीं होगी.’

जयपाल सिंह की नजर में वह प्रस्ताव उनके अपने लोगों के विचारों की आधुनिक अभिव्यक्ति थी. आदिवासी समाज में जाति और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं था. इसलिए, ‘आप आदिवासी लोगों को लोकतंत्र नहीं सिखा सकते हैं, आपको उनसे लोकतांत्रिक तरीके सीखना है.’ नेहरू के इन शब्दों पर भरोसा करने का खामियाजा आदिवासियों को भुगतना पड़ा. यदि संवैधानिक प्रावधानों को थोड़ा-बहुत भी लागू किया जाता, आज की स्थिति नहीं पैदा होती.

लेकिन विरोधाभास भी हैं, जिन पर विचार होना चाहिए. इनमें सबसे अहम है कानून-व्यवस्था की सबसे खराब हालत में अच्छा शासन देना. मौजूदा व्यवस्था की जगह एक बेहतर नागरिक प्रशासनिक संरचना स्थापित होनी चाहिए. इसका मतलब है कि देशभर से अच्छे अधिकारियों की नियुक्ति. संभवत: एक नयी अखिल भारतीय लोकसेवा की स्थापना का यही समय है, उसी तरह जैसी कभी भारतीय सीमावर्ती प्रशासनिक सेवा होती थी. उस सेवा में सरकार के विभिन्न हिस्सों से चुनिंदा अधिकारी शामिल होते थे.

दुर्भाग्य से भारतीय प्रशासनिक सेवा में उसका विलय कर दिया गया. सभी आदिवासी बहुल क्षेत्रों को प्रशासनिक विभागों में बांटकर, उसके अधिकार लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नेतृत्व के हाथ में दिया जाना चाहिए. इसे आदिवासी महापंचायत कहा जा सकता है तथा इसे स्वायत्त संस्था के रूप में काम करना चाहिए. राज्य विधायिकाओं द्वारा पारित कानूनों को इस पंचायत की मंजूरी के बाद ही लागू किया जाना चाहिए. राज्य की राजधानी से नियंत्रित शासन की जगह शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, सड़क और जमीन के कागजात की जिम्मेदारी स्थानीय शासकीय संरचनाओं को सौंप देना चाहिए. पुलिस को भी खुद में कानून न होकर इनके प्रति जवाबदेह होना चाहिए.

सरकार में अपनी भूमिका को लेकर आदिवासियों का क्षोभ जगजाहिर है. कई लोकगीतों में इसका उल्लेख है, जैसे इस गीत में अभिव्यक्त किया गया है- ‘और ईश्वर बहुत परेशान थे/ अपने स्वर्गिक दरबारों व बैठकों में/ उनमें गोंडों के देवता शामिल नहीं थे./ दूसरी कौमों के देवता वहां थे/ अठ्ठारह वृत्तों में ब्राह्मण/ 16 कोटि तेलंगानाओं की/ लेकिन उनमें गोंडों के देवता शामिल नहीं थे/ सात पर्वतों की घाटियों से/बारह पहाड़ियों की घाटियों से.’

Posted by : Sameer Oraon

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मोहन गुरुस्वामी

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By मोहन गुरुस्वामी

मोहन गुरुस्वामी is a contributor at Prabhat Khabar.

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