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अर्थव्यवस्था से उम्मीदें

Updated at : 28 Jun 2021 2:28 PM (IST)
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अर्थव्यवस्था से उम्मीदें

अनेक विशेषज्ञों की राय है कि पिछले साल की तरह अर्थव्यवस्था के संकुचन में जाने या वृद्धि दर के बहुत कम रहने की संभावना नहीं है.

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पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही की तरह इस वर्ष की पहली तिमाही भी महामारी से त्रस्त रही. दूसरी लहर तो आक्रामकता के हिसाब से पहली लहर से चार गुनी अधिक भयावह रही. इसके बावजूद चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में सकल घरेलू उत्पादन की वृद्धि दर 11.5 फीसदी रहने का अनुमान है. नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लायड इकोनॉमिक रिसर्च की रिपोर्ट ने यह भरोसा जताते हुए रेखांकित किया है कि ऐसा अर्थव्यवस्था के मजबूत आधार की वजह से है.

उल्लेखनीय है कि अप्रैल और मई में व्यापक संक्रमण के कारण एक बार फिर देश के बड़े हिस्से में पाबंदियां लगानी पड़ी थी. ऐसे में पहली तिमाही से ज्यादा उम्मीदें न होने पर भी अगर संतोषजनक बढ़ोतरी होती है, तो हम साल के बाकी महीनों को लेकर आश्वस्त हो सकते हैं. काउंसिल का आकलन है कि परिस्थितियों के मुताबिक मौजूदा वित्त वर्ष में वृद्धि दर 8.4 से 10.1 फीसदी के बीच रह सकती है.

रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ सी रंगराजन का मानना है कि अगर महामारी की तीसरी लहर नहीं आती है, तो यह दर नौ फीसदी रह सकती है. हालांकि अनेक विशेषज्ञों की राय है कि पिछले साल की तरह अर्थव्यवस्था के संकुचन में जाने या वृद्धि दर के बहुत कम रहने की संभावना नहीं है. इसकी दो वजहें हैं. एक, पाबंदियों के हटने के साथ ही आर्थिक गतिविधियों में तेजी आने के अनुभव हैं. ऐसा पिछले साल के आखिरी और इस साल के शुरुआती महीनों में देखा गया था.

दूसरी लहर के कमजोर पड़ने के साथ जब छूटों का सिलसिला शुरू हुआ, तो जून में सकारात्मक संकेत दिख रहे हैं. दूसरी वजह यह है कि सरकार ने राहत पैकेज और बजट प्रावधानों के जरिये खर्च में वृद्धि की है, जिससे अर्थव्यवस्था को बड़ी मदद मिली है. विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी सहयोग को जारी रखना होगा तथा उसकी मात्रा बढ़ानी होगी. केंद्र सरकार की ओर से इस बारे में लगातार आश्वासन भी दिया जा रहा है, जो उत्साहवर्द्धक है.

इसमें रिजर्व बैंक की भी बड़ी भूमिका है. लेकिन, हमें मुद्रास्फीति और वित्तीय घाटे के रूप में इसके आर्थिक असर के लिए भी तैयार रहना होगा. ये असर स्वाभाविक ही हैं क्योंकि अर्थव्यवस्था की बढ़ोतरी और बड़ी आबादी को राहत देने के लिए सरकारी खर्च बढ़ाना ही होगा और बाजार में नगदी भी मुहैया कराने का सिलसिला भी जारी रखना है. इसके लिए अधिक उधार लेने और रिजर्व बैंक के सहयोग की दरकार है.

पहली तिमाही के नतीजे जो हों, पर सभी आकलन भरोसा देते हैं. मॉनसून इस वर्ष भी सामान्य से अच्छा रहने की आशा है. विशेषज्ञों के अनुमान के आसपास ही रिजर्व बैंक का 9.5 फीसदी का आकलन है. केंद्र सरकार ने दूसरी लहर से पहले भरोसा जताया था कि विकास दर 11 फीसदी रह सकती है. बहरहाल, तमाम हिसाब के बावजूद यह तो तय है कि अर्थव्यवस्था पटरी पर आ चुकी है और महामारी से निपटते हुए अब इसे आगे बढ़ाना है.

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