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हमास-इस्राइल युद्ध विराम सही कदम है, पढ़ें डॉ धनंजय त्रिपाठी का खास लेख

Updated at : 20 Jan 2025 8:00 AM (IST)
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हमास-इस्राइल युद्ध विराम

Hamas–Israel ceasefire : हमास और इस्राइल, दोनों ही एक-दूसरे के बाकी बचे हुए बंधकों को रिहा करेंगे. अब बात तीसरे चरण की. तो, तीसरे चरण में गाजा में पुनर्निर्माण का प्रस्ताव है, क्योंकि युद्ध के दौरान गाजा में बड़े पैमाने पर तबाही हुई है.

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Hamas–Israel ceasefire : इस्राइल और हमास के बीच बीते लगभग 15 महीने से चल रहे युद्ध को समाप्त करने के लिए हाल ही में दोनों पक्षों द्वारा सहमति जताने का स्वागत किया जाना चाहिए. यह एक अच्छा प्रस्ताव है, क्योंकि वहां पर बहुत दिनों से दोनों पक्षों के बीच लड़ाई चल रही थी और इसमें आम जनता ही ज्यादा हताहत हो रही थी. उसे ही ज्यादा नुकसान हो रहा था. इस हिसाब से देखा जाए, तो गाजा में युद्ध रोकने का यह एक अच्छा प्रयास है. अच्छा प्रयास इसलिए भी, क्योंकि तमाम अंतरराष्ट्रीय संगठन इस युद्ध को रोकने में विफल रहे हैं. यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था भी. तो, युद्ध विराम पर दोनों पक्षों द्वारा सहमति जताना एक बड़ी चीज है, एक सकारात्मक कदम है.


इस प्रस्ताव को लेकर दूसरी जो महत्वपूर्ण बात है, वह इसमें मौजूद शर्तें हैं. इन शर्तों में कहा गया है कि प्रस्ताव को तीन चरणों में लागू किया जायेगा. इसके पहले चरण के तहत, अक्तूबर 2023 में हमास द्वारा हमला करने के बाद जिन इस्राइली नागरिकों को बंधक बनाया गया था, उन इस्राइली नागरिकों को छोड़ने की बात कही गयी है. इसमें हमास की तरफ से कहा गया है कि वह पहले 33 इस्राइली बंधकों को रिहा करेगा. इस्राइल ने भी स्वीकार किया है कि वह हजार के करीब फिलिस्तीनी नागरिकों को रिहा करेगा.

विदित हो कि अभी भी करीब 90 इस्राइली नागरिक हमास के कब्जे में ही हैं. इस्राइल की लाख कोशिशों के बावजूद वे छूट नहीं पाये हैं. 42 दिनों के पहले चरण में बंधकों को छोड़ा जायेगा, युद्ध विराम होगा और इस्राइली सेना, जो फिलिस्तीनी आबादी वाले बहुत से क्षेत्रों में मौजूद हैं, उनकी वहां से वापसी होगी और जो विस्थापित फिलिस्तीनी हैं, वो इन जगहों पर वापस लौटेंगे. दूसरे चरण में यह होगा कि हमास और इस्राइल, दोनों ही एक-दूसरे के बाकी बचे हुए बंधकों को रिहा करेंगे. अब बात तीसरे चरण की. तो, तीसरे चरण में गाजा में पुनर्निर्माण का प्रस्ताव है, क्योंकि युद्ध के दौरान गाजा में बड़े पैमाने पर तबाही हुई है. एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि भले ही प्रस्ताव में कहा गया है कि इस्राइल फिलिस्तीनी आबादी वाले क्षेत्र से अपनी सेना हटा लेगा, पर इस्राइल का कहना है कि वह पूरी तरीके से इन क्षेत्रों से अपनी सेना नहीं हटायेगा.


ऊपर-ऊपर यदि देखा जाए, तो हमें लगता है कि हमास-इस्राइल द्वारा शांति प्रस्ताव को मान लेने से युद्ध विराम हो जायेगा और इस क्षेत्र में शांति आ जायेगी. इसी कारण इस प्रस्ताव को दोनों पक्षों ने माना है, परंतु यदि आप इसके तह में जायेंगे, तो पायेंगे कि इस्राइल को जो भी करना था, विशेषकर हमास की क्षमता को नुकसान पहुंचाना, तो वह बहुत हद तक ऐसा करने में सफल रहा है. हालांकि हमास पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ है, पर उसके संगठन को बड़े पैमाने पर क्षति हुई है. इसके साथ ही, लेबनान में हिज्बुल्लाह के संगठन को भी इस्राइल ने बड़ी क्षति पहुंचायी है. तो, जो युद्ध विराम हो रहा है, उससे यह समझिए कि इस्राइल के जो प्राथमिक उद्देश्य थे, उसे उसने कमोबेश पा लिया है. मेरी समझ से उसके युद्ध विराम के लिए तैयार होने का एक अन्य कारण उसके नागरिकों का हमास के कब्जे में होना है. हालांकि अभी यह नहीं कहा जा सकता कि हमास के कब्जे में जो अभी भी 90 इस्राइली नागरिक हैं, उनमें से सभी जीवित हैं या कुछ मारे जा चुके हैं. बहरहाल, युद्ध विराम के प्रस्ताव को मानने से इस्राइली अपने नागरिकों को हमास के कब्जे से छुड़ाने में सफल हो जायेगा.


