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हिंसा का शिकार होते बच्चे

Updated at : 02 Jan 2025 9:05 AM (IST)
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children victims of violence

हिंसा की गिरफ्त में बचपन

children victims of violence :चिल्ड्रन इन आर्म्ड कनफ्लिक्ट की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के प्रति हिंसा में 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है जिसमें कांगो, बुर्किना फासो, सोमालिया और सीरिया की घटनाएं प्रमुख रहीं.

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-संजीव राय, शिक्षाविद-
Children Victims Of Violence : आपको सीरिया के तीन वर्षीय एलन कुर्दी की याद होगी जिसकी लाश तुर्की में समुद्र किनारे मिली थी. वर्ष 2015 में उसकी तस्वीर सोशल मीडिया के जरिये पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गयी थी. इसी तरह 2022 में छह वर्षीय मुस्तफा की मुस्कुराती फोटो चर्चा में आयी थी, जिसके दोनों पैर नहीं हैं और उसके पिता बैसाखी के सहारे खड़े होकर उसे दोनों हाथों से उठाये हुए हैं. बच्चे के पिता मुनजिर का एक पैर बम धमाके में उड़ गया था और सीरिया में जहरीली गैस के हमले से उसकी गर्भवती मां बीमार हो गयी. जन्म से ही मुस्तफा के दोनों पैर नहीं थे. एलन कुर्दी और मुस्तफा जैसी घटनाओं के चर्चा में आने के बाद क्या दुनिया में बच्चों के प्रति नजरिया बदल गया है? क्या बच्चों के प्रति हिंसा और बर्बरता में कमी आयी है?


चिल्ड्रन इन आर्म्ड कनफ्लिक्ट की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के प्रति हिंसा में 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है जिसमें कांगो, बुर्किना फासो, सोमालिया और सीरिया की घटनाएं प्रमुख रहीं. हमास और इस्राइल के बीच रॉकेट हमलों और बमबारी में बच्चों को अपनी जान और अपने हाथ-पैर गंवाने पड़े हैं. दुनिया में सत्तर से अधिक देशों में सशस्त्र युद्ध अथवा सशस्त्र गुटों और सेना के बीच आंतरिक संघर्ष के हालात हैं. बच्चे युद्ध की शुरुआत भले न करते हों, पर युद्ध की मार उनके ऊपर सबसे पहले पड़ती है.

रॉकेट हमले और बमबारी से जमींदोज हुई इमारत के सामने खेलते हुए बच्चों की यादाश्त में कितनी पीड़ा होगी, यह कौन समझता है? विज्ञान और तकनीकी के दम पर विकसित होती दुनिया का यह भी कड़वा सच है कि युद्ध में अब सेना केवल सीमा पर नहीं लड़ती है. आम लोग, अस्पताल, स्कूल-कॉलेज सभी तोप और बंदूक के निशाने पर आ गये हैं. हथियारों की तकनीकी में आये बदलाव से न केवल स्वचालित हथियारों का उत्पादन और प्रयोग बढ़ा है, बल्कि ड्रोन, मिसाइल, एयर स्ट्राइक और मैग्नेट बम के हमलों से अब स्कूल और अस्पताल भी अछूते नहीं रह गये हैं. यूक्रेन से लेकर सीरिया तक में हवाई हमलों के चलते अस्पताल और स्कूल क्षतिग्रस्त हुए हैं. स्कूल और अस्पताल, जिन पर कभी मानवीय आधार पर हमले नहीं किये जाते थे, क्या अब वह मानवीय आधार समाप्त हो गये हैं? हथियारों की तकनीकी क्या हमें और क्रूर व हिंसक बना रही है?


उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी की भारी बंदूकों और राइफल से आगे बढ़ते हुए, अब हल्की और अधिक प्रभावी बंदूकों-राइफलों ने युद्ध की प्रकृति भी बदली है. क्लाश्निकोव राइफलों के आने से कम उम्र के बच्चों के लिए अत्याधुनिक हथियार चलाना आसान हो गया है और युद्ध में उनकी भूमिका सामान ढोने, खाना बनाने से आगे बढ़ कर हमला करने की हो चली है. जहां सेना और विद्रोही गुटों में लड़ाई चल रही है, वहां भी लैंड माइंस के विस्फोट में निर्दोष बच्चों के मारे जाने की घटनाएं बढ़ रहीं हैं. अनुमान है कि दुनिया के बीस देशों में 2005 से 2022 के बीच एक लाख से अधिक बाल सैनिक सशस्त्र संघर्ष में शामिल थे जिनमे आठ-नौ वर्ष के बच्चे भी भर्ती किये गये थे.

ऐसा अनुमान है कि बाल सैनिकों में लगभग चालीस प्रतिशत लड़कियां होती हैं जिनका शोषण सशस्त्र गुटों द्वारा भी किया जाता है. अनुमान है कि दुनिया में इस समय लगभग 40 करोड़ से अधिक बच्चे उन देशों में हैं जो युद्ध से ग्रसित हैं, अथवा वहां हिंसक संघर्ष की स्थितियां हैं. दुनिया में हर छह में से एक बच्चा हिंसा से प्रभावित देश में है, अथवा हिंसा के कारण विस्थापन का शिकार है. यूक्रेन-रूस युद्ध, गाजा में इस्राइल-हमास युद्ध और सूडान, साउथ सूडान, कांगो, सीरिया, यमन, सोमालिया, माली, हैती जैसे देशों में न केवल हजारों बच्चे मारे जा रहे हैं, बल्कि उनके भविष्य को लेकर भी दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता. उनका बचपन क्रमिक हिंसा,अनिश्चितता और भय के बीच बीत रहा है. युद्ध और युद्ध जनित हिंसा के शिकार बच्चे यदि अपनी जान बचा कर भाग भी जाएं, तो उनके अपने परिजनों से मिलने और फिर घर लौटने की राह आसान नहीं रहती है.


पिछले कुछ वर्षों में अफ्रीका, एशिया और मध्य-पूर्व के देश हिंसा से अधिक प्रभावित रहे हैं. जो देश सीधे युद्धग्रस्त नहीं हैं, वहां भी बच्चों के लिए चिंताएं कम नहीं हैं. अमेरिका की ही बात करें, तो 2024 में 490 अंधाधुंध गोलीबारी की घटनाएं हो चुकी हैं. क्या अमेरिकी स्कूल और समाज इन घटनाओं से कोई सबक सीख रहे हैं? अफगानिस्तान में हिंसा के डर से लड़कियां और लड़के घरों में बंद है. यदि हम भारत के पड़ोस में म्यांमार में देखें, तो वहां की सेना (जुंटा ) और उसके विरोध में लड़ रहे समूहों की लड़ाई में फरवरी 2021 से अभी तक पांच सौ से अधिक बच्चे मारे जा चुके हैं तथा सैकड़ों घायल हुए हैं. बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले और उनके साथ जोर-जबरदस्ती की खबरें आ रही है. लंबी दूरी की मिसाइल और ड्रोन, युद्ध के नये हथियार हैं. इस बीच यह खबर आयी है कि दुनिया में हथियार बनाने वाली प्रमुख सौ कंपनियों के लिए 2023 बहुत मुनाफे का वर्ष रहा है और 2024 ने भी उनके लिए हथियारों की बिक्री में वृद्धि की उम्मीद दिखायी है. वर्ष 2025 में भी हथियारों की बिक्री बढ़ने के आसार हैं.
(ये लेखकद्वय के निजी विचार हैं.)

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डॉ नितिन मदन कुलकर्णी

लेखक के बारे में

By डॉ नितिन मदन कुलकर्णी

डॉ नितिन मदन कुलकर्णी is a contributor at Prabhat Khabar.

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