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सामूहिक खुशी का त्योहार है होली

Updated at : 14 Mar 2025 11:26 AM (IST)
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Holi Traditions

होली की परंपराएं

Holi Traditions : उन दिनों होली में जिन रंगों का प्रयोग होता था, वे वास्तविक होते थे. टेसू के लाल रंग के फूलों को लाकर उनका रस निकाला जाता था और उनसे होली खेली जाती थी. चूंकि टेसू के फूलों से निकले रंग बड़ी तादाद में नहीं होते थे, इसलिए बाजारों से भी रंग लाये जाते थे. तब पीपे में रंग मिलते थे और उन्हें ही बाल्टी के पानी में डाल रंग तैयार किया जाता था.

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Holi Traditions : मेरा गांव बिल्कुल नेपाल की सीमा पर स्थित है, हिमालय पर्वत की शृंखलाएं वहां से दिखाई पड़ती हैं. तब आवागमन के साधन इतने नहीं थे. बरसात में गांव पूरे देश से कट जाता था. मेरे गांव के एकदम से कटे रहने, उसके अकेले रहने से यह हुआ कि जो मध्यकालीन परंपराएं थीं, वे बिल्कुल सुरक्षित रहीं. तब होली एक दिन की नहीं होती थी. लगभग एक महीना पहले से होली के गाने शुरू हो जाते थे. हमारा गांव बड़ा था, तो कई सारे मोहल्ले भी थे. तो मोहल्ले-मोहल्ले में मंडलियां होती थीं. ये मंडलियां शाम को खाना खाकर आठ-नौ बजे बैठती थीं और होली गाती थीं. उन दिनों सभी मिलकर होली मनाते थे. चाहे वह धनी हो या निर्धन, सभी होली के गानों में शामिल हो जाते थे. किसी के आने-जाने पर रोक नहीं थी. अपेक्षाकृत जो समृद्ध लोग होते थे, कोई बहुत पैसे वाले नहीं, तो जिनके घर पर होली की मंडली बैठती थी, वे दरी बिछा देते थे और जब गायन समाप्त हो जाता था, तो बताशा, चाय, लड्डू, मिठाई, सूखा चना व गुड़ सबमें बांट देते थे. सच, बड़ा आनंद आता था तब. होली की गूंज और अनुगूंज चारों ओर फैलती रहती थी. तो होली के लगभग एक महीने पहले से ही गांव में होली का वातावरण बन जाता था. यह मैं आपसे 1935 या 1936 की बात कर रहा हूं, जब मैं चार या पांच वर्ष का था.


होली में रंग डालना, मजाक करना, हंसी-ठट्ठा करना महीने भर से शुरू हो जाता था. ऐसे-ऐसे गाने होते थे कि पूछो मत. कुछ गाने मुझे अब भी याद हैं. उनमें से कुछ गाने बड़े अश्लील हुआ करते थे. एक गाना बहुत प्रसिद्ध था, जिसमें बूढ़ों को देखकर महिलाएं ठिठोली करती थीं और गाती थीं- ‘फागुन भर बाबा देवर लगें’, यानी फागुन के महीने में बूढ़े लोग भी हमारे देवर लगते हैं. इसे ऐसे समझिए कि प्राचीन काल में मदनोत्सव का जो रूप होता था, जैसा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की पुस्तकों में मिलता है, होली का वही रूप मेरे गांव में देखने को मिलता था. इस दौरान सामाजिक मर्यादाएं थोड़ी सी ढीली पड़ जाती थीं. लोग एक-दूसरे से खुलकर मजाक किया करते थे. विशेषकर भाभी और देवर का मजाक बहुत अधिक होता था. हमारे जमाने में गांव में तब महिलाएं अलग से होली गाती थीं. कभी-कभी पुरुष और महिलाओं के बीच गाने की प्रतिस्पर्धा भी होती थी. महिलाएं कहीं अधिक चाव से गाती थीं. इसके साथ-साथ होली में विशिष्ट पकवान जैसे गुजिया, गुलगुला, पूरी आदि बनती थी. चूंकि तब गरीबी बहुत थी, तो जो इस तरह की चीजें बना सकते थे, वे जरूर बनाते थे. लोगों को यह त्योहार इतना पसंद था कि पूरे वर्ष वे इसकी प्रतीक्षा करते रहते थे. गांव के मुसलमान, विशेषकर युवा लड़के, वे तो खूब होली खेलते थे, पर बड़े-बुजुर्ग थोड़ी सावधानी बरतते थे. इसी कारण कभी-कभार झगड़ा भी हो जाता था, पर वह मामूली होता था.


