विश्व आर्थिक मंच पर दिखी भारत की मजबूती, पढ़ें अभिजीत मुखोपाध्याय का आलेख

Updated at : 29 Jan 2026 7:11 PM (IST)
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World Economic Forum

विश्व आर्थिक मंच पर दिखी भारत की मजबूती, एआई- फोटो

World Economic Forum: जब अमेरिकी विश्वसनीयता पर यूरोप सवाल उठा रहा है, पर चीन पर अत्यधिक निर्भरता से डरता है, तब भारत व्यापार, तकनीक और सुरक्षा संवादों के विविधीकरण के लिए आकर्षक भागीदार बन जाता है.

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World Economic Forum: दावोस में संपन्न हुई विश्व आर्थिक मंच की बैठक ने तीन प्रमुख प्रवृत्तियों को स्पष्ट किया है : अमेरिका और यूरोप के बीच टूटता भरोसा, अमेरिकी टैरिफ और क्षेत्रीय दुस्साहस के खिलाफ सहयोगियों का खुला विरोध तथा पुराने जी-7 के अमेरिकी सुरक्षा छत्र से इतर ‘मध्यम शक्तियों’ के बीच समन्वय की तलाश. ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय सहयोगियों पर ट्रंप की टैरिफ धमकियों और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के लिए सैन्य दबाव के विचार ने यूरोप को वाशिंगटन के साथ अपने मजबूत रिश्ते से पीछे हटने पर सोचने को मजबूर कर दिया है. इस पृष्ठभूमि में दावोस में मध्यम शक्तियों ने सामूहिक रूप से अपनी आवाज बुलंद की है. अब चर्चा एकल वर्चस्व के बजाय ‘बहुकेंद्रित बहुपक्षवाद’ और नियम निर्धारण के कई केंद्रों पर केंद्रित है.

भारत इस समय कोई मामूली खिलाड़ी नहीं है. यह उन गिने-चुने देशों में है, जो एक ही समय में वाशिंगटन, यूरोप, मॉस्को, बीजिंग और व्यापक ग्लोबल साउथ से विश्वसनीय रूप से संवाद कर सकता है. पर भारत की अहमियत इस पर निर्भर करेगी कि अगले पांच-दस वर्षों में वह अपनी इस रणनीतिक स्थिति को कितनी जल्दी ठोस आर्थिक, तकनीकी और संस्थागत निवेशों में बदल पाता है. भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, रक्षा पर खर्च करने वाले शीर्ष तीन देशों में शामिल है, परमाणु संपन्न है और यूरोप से हिंद-प्रशांत तथा पश्चिम एशिया तक इसकी कूटनीतिक पहुंच है. क्वाड, ब्रिक्स, एससीओ और खाड़ी व अफ्रीका में गहरे संबंधों का नेटवर्क इसे ऐसी केंद्रीयता प्रदान करता है, जो कम देशों के पास है. पर भारत की प्रति व्यक्ति आय, मानव पूंजी में अंतराल, और आयातित उच्च तकनीक व ऊर्जा पर निरंतर निर्भरता परिणामों को आकार देने की इसकी क्षमता सीमित करती है.

भारत अकेले वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं की जिम्मेदारी नहीं उठा सकता. न भारत विकासशील देशों को चीन के बराबर पूर्ण तकनीकी-पूंजी-सुरक्षा पैकेज दे सकता है. भारत एक नयी व्यवस्था के अकेले ‘स्तंभ’ के रूप में कम और एक महत्वपूर्ण ‘स्विंग एक्टर’ (निर्णायक भूमिका निभाने वाले) के रूप में अधिक मायने रखता है. तीन क्षेत्र हैं, जहां भारत की भूमिका वास्तविक है. पहला, यह पश्चिम और ग्लोबल साउथ के बीच सेतु बन सकता है. जी-20 और ग्लोबल साउथ के प्रति भारत की सक्रियता तथा अमेरिका-यूरोप में प्रवासी भारतीयों की मौजूदगी इसे एक विश्वसनीय वार्ताकार बनाती है. जब अमेरिकी विश्वसनीयता पर यूरोप सवाल उठा रहा है, पर चीन पर अत्यधिक निर्भरता से डरता है, तब भारत व्यापार, तकनीक और सुरक्षा संवादों के विविधीकरण के लिए आकर्षक भागीदार बन जाता है.

