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वैक्सीन को राजनीति से रखें दूर

By नवीन जोशी
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नवीन जोश

वरिष्ठ पत्रकार

naveengjoshi@gmail.com

कोरोना वैक्सीन को अनुमति देने पर उचित प्रश्न अपनी जगह रहेंगे और सही जगह उन पर पड़ताल होती रहेगी, लेकिन विपक्ष को पहले अपनी विश्वसनीयता और जनाधार पर लगे प्रश्नों का उत्तर तलाशना होगा. हामारियां, वैज्ञानिक अनुसंधान, चिकित्सा शोध, देश की सुरक्षा और सेनाएं अनर्गल तथा दलगत राजनीतिक बयानबाजी का मुद्दा नहीं बनते थे.

ऐसे संवेदनशील विषयों पर सभी राजनीतिक दल एक स्वर में बोलते या फिर मौन रहा करते थे. इक्कीसवीं शताब्दी मर्यादाओं के ध्वस्त होने की भी सदी बन रही है. पिछले कुछ वर्षों में हमने सैन्य बलों और उनकी कार्रवाइयों तक को वोट की राजनीति के पंक में घसीटे जाते देखा. सत्तारूढ़ दल को घेरने और विपक्ष की छवि ध्वस्त करने के लिए वोट की यह राजनीति अब कोविड-19 महामारी से बचाव के लिए बने टीकों तक चली आयी है.

दो दिन पहले जब भारत के औषधि नियामक (केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन या सीडीएससीओ) ने ‘कोविशील्ड’ और ‘कोवैक्सिन’ नाम के दो टीकों (वैक्सीन) के सीमित एवं आपातकालीन प्रयोग की अनुमति दी, तो कतिपय जिम्मेदार नेताओं के मुखारविंद से सर्वथा मर्यादाविहीन बोल फूटे. सबसे गैर-जिम्मेदाराना बयान उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दिया.

उन्होंने इसे ‘भाजपाई टीका’ बताते हुए इसे लगवाने से मना कर दिया. अखिलेश युवा हैं, उनके पास ऑस्ट्रेलिया के एक विश्वविद्यालय से पर्यावरण विज्ञान की डिग्री है. सारी दुनिया को हलकान किये हुए एक वायरस से बचाव के लिए वैज्ञानिकों के अथक प्रयास से बने टीकों के बारे में उनसे ऐसे बयान की उम्मीद कोई नहीं करता, भले ही वह धुर-भाजपा-विरोधी राजनीति के राही हों.

कुछ बयान कांग्रेसी दिग्गजों की ओर से आये, यद्यपि उन्होंने तकनीकी सवालों की आड़ देने की सतर्कता बरती. शशि थरूर और जयराम रमेश ने सवाल उठाया कि जब टीके की प्रभावशीलता के बारे में सुस्पष्ट आंकड़े और जानकारियां नहीं हैं, तो अनुमति देने में आतुरता क्यों दिखायी गयी. आनंद शर्मा ने भी सवाल उठाये, जो कि इस मामले में गृह मंत्रालय की उस संसदीय समिति के अध्यक्ष भी हैं, जिसने टीके की अनुमति देने के विविध पक्षों पर विचार किया.

आनंद शर्मा ने पूछा कि तीसरे चरण के जारी परीक्षणों के परिणाम और उनके विश्लेषण की अनिवार्यता को क्यों अनदेखा किया जा रहा है. सरकार की ओर से बड़े नेताओं ने भी इन विपक्षी नेताओं को आड़े हाथों लेने का अवसर भुनाया.

यह सत्य है कि कोविड-19 के जो भी टीके भारत समेत अन्य देशों में बने हैं, उनका तीसरा और पूर्ण परीक्षण अभी नहीं हुआ है. अमेरिका और यूरोप में भी आपातकालीन अनुमति के तहत ही ये टीके लगाये जा रहे हैं. किसी भी टीके को अंतिम रूप से अनुमति उसके शत-प्रतिशत सुरक्षित प्रमाणित होने पर ही दी जाती है. टीका बनने के बाद उसके अंतिम रूप से ‘सफल एवं सुरक्षित’ घोषित होने में कई साल लग जाते हैं.

आज तक सबसे जल्दी जिस टीके को अंतिम अनुमति मिली, वह गलसुआ (मम्प्स) का टीका है. इसे बना लेने के साढ़े चार साल बाद पूर्ण रूप से सुरक्षित घोषित किया गया था. कोविड-19 से पूरी दुनिया त्रस्त है. सन 2021 की अगवानी करता विश्व इस आशा से बहुत राहत अनुभव कर रहा है. इसके पीछे सदियों की वैज्ञानिक तरक्की और चिकित्सा विज्ञानियों की अथक मेहनत है.

