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ट्रंप के रवैये से रूस, चीन का हौसला बढ़ेगा, पढ़ें राजन कुमार का आलेख

Trump: इक्कीसवीं सदी में ट्रंप प्रशासन बढ़ते चीनी और रूसी प्रभाव को रोकना चाहता है. पूरे पश्चिमी गोलार्ध को, जो उत्तर में कनाडा और ग्रीनलैंड से लेकर मध्य में कैरेबियन सागर और सुदूर दक्षिण में अर्जेंटीना तक फैला है, ट्रंप प्रशासन अपने लिए आसान मानता है, लेकिन वेनेजुएला में ट्रंप की कार्रवाई से पुतिन और जिनपिंग का हौसला ही बढ़ेगा. यदि सबसे शक्तिशाली देश 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' की नीति अपनाता है, तो क्षेत्रीय क्षत्रपों को ऐसा करने से भला कौन रोक सकता है?

Trump: अमेरिकी शक्ति का दुरुपयोग करते हुए ट्रंप प्रशासन द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ कर अमेरिका लाने और उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है. इसने वैश्विक नेताओं के बीच भय, पीड़ा और बेबसी की भावना पैदा कर दी है. नैतिकता की सभी सीमाओं को पार करते हुए ट्रंप ने घोषणा की कि वेनेजुएला में भारी मात्रा में तेल और दुर्लभ खनिज मौजूद हैं, और वह उन संसाधनों का दोहन करने के लिए अमेरिकी कंपनियों को भेजेंगे. यदि ट्रंप को नहीं रोका गया, तो वेनेजुएला उनकी साम्राज्यवादी योजनाओं का पहला कदम साबित हो सकता है. ट्रंप ने बार-बार डेनमार्क से ग्रीनलैंड छीनने की इच्छा जाहिर की है. उनकी टीम ने, जिसमें विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ शामिल हैं, बार-बार कहा है कि मादुरो की गिरफ्तारी से क्यूबा में सत्ता का पतन आसान हो जायेगा. क्यूबा, मेक्सिको और कोलंबिया भी जबरदस्ती की कार्रवाई के अगले शिकार हो सकते हैं. ट्रंप के पास गाजा के लिए भी योजनाएं हैं. ये खतरे वास्तविक हैं और इन्हें ‘पागल के सपने’ कहकर खारिज करना घातक साबित हो सकता है.

ट्रंप एक साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा वाले व्यक्ति हैं. वह रूढ़िवादी विचारधारा वाले ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ आंदोलन का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो अमेरिका के वैश्विक प्रभाव में तेजी से हो रही गिरावट से नाराज है और उसके पुराने गौरव को पुनः स्थापित करना चाहता है. यह एक ऐसे राष्ट्रवाद का प्रचार करता है, जो नस्लवाद, सैन्य दुस्साहस और क्षेत्रीय विस्तारवाद को बढ़ावा देने में संकोच नहीं करता. ट्रंप के लिए कानून, नियम और नैतिकता कोई मायने नहीं रखते. आखिरकार, ट्रंप की रणनीति क्या है और वह क्या हासिल करना चाहते हैं? ट्रंप का मानना है कि अमेरिका का वाणिज्यिक और भू-राजनीतिक प्रभाव तेजी से घट रहा है. उनके मुताबिक, उदार व्यापार व्यवस्था से चीन को फायदा हुआ है और अमेरिका खोखला हो गया है.

ट्रंप 19वीं सदी के अमेरिका से प्रभावित प्रतीत होते हैं. मादुरो की गिरफ्तारी के तुरंत बाद मार-ए-लागो में दिये गये भाषण में उन्होंने अपनी नीति को 1823 के मोनरो सिद्धांत के पुनरुद्धार के रूप में प्रस्तुत किया. उस सिद्धांत का उद्देश्य लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों में यूरोपीय हस्तक्षेप को रोककर पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी वर्चस्व स्थापित करना था. इक्कीसवीं सदी में ट्रंप प्रशासन यूरोपीय प्रभाव को नहीं, बल्कि बढ़ते चीनी और रूसी प्रभाव को रोकना चाहता है. पूरे पश्चिमी गोलार्ध को, जो उत्तर में कनाडा और ग्रीनलैंड से लेकर मध्य में कैरेबियन सागर और सुदूर दक्षिण में अर्जेंटीना तक फैला है, ट्रंप प्रशासन अपने लिए आसान मानता है.

