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नयी मंत्रिपरिषद के समक्ष चुनौतियां

By आलोक मेहता
Updated Date
नयी मंत्रिपरिषद के समक्ष चुनौतियां
नयी मंत्रिपरिषद के समक्ष चुनौतियां
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सत्ता के सात साल बाद सात जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़े झटके के साथ मंत्रिमंडल में क्रांतिकारी बदलाव किये. राजनीतिक, सामाजिक, जातीय व क्षेत्रीय समीकरणों तथा अब तक की कमियों और विफलताओं पर बहुत कुछ बोला, दिखाया व लिखा गया है. कमियों और गड़बड़ियों की चीर-फाड़ की बजाय हमेशा की तरह आगे दिख रही सात पहाड़ों जैसी चुनौतियों की चर्चा करना उचित लगता है. लक्ष्य तय करना, पहाड़ पर झंडे फहराने के संकल्प, खुशियों के फूलों की घाटी बना देने के वादे अथवा घोषणाओं के नगाड़े बजाना आसान है.

मोदी सरकार के 77 पर्वतारोही मंत्रियों के लिए समस्याओं के पहाड़ों के रास्तों पर नुकीले पत्थर, कहीं तूफानी हवा, बर्फीली बारिश और भटकाव के खतरे भी हैं. दुनिया के साथ भारत पर अब भी कोरोना के एक और तूफान की आशंका है. मंत्री बदलने के अगले दिन ही कोरोना संकट से निपटने की आपात व्यवस्था के लिए एक प्रारूप को कैबिनेट ने स्वीकृति दी है. लेकिन महामारी से बचाव की तैयारियों के साथ पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को बड़े पैमाने पर सुधारने की महत्वपूर्ण चुनौती है.

वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बजट का 15-20 प्रतिशत हिस्सा देने के लिए नये संसाधनों एवं व्यापक समर्थन की आवश्यकता होगी. सबसे बड़ी समस्या यह है कि संघीय व्यवस्था के कारण केंद्र सरकार योजना कितनी ही अच्छी बना ले, लेकिन क्रियान्वयन राज्य सरकारें मनमाने ढंग से करती हैं. दवाइयों से लेकर अस्पतालों और मेडिकल कालेजों में घोटाले और भ्रष्टाचार की गंभीर समस्याएं हैं.

अगले दो वर्षों में अपने भारी बहुमत और कुछ अन्य दलों का समर्थन लेकर स्वास्थ्य और शिक्षा की राष्ट्रीय एकरूपता, नीति तथा क्रियान्वयन के लिए मोदी सरकार संसद से आवश्यक कानूनी बदलाव का प्रयास क्यों नहीं कर सकती है? सरकार किसी भी पार्टी की हो, केंद्र और राज्यों की खींचतान के दुष्प्रभाव तो जनता ही झेलती है. मोदी सरकार के सामने दूसरा पहाड़ किसानों के नाम पर चलाये जा रहे आंदोलन को प्रतिपक्ष द्वारा दी जा रही आग पर काबू करने का है.

भले ही यह हिंसक आंदोलन राजधानी से लगे पंजाब, हरियाणा व पश्चिम उत्तर प्रदेश के एक वर्ग और स्वार्थी राजनीतिक तत्वों का हो, इसका धुआं अन्य राज्यों के किसानों और अन्य भले लोगों को विचलित व भ्रमित कर रहा है. अन्य राज्यों के किसान नये कृषि कानूनों से फसल की अधिक कीमत पाने जैसे लाभ अथवा छोटे किसानों को मिलनेवाली सब्सिडी से प्रसन्न हों, तब भी उन्हें अधिक आमदनी व सुविधाओं की अपेक्षाएं तो बनी रहेंगी.

इसलिए कई दशक पुराने प्रस्ताव पर सरकार क्यों नहीं एक ऐतिहासिक निर्णय लेती है कि संपन्न किसानों पर टैक्स लगे. कृषि आय के नाम पर केवल बड़े किसान ही नहीं, नेता, अफसर, अभिनेता, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर और व्यापारी भी आयकर बचा रहे हैं. इस टैक्स वसूली से छोटे व मध्यम आय वर्ग के किसानों को अधिक लाभ और सुविधाएं दी जा सकती हैं.

तीसरा पहाड़ देश में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए तात्कालिक और दूरगामी प्रयासों का है. कोरोना महामारी ने उद्योग-धंधों के साथ विभिन्न क्षेत्रों में बेरोजगारों की समस्या को विकराल कर दिया है. आधुनिक तकनीक ने काम करनेवाले लोगों की आवश्यकता भी कम कर दी है. इस दृष्टि से कौशल विकास योजना का समुचित क्रियान्वयन कर स्वरोजगार की व्यवस्था, ब्रिटिश राज से चली आ रही सरकारी नौकरियों की मानसिकता बदलने के लिए व्यापक अभियान, लघु व मध्यम श्रेणी के उद्योगों और ग्रामोद्योग के लिए गंभीर प्रयासों की आवश्यकता होगी.

अर्थ व्यवस्था का पहाड़ तो सबसे ऊंचा है. देश में अनुकूल वातावरण, शांति व्यवस्था, स्थायी सरकार और स्थायी लगनेवाले नियम-कानून होने पर विकसित देशों की तरह उत्तर भारत में भारी पूंजी लगाने की आवश्यकता है. आर्थिक प्रगति के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों के राजनीतिक मतभेद रुकावट नहीं बनने चाहिए. शिक्षा व्यवस्था दशकों से उलट-पलट होती रही है.

प्रधानमंत्री मोदी ने विशेषज्ञों के सहयोग और लंबे विचार-विमर्श के बाद नयी शिक्षा नीति बनवा दी, लेकिन उसका क्रियान्वयन अटका हुआ है. शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधारों के साथ नयी पीढ़ी में अधिकारों, अनुशासन और कर्तव्य के संस्कार व भारतीयता के गौरव की भावनाओं का संचार करना होगा. शिक्षकों का सम्मान और स्तर ऊंचा उठाना होगा.

अब चीन या पाकिस्तान भारत पर सीधे आक्रमण नहीं कर सकते, लेकिन सैन्य अथवा आतंकवादी गतिविधियों से कई बार चिंता की स्थिति बनती है. इसलिए सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करते हुए जनता के बीच यह विश्वास बनाना जरूरी है कि भारतीय सीमाएं हमारी सेना के बल पर पूरी तरह सुरक्षित हैं. इस मुद्दे पर दुश्मनों से अधिक खतरा अपने कुछ राजनेताओं, कुछ संगठनों और विदेशी फंड पानेवाले पूर्वाग्रही लोगों से है, जो अतिक्रमण और हथियारों को लेकर भ्रम पैदा करते रहते हैं.

ऐसे अभियानों पर नियंत्रण लोकतंत्र में एक चुनौती है. एक पहाड़ सफलताओं अथवा भविष्य में सबके साथ सबके विकास और आत्मनिर्भरता के लिए सरकार की छवि को अच्छी बनाये रखने का है. केवल चुनाव और सत्ता के समीकरणों से जन समर्थन मिलने की धारणा कुछ हद तक ही ठीक है. देश में शांति व्यवस्था हो या आर्थिक विकास, छवि का बेहतर होना जरूरी है. समाज में भविष्य के अनुकूल होने की आशा और विश्वास बनाये रखे बिना दुनिया से मुकाबला संभव नहीं है.( ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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