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वैक्सीन के मोर्चे पर मुश्किलें

By जगदीश रत्नानी
Updated Date
वैक्सीन के मोर्चे पर मुश्किलें
वैक्सीन के मोर्चे पर मुश्किलें
File Photo

डॉ टी जैकब जॉन

पूर्व प्रोफेसर,

क्लिनिकल वायरोलॉजी

भारत दुनिया का टीकों का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है. पुणे का सीरम इंस्टीट्यूट दुनिया का सबसे बड़ा टीका उत्पादक है. ऐसे में हमें टीकों की समस्या नहीं होनी चाहिए थी. टीकों की कमी की वज़ह से लोगों को बहुत इंतजार करना पड़ रहा है. यह सब दूसरी लहर के बीच हो रहा है, जो रोजाना चार लाख से अधिक लोगों को संक्रमित कर रही है और साढ़े तीन हजार से अधिक मौतें हो रही हैं.

यह भी सरकारी आंकड़ा है. हम दुनिया से मदद मांगने के लिए मजबूर हो गये हैं. दूसरी लहर की त्रासदी के लिए जिम्मेदार अपनी भूलों को दरकिनार भी कर दें, तो वैक्सीन के मामले में गलतियां चूकों का नया सिलसिला हैं. योजना बनाने, दाम तय करने और अभियान चलाने में ऐसी लापरवाह और आपराधिक भूलें हुई हैं कि भारत के आम लोगों को खर्च के मामले में और मौतों के रूप में इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी.

दुनिया की बड़ी दवा कंपनियों को अब यह इशारा भी मिलेगा कि भयावह त्रासदी के बीच भी भारत पैसा बनाने की जगह बन गया है. अब दुनिया तो उस देश से कुछ कमाने की जुगत ही करेगी, जिसका दवाओं और टीकों की कीमतें नियंत्रित रखने का लंबा व शानदार इतिहास रहा है.

लगभग चार साल पहले ही भारत सरकार ने निर्माताओं और कारोबारी लॉबी के दबाव के बावजूद स्टेंट के दाम को नियंत्रित किया था, जिन्हें देश में भारी कीमत पर बेचा जाता था. कुछ मामलों में तो कीमतों में 80 फीसदी तक कमी की गयी थी, ताकि आबादी के बड़े हिस्से को राहत मिल सके. कारोबारी धमकी दे रहे थे कि वे आपूर्ति बंद कर देंगे और मरीजों को नुकसान होगा, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

निजी क्षेत्रों ने कमाई में कमी को पूरा करने के लिए जरूर अपने खर्च बढ़ा दिये, पर यह एक और उदाहरण है कि स्वास्थ्य सेवा में निजी क्षेत्र कैसे देश का दोहन कर रहा है. तब फिर सरकार ने कोविशील्ड (आस्त्राजेनेका-ऑक्सफोर्ड वैक्सीन) बनानेवाली कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट को ऐसे संकट के बीच बड़ी कमाई करने का मौका क्यों दे दिया? इस समझौते के पीछे क्या रहस्य है, जिससे 60 हजार करोड़ की कमाई होगी, यदि हम केवल निजी क्षेत्र में 600 रुपये प्रति खुराक की दर से केवल 50 करोड़ लोगों के टीकाकरण का हिसाब जोड़ें?

क्या यह भारी मुनाफा बनाने का मामला नहीं है, जब कंपनी से खुद माना है कि 150 रुपये की दर से केंद्र सरकार को वैक्सीन देने पर भी वह पैसा बना रही है. फिर चारों तरफ हो रही मौतों के बीच उसने चौगुना दाम क्यों तय किया है? ऐसे सवाल कोवैक्सीन बनानेवाली अन्य वैक्सीन कंपनी भारत बायोटेक से भी पूछा जाना चाहिए.

टीका लगाने के मामले में केंद्र सरकार और राज्य सरकार में क्या अंतर है कि एक को दूसरे से कहीं अधिक दाम देना पड़ रहा है. आलोचनाओं के बाद कथित दयाभाव से दाम में कुछ कमी करना क्या यह स्वीकार करना नहीं है कि उत्पादकों को कमाई की ऐसी छूट दी गयी कि वे दयाभाव के नाम पर जीवन बचाने का दावा कर रहे हैं? निजी क्षेत्र की कंपनियां होने के नाते सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक को अपना मुनाफा कमाने का हक है.