जहां तक युद्ध विराम से शांति व स्थिरता की बात है, तो पहले दिन से ही यह बात लोगों के मन में थी कि इस समस्या का समाधान कभी भी केवल युद्ध नहीं हो सकता है, बातचीत, समझौता तो कभी न कभी करना ही होगा. यह बात भी सच है कि अभी जो युद्ध विराम के लिए समझौते हो रहे हैं, वहां पर हमास काफी कमजोर स्थिति में है और इस्राइल काफी मजबूत स्थिति में है. पहली बात तो यह है. दूसरी बात यह है कि इससे अरब देशों पर लगातार जो उनकी जनता की ओर से दबाव पड़ रहा था कि वह इस युद्ध में हस्तक्षेप करें, इस्राइल के साथ सख्ती से पेश आएं और ऐसा करने से वे बच रहे थे, उससे अरब देशों को भी थोड़ी राहत मिलेगी, क्योंकि युद्ध रुकने के बाद यह दबाव उनके ऊपर से हट जायेगा. चाहे वह सऊदी अरब हो या खाड़ी के अन्य देश हों.

तीसरी बात, विश्वभर में इस युद्ध को लेकर जो वाद-विवाद हो रहा था, गहमा-गहमी चल रही थी, विशेषकर पश्चिम के विश्वविद्यालयों के भीतर इसे लेकर जो प्रदर्शन चल रहे थे, वहां भी अब थोड़ी शांति आयेगी. विश्वभर में इस युद्ध को लेकर जो एक चिंता बनी हुई थी, वह कम होगी और यह जरूरी भी था, क्योंकि यह युद्ध लगभग पंद्रह महीने तो चल ही चुका था. यह युद्ध यदि और लंबा खिंचता, तो अंतरराष्ट्रीय समुदायों के बीच का विभाजन और गहरा जाता. उस हिसाब से भी यह एक अच्छी पहल है. चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे फिलिस्तीनी नागरिक, जो पूरी तरीके से विस्थापित हो गये थे, जो रोज-रोज संघर्षों से जूझ रहे थे, जिनके पास न पर्याप्त भोजन था, न दवाइयां थीं, उनके परिवार की पूरी अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी थी, इस युद्ध विराम से उनको सबसे अधिक राहत व शांति मिलेगी. एक, वे अपने घर लौट पायेंगे और उनके जीवन में जो अस्थिरता आ गयी थी, पुनर्निर्माण होने से उनमें स्थिरता आयेगी. दूसरी ओर इस्राइल के भीतर भी जो अनिश्चितता बनी हुई थी, वह दूर होगी. इस्राइली नागरिकों के जीवन में भी शांति आयेगी, क्योंकि वे भी युद्ध शुरू होने के बाद से असुरक्षा के साये में जी रहे थे. उनके जीवन पर भी निरंतर खतरा मंडरा रहा था.


अंत में, इस युद्ध के दौरान कई बार ऐसी स्थिति भी बनी जहां लगा कि ईरान और इस्राइल के बीच युद्ध न छिड़ जाए. दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ने की आशंका के कारण पूरी दुनिया में तनाव बढ़ गया था, सभी को लगता था कि ऐसी स्थिति में तेल की कीमतों का क्या होगा. तो, कहीं न कहीं पूरे विश्व में इस युद्ध को लेकर अस्थिरता और असमंजस की स्थिति बनी हुई थी. युद्ध विराम से इन सब पर विराम लगेगा. ईरान और इस्राइल के बीच जो गंभीर तनातनी चल रही थी, दो बार तो युद्ध की स्थिति बन भी गयी थी, उसे लेकर पूरे पश्चिम एशिया के भीतर बड़ी चिंताएं थीं. वह सब चिंताएं समाप्त हो जायेंगी और पूरा विश्व इससे राहत की सांस लेगा. (बातचीत पर आधारित)
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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डॉ धनंजय त्रिपाठी

लेखक के बारे में

By डॉ धनंजय त्रिपाठी

डॉ धनंजय त्रिपाठी is a contributor at Prabhat Khabar.

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