राजनीतिक विज्ञापनों के दौर में

Updated at : 28 Apr 2017 6:09 AM (IST)
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राजनीतिक विज्ञापनों के दौर में

डॉ अनुज लुगुन सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया हमारे सामने इन दिनों सुकमा की ताजा घटना से लेकर कश्मीर में पत्थर फेंकते स्कूली छात्रों और लड़कियों का, कथित गोरक्षकों की गुंडागर्दी से लेकर किसानों की आत्महत्या का, विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से लेकर आदिवासियों के सत्याग्रह इत्यादि ज्वलंत घटनाओं का ब्योरा है. आमतौर पर […]

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डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
हमारे सामने इन दिनों सुकमा की ताजा घटना से लेकर कश्मीर में पत्थर फेंकते स्कूली छात्रों और लड़कियों का, कथित गोरक्षकों की गुंडागर्दी से लेकर किसानों की आत्महत्या का, विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से लेकर आदिवासियों के सत्याग्रह इत्यादि ज्वलंत घटनाओं का ब्योरा है.
आमतौर पर हमें घटनाओं को विखंडित कर दिखाया जाता है और हमें उसी तरह देखने का अभ्यस्त कर दिया जाता है. लेकिन, जब हम इन घटनाओं का समुच्चय तैयार करते हैं, तो हमें यथार्थ का वास्तविक रूप दिखाई देता है. माना कि राजनीति ही समस्याओं के समाधान का रास्ता है, लेकिन ऐसी राजनीति जो समाज की ढांचागत विसंगतियों की अवहेलना कर और जीवन की बुनियादी जरूरतों का अपहरण कर सिर्फ अपना प्रोपेगंडा करती हो उससे कैसे समस्याओं का समाधान संभव होगा? यह सवाल आज के भारतीय समाज के ज्वलंत मुद्दों से जुड़ा हुआ है. यह सवाल इसलिए भी, क्योंकि यह गांधीजी के चंपारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष है. हालांकि गांधीजी अब हमारे समाज और राजनीति दोनों जगह सिर्फ प्रतीक मात्र रह गये हैं, बावजूद इसके कि हर घड़ी के बीतने के साथ ही गांधी की प्रासंगिकता बढ़ती जा रही है.
असगर वजाहत का नाटक ‘गोडसे@गाधी.कॉम’ सिर्फ इसलिए रोचक नहीं है कि इसकी कथा में गोडसे द्वारा गोली मार दिये जाने के बाद गांधीजी जीवित बच गये हैं, बल्कि इसलिए कि जब गांधीजी आदिवासियों के बीच उनके संघर्ष में शामिल होने जाते हैं, तो उन्हें देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है. इस नाटक में आजादी के बाद की भारतीय राजनीति की बुनियादी विसंगतियों को उजागर किया गया है.
यानी आजादी के बाद हमारी राजनीति का जो स्वरूप बना उसमें गांधी के लिए कोई जगह नहीं बची. आज जब हम गांधी के विचारों के साथ एक तरफ संसदीय राजनीति को देखते हैं, पर जमीनी हकीकत देखते हैं, तो दोनों के बीच बहुत बड़ी खाई दिखती है. हमारी जमीनी हकीकत राजनीतिक दलों के प्रोपेगंडा के पैरों तले कुचली जा रही है. हम एक ओर प्रधानमंत्री को फर्जी गोरक्षकों को चेतावनी देते हुए सुनते हैं और दूसरी ओर उनकी चेतावनी के साथ ही कथित गोरक्षकों की क्रूरता और बढ़ती जाती है. हम एक ओर कश्मीर में शहीद हुए सुरक्षा बलों को श्रद्धांजलि देते हैं, लेकिन उसके साथ ही दूसरी ओर पत्थर फेंकनेवालों की संख्या लगातार बढ़ती जाती है.
