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चुनाव प्रबंधन बनाम जनता के मुद्दे

By अरविंद मोहन
Updated Date
प्रतीकात्मक तस्वीर

अरविंद मोहन

वरिष्ठ पत्रकार

बिहार का यह चुनाव प्रबंधन कौशल और संसाधनों के बरक्स जनता के मुद्दे और स्वाभाविक नाराजगी/पसंदगी के बीच था. देर शाम तक आते नतीजों से लग रहा है कि प्रबंधन कौशल और संसाधन भारी पड़ रहा है. पर नतीजे दूसरी तरफ भी जा सकते हैं. विपक्ष के साथ अपनी राजनीति को एक मुकाम तक ले आये राजद नेता तेजस्वी के लिए ही नहीं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए भी चुनाव का संदेश यही है कि संगठन और प्रबंधन पर ध्यान दिये बगैर भारतीय जनता पार्टी से लड़ाई मुश्किल है.

भाजपा ने बिहार में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर एक मुकाम तो हासिल कर लिया है और अब यहां से उसके लिए बिहार को जीतना एक आसान लक्ष्य लग रहा है. इस चुनाव में भाजपा नेतृत्व ने लोजपा के माध्यम से जो खेल खेला, वह खतरनाक तो था, लेकिन उसने जदयू और नीतीश का ‘कद’ तय कर दिया, जहां से उनके लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी लेना भी आसान न होगा और सरकार चलाना भी. अब अंतिम नतीजे कहां जाते हैं, इन पर नजर रहेगी,

लेकिन नतीजों की दिशा को लेकर कोई कंफ्यूजन नहीं रह गया है. दो बातें भरोसे से कही जा सकती हैं कि तेजस्वी यादव एक सितारे के तौर पर उभरे हैं. अगर वे मुख्यमंत्री बनते हैं, तो ऑल इंडिया स्टार हैं, वरना वे बिहार की राजनीति के नये स्टार तो हैं ही और भविष्य में उन पर सबकी नजर होगी. वह सिर्फ बिहार के ही नहीं, विपक्ष की राजनीति के भी एक महत्वपूर्ण खिलाडी होंगे.

उन्होंने जिस तरह कम साधनों और लगभग अकेले चुनाव का एजेंडा तय किया और भाजपा व जदयू की साझा ताकत का मुकाबला किया, वह काबिले-तारीफ है. उनके साथियों में कम्युनिस्ट पार्टियों से तो उन्हें मदद मिली होगी, लेकिन कांग्रेस का बोझ ही रहा. कम्युनिस्टों के पास साधन कम हैं, लेकिन कार्यकर्ता, संगठन और सिद्धांत हैं. कांग्रेस ने उनकी विश्वसनीयता और धर्मनिरपेक्षता को पुख्ता किया और इससे मुसलमान वोट का भारी बहुमत हासिल होने में मदद मिली होगी.

पर पहले दौर के मतदान और तेजस्वी की सभाओं में उभरी भीड़ ने जिस तरह ‘लाउड’ मुसलमान और यादव सपोर्ट खड़ा किया, उसने अति पिछड़ों और महिलाओं का काउंटर पोलराइजेशन भी कराया. दूसरे और उससे भी ज्यादा तीसरे दौर के नतीजे इसकी पुष्टि करते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले दौर के मतदान के बाद अगर जंगल राज और डबल युवराज का मुद्दा उठाया, तो उसका लाभ उनको हुआ लगता है. भाजपा का बाकी कार्ड नहीं चला.

भाजपा का उत्साह इस नतीजे से बढ़ेगा ही नहीं, बल्कि बहुत बढ़ेगा. उसने काफी कुछ हासिल कर लिया. वह एक नंबर की पार्टी बन गयी है और अगर नीतीश मुख्यमंत्री बने भी, तो उसकी दया पर आश्रित होंगे. भाजपा इस उत्साह से बंगाल और असम के चुनाव में उतरेगी. वह जिस तरह से इसके सेलिब्रेशन की तैयारी में है, वह भी इसी ओर इशारा कर रहा है.

नीतीश कुमार बूढ़े और थके लगते हैं तथा तेजस्वी द्वारा दिया तमगा उन पर चिपक गया है. खुद उन्होंने भी अपना आखिरी चुनाव घोषित करके इस तमगे को गले लगा लिया है. वे पहले भी सिद्धांत और संगठन को तिलांजलि दे चुके हैं. सो, अब आगे उनके फिर उभरने और पार्टी को खड़ा करने की उम्मीद करना गलत होगा. अगर भाजपा के लिए सांप्रदायिकता न चलना एक मुद्दा हो सकता है, तो जातिवाद न चलना एक लाभ भी है.

जाति का डिस्कोर्स कम्युनल डिस्कोर्स को काटता है. और, अगर संगठन, कार्यकर्ता और साधन उसके पास हैं, तो वह आगे की राजनीति और बिहार में तेजी से आगे बढ़ सकते हैं. भाजपा के लिए कई लाभ साफ दिख रहे हैं. लोकसभा चुनाव के बाद वह पहले विधानसभा चुनाव में आगे बढ़ी है.

अब वह बिहार में भी लोकसभा वाला नतीजा नहीं पा सकी है. ऐसे में अगर मुख्यमंत्री को लेकर या किसी भी तरह विवाद बढ़े (जो चुनाव के दौर में भी दिखे) तो संभव है कि बचा-खुचा एनडीए भी बिखर जाए. यह जीत में हार हो सकती है. जिस तरह की कड़वाहट चुनाव में आयी है, उसे हार तो बढ़ायेगी ही, जीत भी मुश्किल से स्थिति संभाल पायेगी. शिव सेना, अकाली दल,लोजपा के बाद जदयू को खोना भाजपा को भारी पड़ सकता है.

जब बिहार का चुनाव बदला था, जब बिहार के मुद्दे बदले थे, जब राजनीति एक पीढ़ी से दूसरी पर जाती लग रही थी, तब रिजल्ट का कंफ्यूजन आगे के लिए निराशा पैदा करता है. लोजपा और दूसरे छोटे दल कुल मिलाकर वोटकटवा ही साबित हुए हैं. अब इन्होंने एनडीए को नुकसान पहुंचाया या महागठबंधन को, यह अध्ययन का विषय है. लेकिन नीतीश और उनकी पीढ़ी के लिए ही नहीं, इस तरह के छोटे दल और जाति के नेताओं के लिए भी यह चुनाव काफी सारे साफ संदेश देता है. ऐसे लोग कम नहीं हैं, जो मानते हैं कि ज्यादातर छोटे दल और गठबंधन भी भाजपाई प्रबंधन कौशल का ही नतीजा हैं.

posted by : sameer oraon

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