निश्चय ही इसमें दवा कंपनियों की प्रतिस्पर्धा और भारी मुनाफे का गणित भी शामिल होगा, लेकिन यह भी सत्य है कि कोविड-19 से बचाव का टीका साल भर में बना लेना चिकित्सा विज्ञान की ऐतिहासिक छलांग है. हालांकि, इन टीकों को लेकर अभी चिंताएं, आशंकाएं और प्रश्न भी हैं. अंतिम शोध-परीक्षणों के आंकड़ों से पुष्ट, प्रभावी एवं पूर्ण सुरक्षित टीकों के बारे में बहुत से सवाल अनुत्तरित हैं. ये सवाल पूरी दुनिया में उठ रहे हैं और उठने भी चाहिए.

स्वयं विज्ञानी और कंपनियां इन प्रश्नों से इनकार नहीं कर रहीं. यह विषय और क्षेत्र भी उन्हीं का है. ध्यान रहे कि आम जन का टीकाकरण शुरू नहीं हो रहा, अनुमति मात्र ‘सीमित एवं आपातकालीन’ है.

इसका आशय यह नहीं कि राजनीतिक दलों को टीकों या वैज्ञानिक शोधों के बारे में सवाल पूछने का अधिकार नहीं है. सरकार के निर्णयों पर विपक्ष प्रश्न नहीं पूछेगा तो करेगा क्या? यह उसकी राजनीति और उत्तरदायित्व के लिए आवश्यक है कि वह सही अवसर पर सही सवाल उठाये और सरकार से जवाब मांगे, लेकिन इसे क्या कहेंगे कि उसके प्रश्न सरकार की बजाय स्वयं उसकी विश्वसनीयता को हास्यास्पद बना दें, अप्रासंगिक प्रश्नों से विज्ञानी और कंपनियां हतोत्साहित हों और जनता अनावश्यक रूप से भ्रमित हो?

हमारे देश में आज भी एक वर्ग ऐसा है, जो रोग निरोधक टीकों को संदेह और साजिश के रूप में देखता है. अब भी कुछ टीकों को नपुंसकता बढ़ानेवाला माना जाता है. राजनीतिक नेताओं के अनुत्तरदायित्वपूर्ण बयान ऐसे वर्गों का संदेह बढ़ाते हैं. नेशनल कांफ्रेंस के नेता और अखिलेश यादव के हमउम्र उमर अब्दुल्ला ने ठीक ही टिप्पणी की है कि टीका किसी राजनीतिक दल का नहीं होता. मैं तो उसे लगवाऊंगा. तब अखिलेश को भी सफाई पेश करनी पड़ी.

विपक्ष की समस्या यह है कि वह भाजपा के विरुद्ध कोई ठोस और प्रभावी मुद्दा खड़ा नहीं कर पा रहा. वर्ष 2014 के देशव्यापी उभार के बाद भाजपा लगातार मजबूत होती गयी है. साल 2019 की बड़ी विजय के बाद उसने जिस तरह कश्मीर से अनुछेद-370 को निष्प्रभावी करके उसका विभाजन किया और नागरिकता संशोधन कानून लेकर आयी, उससे मोदी सरकार की मजबूती और विपक्ष की निरुपायता साबित हुई.

मोदी सरकार को घेरने के लिए वह विश्वसनीय जनमत नहीं बना पा रहा है, यद्यपि देश में जनहित के मुद्दों की कमी नहीं है. आर्थिक मोर्चे की असफलताएं, भारी बेरोजगारी, महंगाई, किसानों का भारी असंतोष, महामारी संबंधी कतिपय निर्णयों की मार, चिकित्सा तंत्र की खस्ताहाली आदि के बावजूद विपक्ष मोदी सरकार के विरुद्ध प्रभावी मोर्चाबंदी कर पाने में सफल नहीं हो रहा है.

इस निरुपायता में कई बार वह संवेदनशील विषयों पर गैर-जिम्मेदाराना बयान दे देता है. इससे स्वयं वह जनता की दृष्टि में विश्वसनीयता खोकर अपना संकट और बढ़ा लेता है. कोरोना वैक्सीन को अनुमति देने पर उचित प्रश्न अपनी जगह रहेंगे और सही जगह उन पर पड़ताल होती रहेगी, लेकिन विपक्ष को पहले अपनी विश्वसनीयता और जनाधार पर लगे प्रश्नों का उत्तर तलाशना होगा.

Posted By : Sameer Oraon

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