India Germany Relations: इस वर्ष भारत यूरोपीय संघ के देशों के साथ अपने संबंधों को अधिक मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. इसी क्रम में जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज दो दिवसीय भारत यात्रा पर आये. इसके बाद फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को भारत आना है. फिर पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क भारत यात्रा पर आयेंगे और उसके बाद यूरोपीय संघ के नेताओं के साथ भारत की बैठक होने वाली है. विदित हो कि इस वर्ष 26 जनवरी के मुख्य अतिथि के तौर पर यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा भी भारत आने वाले हैं. ऐसे में मेरी समझ यही कहती है कि यह महीना यूरोप के साथ भारत के रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने और हमारी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की दृष्टि से बहुत अच्छा और महत्वपूर्ण कदम है.
अब वापस लौटते हैं फ्रेडरिक मर्ज की भारत यात्रा पर. जर्मनी टेक्नोलॉजी समेत कई क्षेत्रों में एक मजबूत शक्ति और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. भारत की हमेशा से ही कोशिश रही है कि जर्मनी के साथ उसके रिश्ते आगे बढ़ें. इस मामले में जर्मनी की तरफ से ही थोड़ी कमी रहती थी, क्योंकि उनके यहां कुछ ऐसे नियम-कानून हैं कि वे अपनी तकनीक दूसरे देशों को आसानी से देते नहीं हैं. जर्मनी अन्य देशों के साथ अपने रिश्ते प्रगाढ़ करने के लिए भी थोड़ा समय लेता है. एक बात यह भी है कि चूंकि भारत के लोगों के लिए अंग्रेजी में संचार करना सुविधाजनक होता है, इसलिए जर्मनी की बनिस्पत वे अमेरिका और ब्रिटेन अधिक जाना पसंद करते हैं. तथ्य यह है कि आज से 25 वर्ष पहले जर्मनी और भारत ने रणनीतिक साझेदारी बनायी थी. उसके बाद भारत ने यूरोपीय संघ के साथ भी अपने रिश्ते को रणनीतिक साझेदारी के तौर पर अपग्रेड किया, जिसमें जर्मनी के साथ हुई साझेदारी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था. मैं समझता हूं कि पिछले साल जर्मनी के संग रणनीतिक संबंध के 25 वर्ष पूरे होने के बाद अब एक ऐसा समय आया है, जब यूरोपीय देशों, विशेषकर जर्मनी के साथ कई क्षेत्रों में भारत की साझेदारी आगे बढ़ सकती है.
पहला यह कि तकनीक के क्षेत्र में सह-उत्पादन और सह-विकास (को-प्रोडक्शन और को-डेवेलपमेंट) को लेकर साझेदारी बढ़ सकती है. दूसरा, कौशल विकास का क्षेत्र है. इसमें भी भारत-जर्मनी के बीच आपसी सहयोग बढ़ सकता है. इसके तहत हमारे जो युवा हैं, उन्हें जर्मनी जाने के अच्छे मौके मिलेंगे, और जर्मनी यदि अपने विश्वविद्यालयों के कैंपस या उनकी शाखाएं भारत के साथ साझेदारी में यहां खोलता है, तो हमारे विद्यार्थियों को स्किल डेवेलपमेंट (कौशल विकास) का अच्छा अवसर मिलेगा. इतना ही नहीं, नवाचार और आविष्कार (इनोवेशन और इन्वेंशन) को लेकर जो जर्मन तरीके हैं, उसे भी भारतीय छात्र सीखकर काफी अच्छा कर सकते हैं. जर्मनी के इन्क्यूबेशन सेंटर बहुत मजबूत होते हैं. ऐसे में, उनके विश्वविद्यालय के कैंपस/ शाखाएं यहां खुलने पर उनका लाभ भारतीय विद्यार्थियों को अवश्य मिलेगा. इसकी वजह यह है कि हमारे यहां पहले से ही कौशल विकास के क्षेत्र में तेज प्रगति हो रही है.