उन दिनों होली में जिन रंगों का प्रयोग होता था, वे वास्तविक होते थे. टेसू के लाल रंग के फूलों को लाकर उनका रस निकाला जाता था और उनसे होली खेली जाती थी. चूंकि टेसू के फूलों से निकले रंग बड़ी तादाद में नहीं होते थे, इसलिए बाजारों से भी रंग लाये जाते थे. तब पीपे में रंग मिलते थे और उन्हें ही बाल्टी के पानी में डाल रंग तैयार किया जाता था. रंगों से सुगंध आये, इसके लिए उनमें केवड़ा भी डाला जाता था. उसके बाद पिचकारी से एक-दूसरे पर रंग डाला जाता था. कभी-कभी यह भी होता था कि जिनसे अत्यधिक प्रेम है, भावातिरेक है, उनके यहां जाकर उन पर लोग रंगभरी बाल्टी या रंग से भरा गगरा उड़ेल देते थे. क्या बुड्ढे, क्या जवान, क्या बच्चे, क्या महिलाएं, क्या युवतियां, सभी पूरी मस्ती के साथ होली खेलते थे और गाते थे. इस दौरान सभी जाति के लोग एक-दूसरे को रंग लगाते थे. कोई छुआछूत वाली बात नहीं होती थी. सभी एक-दूसरे को स्पर्श करते थे. होली में किसी के साथ किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होता था. होली खेलने से पहले होलिका दहन किया जाता था. इसके लिए गांव में देवी स्थान (पाटन देवी शक्ति पीठ) के पास लकड़ी, कंडा, उपले पहले से एकत्र किये जाते थे और उसे जलाने से पहले मंगलाचरण गाया जाता था. फिर भक्ति गीत यानी भजन गाया जाता था, देवी की स्तुति की जाती थी. गांव के लोग मंडलाकार ढोलक के साथ इसे गाते थे. इसके बाद होलिका जलायी जाती थी.


आज के और पहले जमाने की होली के बीच के अंतर की यदि बात करें, तो पहले सामूहिकता बहुत थी, जो आज समाप्त हो गयी है. हालांकि यह भी हो सकता है कि कई जगहों पर सामूहिकता बची हुई हो. पहले होली, दिवाली, दशहरा समेत सभी त्योहार लोग मिलकर मनाते थे. होली के दिन तो मोहल्ले में टोलियां निकलती थीं, प्रत्येक टोली में 15-20 लोग होते थे. टोली के सभी लोग एक साथ नाचते-गाते हुए सभी के दरवाजे पर जाते थे, वहां जाकर होली गाते थे, रंग डालते थे, फिर उस घर के लोग टोलियों को मिठाई-गुजिया-दही बड़ा आदि खिलाते थे. पर आज के जमाने में सब कुछ वैयक्तिक हो गया है. पहले उत्सव पर जो लोगों का सामूहिक रूप दिखाई पड़ता था, उसका एक तरह से लोप हो चुका है. मेरा मानना है कि जो उत्सवप्रियता होती है, उत्सवधर्मिता होती है, उसका वास्तविक स्वरूप तो सामूहिकता में ही दिखाई पड़ता है. कह सकते हैं कि आज भी गांवों में एक हद तक होली का पुराना स्वरूप बचा हुआ है, ऐसा शहरों में भी हो सकता है. पर प्रश्न उठता है कि परंपरा को हम किस रूप में देखना चाहते हैं. हम अपनी परंपरा को अक्षुण्ण बनाये रखना चाहते हैं या नहीं.

हमारी जो सामाजिक विशेषताएं हैं, उन्हें हम जीवित रखना चाहते हैं या उनसे कोई मतलब नहीं रखना चाहते हैं.
यदि हम चाहें, तो अब भी अपनी परंपराओं को पूर्व की तरह बनाये रख सकते हैं. आखिर वोट मांगने के लिए तो लोग जाते ही हैं एक-दूसरे के यहां. दूसरे अन्य अवसरों पर भी लोग एक-दूसरे से मिलते ही हैं. तो यदि होली के दिन, होली के अवसर पर भी लोग निकल पड़ें, एक-दूसरे से मिलें, इकट्ठा हो बैठें, तो क्यों नहीं लौटेगा भला होली का पुराना व वास्तविक स्वरूप. दूसरा उपाय यह हो सकता है कि कोई ऐसा सामाजिक नेता हो, जो अपनी परंपराओं को बचाने के लिए कदम उठाये. इस तरह के कार्य कुछ वैसे संगठन भी कर सकते हैं, जो अपने आपको हिंदुओं का संगठन मानते हैं. इन सबको आगे आना होगा, हमारे सांस्कृतिक उत्सवों पर, हमारी क्षीण होती परंपराओं पर ध्यान देना होगा, उनको जीवित करने का काम करना होगा. इन सबका प्रभाव पड़ेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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चंदन तिवारी

लेखक के बारे में

By चंदन तिवारी

चंदन तिवारी is a contributor at Prabhat Khabar.

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