दूसरा पहलू टैरिफ युद्धों के बीच ‘भू-आर्थिक संतुलनकर्ता’ के रूप में भारत की भूमिका है. भारतीय निर्यातों पर 50 फीसदी तक के अमेरिकी टैरिफ और रूसी तेल खरीद से जुड़ी धमकियों ने नयी दिल्ली को यूरोप, चीन और रूस के साथ आर्थिक संबंधों को गहरा करने के लिए प्रेरित किया है. तीसरा, भारत बहुपक्षीय नियमों का नियामक बन सकता है, जो व्यापार, तकनीक और वित्त में एकतरफा प्रतिबंधों और टैरिफ के खिलाफ सबसे स्पष्ट आवाजों में से एक बनकर उभरा है. यह संयुक्त राष्ट्र, आइएमएफ और डब्ल्यूटीओ में सुधारों की वकालत कर रहा है. ग्लोबल साउथ का गठबंधन बनाने की इसकी क्षमता का अर्थ है कि डिजिटल व्यापार, डेटा गवर्नेंस या जलवायु वित्त जैसे मुद्दों पर वैश्विक समझौते इस बात पर निर्भर करेंगे कि भारत उन पर हस्ताक्षर करता है या नहीं. भारत के लिए, अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच विश्वास का टूटना एक अवसर भी है और जोखिम भी. इसके चार मुख्य पहलू हैं :

आर्थिक और व्यापारिक प्रभाव : अमेरिकी संरक्षणवाद वैश्विक फर्मों को अधिक अनुकूल क्षेत्रों की तलाश करने पर मजबूर करता है, जिससे भारत को लाभ हो सकता है, यदि वह नियामक स्थिरता प्रदान करे. पर यदि भारत को चीन-रूस गुट के बहुत करीब माना गया, तो उसे द्वितीयक प्रतिबंधों और तकनीकी बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है

दबाव में सामरिक स्वायत्तता : गुटों की राजनीति तेज होने पर ज्यादा देशों के साथ संबंध बनाने की नीति को संभालना कठिन हो जाता है. वाशिंगटन रूस-चीन पर एकजुटता चाहता है, जबकि बीजिंग-मॉस्को अमेरिकी प्रतिबंधों के खिलाफ साथ चाहते हैं. कोई भी गलत कदम एक खेमे में विश्वास कम कर सकता है.

संस्थागत और मुद्रा परिवर्तन : यदि ब्रिक्स का विस्तार हो और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां अमेरिकी दबाव में जोर पकड़ें, तो भारत को यह चुनना होगा कि वह ‘डी-डॉलरइजेशन’ में कितनी दूर तक जाये और उन संस्थानों पर कितना भरोसा करे, जहां चीन का प्रभाव अत्यधिक है.

घरेलू सुधार की जरूरत : एक खंडित विश्व व्यवस्था में घरेलू क्षमता- लॉजिस्टिक्स, बुनियादी ढांचा, मानव पूंजी और रक्षा निर्माण- का मूल्य बढ़ जाता है. यदि भारत चीन से हटने वाले विदेशी निवेश का लाभ उठा सके और अपने सेमीकंडक्टर व हरित ऊर्जा मिशनों को गहरा कर सके, तो वह इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल को विकास के अवसर में बदल सकता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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अभिजीत मुखोपाध्याय

लेखक के बारे में

By अभिजीत मुखोपाध्याय

अभिजीत मुखोपाध्याय is a contributor at Prabhat Khabar.

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