बाबा की भविष्यवाणी

Updated at : 08 May 2017 6:16 AM (IST)
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बाबा की भविष्यवाणी

वीर विनोद छाबड़ा व्यंग्यकार उन दिनों हम बच्चे थे. हमारे घर एक बाबा आये. घनी-लंबी सफेद दाढ़ी और घुटने तक लटकते बाल. गेरुआ वस्त्र. मस्तक की लकीरों से ही भूत-वर्तमान-भविष्य पढ़ लेते हैं. हमें देखते ही बाबा बोले- यह बालक अपार विद्या अर्जित करेगा. उच्च पद पर आसीन होगा. मां बहुत खुश हुई. बाबा को […]

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वीर विनोद छाबड़ा
व्यंग्यकार
उन दिनों हम बच्चे थे. हमारे घर एक बाबा आये. घनी-लंबी सफेद दाढ़ी और घुटने तक लटकते बाल. गेरुआ वस्त्र. मस्तक की लकीरों से ही भूत-वर्तमान-भविष्य पढ़ लेते हैं. हमें देखते ही बाबा बोले- यह बालक अपार विद्या अर्जित करेगा. उच्च पद पर आसीन होगा. मां बहुत खुश हुई. बाबा को बेसन का हलवा खिलाया. दक्षिणा के तौर पर सवा पांच रुपये भी दिये.
बाबा के इस कथन से हमें घर में स्पेशल स्टेटस मिल गया. तब हम सातवें दर्जे में थे. संयोग से छमाही परीक्षा हम प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए. मां खुश हुई- बाबा की भविष्यवाणी सच होनी शुरू हो चुकी है. इधर हम भी निश्चिंत हो गये. हमारा बड़ा आदमी बनना तय है. अब पढ़ना-लिखना मिथ्या है. अब सिर्फ खेलना-कूदना, झगड़ना. परिणाम यह हुआ कि आठवीं कक्षा में एक विषय में फेल होगये. लेकिन मां खुश थी- बेटे को बड़ा होकर बड़ा काम करना है, अभी तो छोटा है.
सिफारिश से नवें दर्जे में दािखला मिला. लेकिन, हम नहीं सुधरे. परिणाम फिर खराब आया. हाइ स्कूल में फेल हो गये और फिर इंटरमीडिएट में भी. अब मां को भी लाल में अवगुण दिखने लगे. पिताजी तो पहले ही ढकोसला मानते थे बाबाओं की भविष्यवाणी को.
इधर हमें भी अक्ल आयी.
खुद को पढ़ाई पर फोकस किया. इंटर किया और फिर बीए. फिर एमए करने यूनिवर्सिटी पहुंचे. सुंदर-सुंदर बालिकाएं देख कर मन हर्षित हुआ. हस्तरेखा विज्ञान की एक पुस्तक ले आये. फर्जी ज्योतिष बन लड़कियों के हाथ देखने शुरू किये. उस जमाने में हर लड़की का प्रथम और अंतिम प्रश्न यही होता था कि ब्याह का योग है कि नहीं. लेकिन, हम अपने भविष्य को लेकर आशंकित रहने लगे. तेरा क्या होगा बिल्लू? हमें ब्याह की नहीं नौकरी की चिंता थी.
हम द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण होते रहे, लेकिन हम औसत दर्जे के विद्यार्थी थे. कभी-कभी हमें आश्चर्य होता था- यार, पेपर तो बकवास दिया था. पास कैसे हो गये? यह तो नियति का खेल था कि बिजली विभाग में बाबू की वेकेंसी निकली. जेब में पैसे नहीं थे. एक मित्र हमें फॉर्म दे गये. दूसरे ने फीस भर दी. और तीसरा, हमें डांट-डपट कर बाबूगिरी पढ़ा गया. और हमने बाकायदा एग्जाम पास किया.
छियासठ पतझड़ देखने के बावजूद हमने सपने देखने नहीं छोड़े. कल ही एक कंप्यूटर ‘एप’ ने हमें अठानबे साल तक जीने का प्रमाणपत्र दे दिया. लेकिन, हमें हैरानी इस पर है कि हमारा अंत चीन में बताया गया. हम चीन में क्या कर रहे होंगे? एक मित्र ने कहा, हो सकता है कि तब हम चीन में भारत के राजदूत हों. फर्श से अर्श पर पहुंचते देर थोड़ी लगती है. बहरहाल, हमने चीनी भाषा सीखनी शुरू कर दी है.
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