ये कोविड से लड़ाई में भी आगे रही हैं. महामारी से बचाव की कोशिश यह मांग करती है कि सभी को निशुल्क टीका दिया जाए. पहले से संख्या की जानकारी होने से टीकों का अग्रिम ऑर्डर दिया जा सकता था. लेकिन सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया. शुरुआती दिनों में इसने उत्पादन बढ़ाने के लिए कंपनियों को कुछ सहयोग नहीं दिया. अब इसने अलग-अलग दाम की वजह से सार्वजनिक व निजी क्षेत्र में असंतुलन की स्थिति पैदा कर दी है. इस हालत में मुफ्त टीका दे रहे केंद्र जल्दी ही बंद हो सकते हैं.

सामान्य स्थितियों में केंद्र सरकार को राज्यों को अपने से अधिक भुगतान न करने की सलाह देनी चाहिए और नीतिगत स्तर पर उत्पादकों से केंद्र व राज्य के बड़ी संयुक्त खरीद के लिए मोलभाव करना चाहिए. क्या यह राज्यों के लिए संभव है कि वे केंद्र द्वारा निर्धारित दामों पर बड़ी खरीद कर सकें, वह भी एक आपात स्थिति में?

संकट के बीच अदार पूनावाला (सीरम इंस्टीट्यूट) के लंदन जाने और वहां मीडिया में बयान देने के मामले में संभवत: ऐसा बहुत कुछ है, जिसे हम नहीं जानते या पूनावाला अभी बताना नहीं चाहते. यह एक संकेत है कि वैक्सीन का मसला किस हद तक उलझा दिया गया है. इसमें परदे के पीछे के मोलभाव का इशारा है, दंभ, लापरवाही और दिखावे की ओर इशारा है, जो महामारी में सरकार के रवैये का हिस्सा हैं.

ध्यान दें, 19 अप्रैल को प्रधानमंत्री ने एक मई से टीकाकरण अभियान के तीसरे चरण की शुरुआत की घोषणा की थी. दो दिन बाद सीरम इंस्टीट्यूट ने राज्यों और निजी क्षेत्र के लिए अलग-अलग कीमतें घोषित कर दी, जबकि केंद्र के लिए मूल्य पर कोई बात नहीं हुई. भारत बायोटेक के प्रमुख डॉ कृष्णा एम इल्ला ने 22 अप्रैल को कह दिया कि वे अपने खर्च की भरपाई के लिए अधिकतम दाम रख सकते हैं.

पूनावाला शानो-शौकत से रहनेवाले और डॉ इल्ला सादगीपसंद व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं. दोनों ही अब इस त्रासदी के बीच में अधिकाधिक मुनाफा कमाने की बात करने लगे हीं, जब देशभर के श्मशान गृहों में लाशों का अंबार लगा है. यह सीरम इंस्टीट्यूट के संस्थापक डॉ साइरस पूनावाला की सोच से बिल्कुल अलग है, जो अक्सर मुनाफे को दरकिनार कर सस्ते टीके मुहैया कराने पर ज्यादा जोर देते रहते हैं.

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कीमत तय करने का यह खेल ऐसे वैक्सीन के लिए हो रहा है, जिसे अभी तक लाइसेंस भी नहीं मिला है और इनके इस्तेमाल की अनुमति केवल आपात स्थिति तक सीमित है. ऐसे में तकनीकी रूप से इन टीकों की बिक्री नहीं की जा सकती है.

इन सवालों के जवाब के लिए उत्पादकों की ओर देखना निरर्थक होगा, जब सरकार ही खेलों और छवियों में उलझी हुई है, तथ्यों और समाधान में नहीं. दोनों वैक्सीन उत्पादक ऐसी स्थिति में अपना कद ऊंचा कर सकते थे और वैक्सीन मुहैया कराकर मुनाफा भी कमा सकते थे. यदि वे साथ नहीं देते, तो सरकार के लिए अनिवार्य लाइसेंसिंग का तार्किक और वैधानिक रास्ता था. हम कह सकते थे कि जब समय आया, तो हमने उसके अनुरूप काम किया, पर, अफसोस, ऐसा न हो सका.

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