एक ओर आंतरिक सुरक्षा के हवाले माओवादियों से बदला लेने की घोषणा होती है और साथ ही दूसरी ओर आदिवासियों का विस्थापन और दमन तेज हो जाता है. एक ओर किसानों के लिए कर्ज माफी की घोषणा होती है और दूसरी ओर किसानों की आत्महत्या का दर बढ़ता जाता है. ऐसी कई शृंखलाएं हैं, जिसमें एक तरफ घोषणाएं हैं और दूसरी तरफ जमीनी हकीकत. जब हम इन सबका समुच्चय तैयार करते हैं, तो हमें सरकार और प्रशासन द्वारा किये गये दावे किसी उत्पाद के विज्ञापन की तरह दिखाई देते हैं, जहां केवल चमक और झूठ है.
बात सिर्फ भाजपा या कांग्रेस की नहीं है, बल्कि हर उस राजनीतिक दल की है, जो सत्ता में आने के बाद उसी व्यवस्था के जंग लगे पुर्जों को समेटते हुए चलते हैं. मसलन, कश्मीर मसले को ही देखें. पिछले विधानसभा चुनाव में कश्मीर में लोगों ने चुनाव में भागीदारी की और पीडीपी और भाजपा की गंठबंधन वाली सरकार बनी. लेकिन, हाल में हुए उप चुनाव में मुश्किल से सात प्रतिशत ही मतदान हुआ. इससे यह संकेत लिया ही जा सकता है कि पिछले लगभग तीन दशकों से जो स्थितियां बनी है, वह लगातार बिगड़ती जा रही है, बावजूद इसके वहां बड़े पैमाने पर सेना की तैनाती है. यानी हमारी सरकारें वहां की वस्तुगत परिस्थितियों के अनुसार नीतियों को निर्धारित करने में लगातार असफल रही हैं. ऐसे ही देश के अंदर कई सामाजिक मसले हैं.
हमें राजनीति और समाज के अंतर्संबंधों का सूक्ष्म अन्वेषण करना चाहिए. हमारे समाजशास्त्रियों के यहां ‘सरफेस’ और ‘डेप्थ’ का सिद्धांत है. यह कहता है कि संसदीय राजनीति सिर्फ ‘सरफेस’ यानी ‘ऊपरी’ हलचलों को ‘मैनेज’ करने का अभ्यास बन गया है. इसकी इस प्रवृत्ति के द्वारा बुनियादी समस्याओं का हल तब तक संभव नहीं है, जब तक कि उसमें जनता के सवालों का विचार ‘गहराई’ के साथ समाहित न हो. ‘डेप्थ’ के लिए आलोचना और आत्मालोचना की जरूरत होती है.
दुर्भाग्य की बात यह है कि आज आलोचना का विचार खत्म हो रहा है और जो आलोचना है उसे स्वीकार करने के लिए कोई तैयार नहीं है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और संस्कृतिकर्मियों की आलोचना के विरुद्ध सत्ता की राजनीतिक विज्ञप्ति हमेशा भ्रम पैदा करती है. आज हमारे देश में कश्मीर, पूर्वोत्तर और छत्तीसगढ़ आदि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जहां सैन्य बलों की तैनाती दुनिया में सबसे ज्यादा है.
ऐसे में, अगर कोई यह कहे कि इन क्षेत्रों की समस्याओं को हल करने के लिए सैन्य बलों की नहीं, बल्कि सशक्त सरकारी नीति की जरूरत है, तो इसे स्वीकार करने में सरकार को इसलिए असहजता होगी, क्योंकि यह सवाल प्राथमिक रूप से उसकी राजनीतिक असफलता को ही उजागर करती है.
जब भी सरकारी नीतियां असफल हुई हैं, वहां सेना को सामने कर दिया गया है, इससे परिस्थितियां और जटिल हुई हैं. लोकतंत्र में ऐसे मसलों को पक्ष-विपक्ष के बीच के संवाद से ही हल किया जा सकता है, लेकिन हमारी व्यवस्था का विपक्ष भी बुनियादी स्तर से ऐसे मुद्दों पर कोई सवाल इसलिए नहीं उठाता है, क्योंकि कभी सत्ता में रहते हुए उसका चरित्र भी ठीक ऐसे ही होता है. इस तरह संसदीय राजनीति में सिर्फ ‘सरफेस’ की हलचलों को ‘मैनेज’ करने का अभ्यास दिखाई देता है न कि ‘डेप्थ’ में जाकर बुनियाद को समझने की कोशिश है.
गांधीजी ने जिस ‘अंतिम जन’ तक पहुंचने की बात कही थी, वह केवल राजनीतिक विज्ञापन बन कर रह गया है. आज हर एपिसोड के बाद विज्ञापन ही प्रसारित हो रहा है. जो जितना विज्ञापन में दक्ष है, उसकी उतनी ही लहर बन रही है. लेकिन, जब हम विज्ञापन की परतों को कुरेदते हैं, तो हमें चमक और झूठ के सिवाय कुछ नहीं दिखता है.
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