हमारे सामने इस विषय से संबंधित तीन महत्वपूर्ण प्रश्न हैं : क्या ट्रंप अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं में सफल होंगे? चीन इस तरह के हथकंडों पर क्या प्रतिक्रिया देगा? और भारत के लिए क्या जटिलताएं होंगी? वाशिंगटन ने भले ही मादुरो को सत्ता से बेदखल कर दिया हो, पर वेनेजुएला पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना अब भी एक दूर का सपना है. ट्रंप की एकमात्र रुचि वेनेजुएला के संसाधनों पर कब्जे की है, न कि राजनीतिक स्थिरता या लोकतंत्र की स्थापना में. ट्रंप की यह योजना पूरे क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता को बढ़ावा दे सकती है. ब्राजील को छोड़कर लैटिन अमेरिका और कैरेबियन के अधिकांश देश छोटे हैं और अमेरिकी शक्ति के सामने कमजोर हैं. पर अतीत में अमेरिका द्वारा कई सरकारों को गिराने के प्रयासों के कारण इस क्षेत्र में अमेरिका विरोधी भावना बहुत प्रबल है. ट्रंप का वेनेजुएला अभियान पनामा में चलाये गये एक अभियान के समान था, जहां 36 वर्ष पहले मैनुअल नोरीगा को अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा था. उससे पहले 1954 में ग्वाटेमाला के निर्वाचित राष्ट्रपति जैकोबो अर्बेंज गुजमैन को अमेरिकी समर्थित स्थानीय लड़ाकों ने सत्ता से हटा दिया था.

वर्ष 1961 में राष्ट्रपति कैनेडी ने क्यूबा में फिदेल कास्त्रो को उखाड़ फेंकने के लिए बे ऑफ पिग्स आक्रमण की योजना बनायी थी. हालांकि, वह आक्रमण विफल रहा था. ब्राजील में, अमेरिकी सीआइए ने 1964 में एक सैन्य तख्तापलट का समर्थन किया और 1985 तक अमेरिका समर्थक तानाशाही कायम रही. वर्ष 1973 में अमेरिका ने लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित चिली के राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंदे को सत्ता से हटा दिया था. उनके उत्तराधिकारी, जनरल ऑगस्टो पिनोशे ने एक दमनकारी दक्षिणपंथी शासन का नेतृत्व किया. संक्षेप में, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन में अमेरिकी राजनीतिक व सैन्य हस्तक्षेपों का लंबा इतिहास रहा है, हालांकि इसकी सफलता दर बहुत कम है. ट्रंप के हस्तक्षेप कुछ हद तक इराक, लीबिया, सीरिया, अफगानिस्तान और गाजा जैसी स्थितियों के समान हो सकते हैं, जिनसे राजनीतिक व सामाजिक अराजकता पैदा हुई. ट्रंप द्वारा मादुरो को सत्ता से हटाने को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन नहीं मिल रहा. इटली और कुछ अन्य कठपुतली देशों को छोड़ किसी बड़े देश ने इसका समर्थन नहीं किया है. यहां तक कि नाटो देश भी ट्रंप के कदम से नाराज और चिंतित हैं.

वेनेजुएला में ट्रंप की कार्रवाई से पुतिन और जिनपिंग का हौसला बढ़ेगा. यदि सबसे शक्तिशाली देश ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की नीति अपनाता है, तो क्षेत्रीय क्षत्रपों को ऐसा करने से कौन रोक सकता है? वास्तव में, दुनिया अति राष्ट्रवाद, क्षेत्रीय विस्तारवाद और गिरोह पूंजीवाद से ग्रस्त एक खतरनाक दौर में प्रवेश कर रही है. वैश्विक स्तर पर अपनी प्रभुत्वशाली स्थिति बनाये रखने में असमर्थ अमेरिका एक क्षेत्रीय शक्ति की तरह व्यवहार कर रहा है, जहां वह क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता तो जता रहा है, पर वैश्विक स्तर पर अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट रहा है. इन परिस्थितियों में भारत को किस प्रकार की नीति अपनानी चाहिए? नयी दिल्ली का रवैया बहुत कूटनीतिक और सतर्क है.

टैरिफ पर चल रही व्यापार वार्ता को देखते हुए वह ट्रंप प्रशासन को नाराज नहीं करना चाहती. इसलिए, यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस की निंदा न करने की तरह भारत अमेरिका की निंदा नहीं करेगा. भारत के लिए वेनेजुएला बहुत दूर का देश है और अमेरिका से टकराव मोल लेना यथोचित नहीं है. हालांकि, उसे यह समझना होगा कि यदि वह संकट के समय वैश्विक दक्षिण के देशों का साथ नहीं देता है, तो वे चीन की ओर रुख करेंगे. यह वैश्विक दक्षिण में नेतृत्व की उसकी महत्वाकांक्षा के लिए अच्छा नहीं है. ट्रंप किसी के हितैषी नहीं हैं और जरूरत पड़ने पर भारत का इस्तेमाल करेंगे, और जब कोई लाभ नहीं होगा, तो दरकिनार कर देंगे. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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