इसके अतिरिक्त, भारत और जर्मनी के बीच क्रिटिकल मिनरल्स व सेमीकंडक्टर को लेकर समझौता हुआ है. रक्षा सहयोग पर संयुक्त घोषणापत्र जारी किया गया है. इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ओर फ्रेडरिक मर्ज के बीच आतंकवाद से मिलकर लड़ने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधार को लेकर भी चर्चा हुई है. इन सभी क्षेत्रों में भारत और जर्मनी के बीच सहयोग बहुत अच्छी तरह बढ़ सकता है. सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर दोनों देशों के बीच जो चर्चा हुई है, वह अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि जी-4 समूह (जर्मनी, भारत, ब्राजील, जापान) में शामिल देश मिलकर यह कोशिश कर रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधार हो और आजकल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो चुनौतियां दिखाई दे रही हैं, उसमें संयुक्त राष्ट्र अच्छी भूमिका निभा सके. इसके अतिरिक्त, यदि रक्षा उद्योग, विशेषकर सबमरीन के क्षेत्र में जर्मनी के साथ सह-उत्पादन और सह-विकास (को-प्रोडक्शन और को-डेवेलपमेंट) की बात बन जाती है, तो भारत के रक्षा क्षेत्र के लोकल टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन को काफी लाभ मिलेगा, क्योंकि ऐसा सुनने में आया है कि भारत में रक्षा उद्योग में स्थानीय स्तर पर 60 प्रतिशत तक उत्पादन हो सकता है. ऐसे में रक्षा उत्पादन से संबंधित जो भी भारतीय संस्थाएं हैं, उनमें नवाचार और काम की क्षमता बढ़ाने में काफी मदद मिलेगी.
बीते वर्ष जर्मनी के साथ रणनीतिक संबंधों के 25 साल पूरे होने के बाद इस वर्ष हमारे राजनयिक संबंधों के भी 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं. जाहिर है कि इतने समय में हमारे संबंध परिपक्व हो चुके हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस समय जिस तरह की द्वंद्व की स्थितियां निर्मित हो चुकी हैं, उसमें मालूम नहीं चल रहा है कि दुनिया किस ओर जा रही है, और दीर्घावधि में किस तरह की परिस्थितियों का निर्माण होगा. खासकर इन दिनों ट्रंप प्रशासन का जिस तरीके का रवैया है और वह जिस तरह अमेरिकी हितों की रक्षा को प्राथमिकता दे रहा है, उसे देखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दुविधा की स्थिति बनी हुई है. ऐसे में बहुत आवश्यक है कि यूरोप के देश और भारत मिलकर ऐसे कदम उठायें कि बेहतर क्षमताओं का निर्माण हो. उपरोक्त कारणों के आलोक में देखें, तो जर्मन चांसलर की भारत यात्रा अत्यंत महत्वपूर्ण है. चुनौती भरे वैश्विक परिदृश्य में हमें अपने हितों की रक्षा करनी है और उस दिशा में कदम भी उठाये जा रहे हैं.
हम जो भी चीजें आयात करते हैं, उसमें जहां से हमें चीजों की निश्चित आपूर्ति मिल सकती है, अच्छे दामों पर मिल सकती है, हम उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. जहां से तकनीक का हस्तांतरण हो सकता है, जहां से तकनीकों का अपग्रेडेशन हो सकता है, हम उन देशों को प्राथमिकता दे रहे हैं. इसके साथ ही हमारे पड़ोस में जो हमारे प्रतिद्वंद्वी हैं, उन्हें हम किस तरह संभाल कर रख सकते हैं, यह भी हमारी प्राथमिकता सूची का हिस्सा है. ऐसे में हमारे हितों की रक्षा यदि जर्मनी के साथ संबंधों को बेहतर बनाकर की जा सकती है, या यूरोप के अन्य देशों के साथ जुड़कर की जा सकती है, तो हमें उन सभी के साथ मिलकर आगे बढ़ना चाहिए. साथ ही, हम ग्लोबल साउथ की जो बात करते रहे हैं, एशिया के देशों के साथ सभ्यतागत मूल्यों की जो बात करते रहे हैं, उन्हें आगे ले जाने का भी हमें ध्यान रखना होगा. (बातचीत पर आधारित) (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

