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आवश्यक है पारस्परिक संतुलन

Updated at : 22 May 2020 1:42 PM (IST)
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आवश्यक है पारस्परिक संतुलन

मनुष्य, प्रकृति प्रदत्त उस पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें सभी जीव-जंतु एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. प्रकृति प्रदत्त एवं निरंतर विकासशील यह पारिस्थितिकी तंत्र जैव विविधता की दृष्टि से जितना समृद्ध होता है, उतना ही संतुलित माना जाता है. सूक्ष्म जीवों से लेकर बड़े-बड़े वृक्ष एवं जीव इस पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इनमें से किसी एक के भी लुप्त होने पर पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है.

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डॉ लाल रत्नाकर सिंह

पूर्व अध्यक्ष, झारखंड जैव विविधता बोर्ड

delhi@prabhatkhabar.in

जैव-विविधता दिवस

मनुष्य, प्रकृति प्रदत्त उस पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें सभी जीव-जंतु एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. प्रकृति प्रदत्त एवं निरंतर विकासशील यह पारिस्थितिकी तंत्र जैव विविधता की दृष्टि से जितना समृद्ध होता है, उतना ही संतुलित माना जाता है. सूक्ष्म जीवों से लेकर बड़े-बड़े वृक्ष एवं जीव इस पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इनमें से किसी एक के भी लुप्त होने पर पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है. जैव विविधता सूक्ष्म जीवों, वायरस एवं अन्य रोगाणुओं को उनके वास्तविक पर्यावास में बगैर एक-दूसरे को क्षति पहुंचाये इस संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र में बांधकर रखती है. इस वजह से इन रोगाणुओं को अप्राकृतिक वासस्थल तलाशने की आवश्यकता नहीं पड़ती है. मानव जाति ने विकास के नाम पर प्रकृति के साथ गंभीर छेड़छाड़ की है.

वन भूमि के नष्ट होने से वन्यजीवों के पर्यावास समाप्त हो रहे हैं. परिणामत: वन्य जीव अपने प्राकृतिक पर्यावास को छोड़कर बाहर जाने को बाध्य हो रहे हैं. मानव-हाथी टकराव, मानव-तेंदुआ टकराव जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं. मानव एवं वन्य प्राणियों के ऐसे टकराव आंखों से देखे जा सकते हैं. परंतु, ऐसी घटनाएं सूक्ष्म जीवों के प्राकृतिक आवास, जो कई मामलों में वन्य प्राणियों के शरीर स्वयं हैं, के साथ भी हो रही हैं. वर्तमान में फैली कोविड-19 महामारी, साल 2012 में मर्स महामारी और साल 2003 में सार्स महामारी, ऐसे टकरावों के उदाहरण हैं, जो मानव शरीर में पशुजन्य बीमारियों के रूप में प्रकट होती है.

इस प्रकार इन जीवाणुओं को मानव शरीर के रूप में बहुतायत पर्यावास मिलता है, जो मानव जाति की उत्तरजीविता पर संकट उत्पन्न कर सकता है. पूरे विश्व में जंगलों के विनाश से वन्य प्राणियों के प्राकृतिक आवास लुप्त होते जा रहे हैं. यदि झारखंड राज्य के परिप्रेक्ष्य में हम देखें, तो मात्र मंडल डैम के निर्माण में 3,44,000 वृक्षों की कटाई प्रस्तावित है. घने जंगल नष्ट होने से, इन क्षेत्रों में रह रहे वन्य प्राणी जैसे चमगादड़, सियार, सिवेट कैट एवं अन्य अनगिनत जानवर अन्यत्र अपने पर्यावास को तलाशते हैं. इस कारण सीधे संपर्क अथवा अन्य किसी जानवर के माध्यम से इन वन्य प्राणियों में बगैर किसी को क्षति पहुंचाये रह रहे रोगाणु मानव जाति के संपर्क में आते हैं और यह संक्रमण महामारी के रूप में फैलता है. अत: विकास योजनाओं के कार्यान्वयन के पहले ही वन कटाई का पर्यावरणीय दृष्टि से वास्तविक मूल्यांकन होना चाहिए, क्योंकि प्राकृतिक वन एवं उसमें रहनेवाले वन्य प्राणी इन रोगाणुओं को अपने आप में गुब्बारे की तरह समेटे हुए हैं. वनों को नष्ट करना, इन गुब्बारों को फोड़कर मानव जाति को विभिन्न महामारियों के खतरे में डालने जैसा है.

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डॉ लाल

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By डॉ लाल

डॉ लाल is a contributor at Prabhat Khabar.

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