मजदूरों की मजबूरी

Updated at : 08 May 2020 6:15 AM (IST)
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मजदूरों की मजबूरी

केंद्र और राज्य सरकारों ने कामगारों को राहत पहुंचाने के इंतजाम तो किये हैं, पर ये इंतजाम नाकाफी हैं. सरकारों को यह भी समझना चाहिए कि गरीब और बेबस मजदूरों को सिर्फ आर्थिक तंगी का ही सामना नहीं करना पड़ रहा है, उनके सामने एक अनिश्चित भविष्य भी है.

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कर्नाटक सरकार ने प्रवासी मजदूरों को वापस उनके गृह राज्यों में भेजने पर रोक लगाने तथा विशेष ट्रेनों को रद्द करने का दुर्भाग्यपूर्ण फैसला वापस ले लिया है. यह सराहनीय कदम है. जब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने श्रमिकों को जाने की अनुमति दे दी और श्रमिक वापस जाना भी चाहते हैं, तो फिर उन्हें रोकना सही नहीं है. केंद्र और राज्य सरकारों ने कामगारों को राहत पहुंचाने के इंतजाम तो किये हैं, पर ये इंतजाम नाकाफी हैं. सरकारों को यह भी समझना चाहिए कि गरीब और बेबस मजदूरों को सिर्फ आर्थिक तंगी का ही सामना नहीं करना पड़ रहा है, उनके सामने एक अनिश्चित भविष्य भी है. परेशानियों ने उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से झटका दिया है.

कुछ अन्य राज्यों में मजदूरों को वापसी के लिए पंजीकरण कराने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. अनेक जगहों पर उनके साथ पुलिस और प्रशासन का रवैया भी बहुत खराब रहा है. ये सारी खबरें तस्वीरों के साथ सभी जगह के मजदूरों के पास पहुंच रही हैं और उनकी बेचैनी बढ़ रही है. जिन जगहों पर उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध रोका जा रहा है, वहां भी उनके रहने, खाने और संक्रमण से बचाव की व्यवस्था समुचित रूप से नहीं की गयी है. ऐसे में उन्हें बलपूर्वक रोकना या मजदूरी करने की उनकी मजबूरी का उन्हीं के खिलाफ इस्तेमाल करना न तो मानवीय है और न ही वैधानिक. हमारे देश के लगभग 90 फीसदी कामगार असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं और इनमें से बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो दूसरे राज्यों के गांवों से आकर शहरों में काम करते हैं. असंगठित क्षेत्र में अनियमित और कम आमदनी के साथ सामाजिक सुरक्षा या अन्य भत्तों का अभाव भी होता है.

ऐसे में कोई कारोबार या उद्योग जब बंद होता है, तो कामगारों की रोजी-रोटी का जरिया भी छीन जाता है. इसी वजह से लॉकडाउन के बाद से ही कई शहरों से भारी तादाद में कामगार अपने गांव लौट रहे हैं क्योंकि शहरों में आर्थिक गतिविधियां ठप हैं और इन मजदूरों के लिए रोजमर्रा का खर्चा चला पाना बेहद मुश्किल है. उनकी मजबूरी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बसों और ट्रेनों के नहीं चलने के कारण वे पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर रात-दिन चल रहे हैं.

ध्यान रहे, कोरोना संकट के बाद जब आर्थिक गतिविधियों को फिर से सुचारू रूप से चलाना होगा, तो इन्हीं मजदूरों की जरूरत पड़ेगी. ऐसे में उनके साथ किसी भी तरह की ज्यादती भविष्य के लिए नकारात्मक हो सकती है. बहुत सारे मजदूर तो कहने भी लगे हैं कि ऐसे व्यवहार के बाद वे वापस उसी जगह काम के लिए नहीं लौटना चाहेंगे. ऐसा नहीं होना चाहिए. सरकारों को श्रमिकों के साथ जिम्मेदारी और सहानुभूति का बर्ताव करना चाहिए तथा राहत पहुंचाने और संक्रमण की जांच करने की व्यवस्था बेहतर करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए.

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